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Friday, March 1, 2024

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विग्रह देवताओं के होते हैं, व्यक्ति के नहीं

किसी देवी-देवता की मूर्ति जब शास्त्रोक्त विधि से मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठित हो जाती है, तब उसे अमुक देवता का विग्रह कहा जाता है. किसी व्यक्ति या प्राणी की मूर्ति को विग्रह नहीं कहा जाता है. इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि मूर्ति यदि किसी देवी-देवता, राजनेता या विशिष्ट व्यक्ति की होती है.

मूर्ति और विग्रह के प्रचलित अर्थ में सामान्यतः कोई अंतर नहीं है. दोनों का प्रयोग आकृति, स्वरूप, शक्ल-सूरत के अर्थ में किया जाता है. किसी की आकृति के सदृश गढ़ी हुई प्रत्याकृति अर्थात प्रतिमा भी मूर्ति ही है. अमरकोश के अनुसार मूर्ति के पर्याय हैं कलेवर, शरीर, विग्रह, काया, देह आदि. जो ठोस आकृति में प्रत्यक्ष दिखाई पड़े, उसे मूर्त कहा जाता है और मूर्त विशेषण से ही संज्ञा बनती है मूर्ति. मूर्ति सामान्यतः मिट्टी, पत्थर, लकड़ी, धातु आदि से बनी हुई आकृति होती है. कागज पर बनी हुई आकृति को चित्र, प्रतिकृति, फोटोग्राफ कहा जा सकता है, मूर्ति नहीं, क्योंकि मूर्ति का त्रिविमीय (थ्री डाइमेंशनल) होना आवश्यक है. किसी को किसी भाव का स्वरूप मानते हुए भी मूर्ति कहा जाता है, जैसे- आचार्यो ब्रह्मणो मूर्त्तिः पिता मूर्त्तिः प्रजापतेः।/ भ्राता मरुत्पतेर्मूर्त्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनूः॥ (श्रीमद्भागवत॥6/7/29॥) (आचार्य ब्रह्मा की मूर्ति है, पिता प्रजापति की मूर्ति है, भाई वायु की मूर्ति है और माता साक्षात पृथ्वी की मूर्ति है.)

किसी विशेष गुण की अतिशयता के कारण मूर्तिमान स्वरूप के भाव में कुछ विशेषण प्रचलित हैं- न्यायमूर्ति, त्यागमूर्ति, दयामूर्ति, करुणामूर्ति आदि. न्यायमूर्ति अब वरिष्ठ न्यायाधीशों के लिए उनके नाम से पहले लगाये जाने वाले आदर सूचक अंग्रेजी संबोधन ‘मिस्टर जस्टिस’ के नवनिर्मित अनुवाद के रूप में प्रचलित हो गया है. मूर्ति का ही पर्याय प्रतिमा है. प्रतिमा शब्द देवविशेष, व्यक्तिविशेष अथवा पदार्थविशेष की प्रतिकृति, बिंब, मूर्ति अथवा आकृति सभी का बोधक है. प्रतिमा से तात्पर्य भक्तिभावना से भावित देवविशेष की मूर्ति अथवा देवभावना से अनुप्राणित पदार्थविशेष की प्रतिकृति से रहा है, किंतु अब पार्कों, चौराहों, सार्वजनिक स्थलों आदि पर भी मूर्तियां देखी जाती हैं. भारत के प्राचीन मंदिरों में विभिन्न कालखंडों और विविध शैलियों में मूर्तिकारों ने अद्भुत मूर्तियों का निर्माण किया है. भारतीय मूर्ति शिल्प के जीते-जागते प्रमाण भारत की सीमा से बाहर अनेक देशों में देखे जा सकते हैं.

विग्रह शब्द संस्कृत ग्रह् धातु (ग्रहण करना, थामना) से निर्मित है (वि + ग्रह +अच्). इसके निम्नलिखित कोशीय अर्थ हैं- देह, विस्तार, युद्ध, मूर्ति, प्रतिमा, समस्त पदों में पदों को खंडित कर अलग-अलग दिखाना. यद्यपि शब्दकोशों के अनुसार, मूर्ति, प्रतिमा और विग्रह परस्पर पर्याय हैं, फिर भी मूर्ति और विग्रह शब्दों के प्रयोग में कहीं कुछ स्थितियों में अवश्य अंतर मिलता है. जैसे मूर्ति किसी जीवित/दिवंगत व्यक्ति या पशु-पक्षी की भी हो सकती है, विग्रह आराध्य का होता है. मूर्ति को घर, आंगन, चौराहे या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर स्थापित किया देखा जा सकता है, लेकिन विग्रह के लिए निर्धारित स्थान घर का पूजा कक्ष या मंदिर का गर्भगृह ही हो सकता है. किसी मंदिर के प्रधान देवता की प्रतिमा को जब गर्भ गृह में स्थापित किया जाता है, तब उसे विग्रह कहा जाता है, किंतु ऐसा नहीं है कि मंदिर में केवल एक ही मूर्ति या प्रतिमा होती है. मंदिर के भीतर उसके अलग-अलग कोष्ठों, आलों, द्वारों, गवाक्षों, दीवारों में अनेक मूर्तियां उत्कीर्ण की जाती हैं या स्थापित की जाती हैं, किंतु उन्हें विग्रह नहीं कहा जा सकता.

किसी देवी-देवता की मूर्ति जब शास्त्रोक्त विधि से मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठित हो जाती है, तब उसे अमुक देवता का विग्रह कहा जाता है. किसी व्यक्ति या प्राणी की मूर्ति को विग्रह नहीं कहा जाता है. इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि मूर्ति यदि किसी देवी-देवता, राजनेता या विशिष्ट व्यक्ति की होती है, तो विग्रह मानी जाने वाली मूर्ति में स्वयं वह देवी-देवता, भगवान ही विराजमान होते हैं. नेपाल में गंडकी नदी में पाये जाने वाले पत्थर विशेष को शालग्राम कहा जाता है, जो वैज्ञानिक दृष्टि में जीवाश्म (फॉसिल) है. पुराणों के अनुसार, शालग्राम शिला को विष्णु का साक्षात विग्रह माना जाता है, इसलिए उसकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं समझी जाती. भगवान श्रीराम को ‘विग्रहवान् धर्म’ (धर्म का साक्षात स्वरूप) कहा गया है. अयोध्या में भी श्रीराम के विग्रह को श्री रामलला विराजमान कहने के पीछे यही भाव था कि वे प्राण प्रतिष्ठित होने के कारण साक्षात विग्रहवान हैं. उल्लेखनीय है कि अयोध्या में मंदिर के बारे में हुई सुनवाई में न्यायालय में श्रीराम को भी वाद में एक पक्ष माना गया था.

मूर्ति, प्रतिमा के लिए फारसी से एक शब्द हिंदी/उर्दू में आया है ‘बुत’. इसका संबंध भारतीय शब्द ‘बुद्ध’ से है. प्राचीन फारस में इस्लाम के प्रचार से पहले बुद्ध की प्रतिमाएं बहुत थीं, क्योंकि बौद्ध धर्म पश्चिम और मध्य एशिया में दूर-दूर तक फैला था. बुद्ध की प्रतिमा को बुत कहा गया, क्योंकि फारसी में ‘द्ध’ का उच्चारण सहज नहीं है और उसे ‘त’ कहा जाता है. इसलिए बुद्ध शब्द सहज ही बुत/बत हो गया. इस्लाम का प्रचार होने पर लोग किसी भी प्रतिमा या मूर्ति मात्र को बुत कहने लगे. बुद्ध बुत (मूर्ति) बन कर फारसी से आया और बुद्ध (जागा हुआ, ज्ञानी) संस्कृत से. बुतपरस्त (मूर्ति पूजक), बुततराश (मूर्तिकार) इसी बुत से बने हैं. मूर्ति को प्रतिमा कहें या बुत, भारतीय मूर्तिकला विश्व विख्यात रही है. हमारे मूर्ति शिल्पियों को यह शिल्प कौशल परंपरा से प्राप्त है. इनका जीवन कष्टों से भरा है. उनके द्वारा गढ़ी मूर्तियों को देखकर हम जब वाह कहें, तो उनके जीवन की आह को भी याद रखना चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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