तमिलनाडु में पहली बार चतुष्कोणीय मुकाबला

Tamil Nadu Elections : तमिलनाडु में कांग्रेस न सिर्फ एक जानी-पहचानी पार्टी है, बल्कि द्रमुक गठबंधन में इसकी मौजूदगी धर्मनिरपेक्ष वोट हासिल करने के लिए भी महत्वपूर्ण है. दिलचस्प बात यह है कि विजय द्वारा टीवीके लॉन्च करने और करूर रैली में भगदड़ में 41 मौतों के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के टीवीके के करीब आने से राजनीतिक परिदृश्य बदला है.

Tamil Nadu Elections : तमिलनाडु में 23 अप्रैल को चूंकि मतदान का दिन है, इसलिए राज्य में चुनाव प्रचार पूरे जोरों पर है और अगले दो सप्ताह के लिए उग्र भाषण और रोड शो मतदाताओं को उत्साहित करेंगे. इस बार का चुनावी मुकाबला कठिन है और बताया जा रहा है कि 234 सदस्यीय तमिलनाडु विधानसभा के इस बार के परिणाम एक नया राजनीतिक आश्चर्य और अप्रत्याशित मोड़ पेश करें, तो हैरानी नहीं होगी. छह लाख मतदाताओं द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों का एक नया स्वरूप सामने आ सकता है. हालांकि प्री-पोल सर्वे में द्रमुक गठबंधन को जीतता दिखाया जा रहा है. कुल 21 राजनीतिक दलों ने लगभग 2,200 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं.


अभी तक तमिलनाडु में बारी-बारी से द्रमुक या अन्नाद्रमुक की सरकार रही है. लेकिन इस बार चुनावी सभाओं में विपक्षी दलों के लिए भारी भीड़ है. अन्नाद्रमुक, विजय की टीवीके और सीमन की एनटीके की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही है. द्रमुक नेताओं को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है. एमके स्टालिन की द्रमुक को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है. तमिलनाडु में प्राथमिक चुनावी मुद्दा ‘ड्रग्स’ है. द्रमुक को छोड़ सभी राजनीतिक दल अवैध शराब, विदेशी शराब के प्रवाह, विश्वविद्यालयों में बलात्कार और खराब कानून-व्यवस्था की समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. चुनावी फंडिंग और देर रात मतदाताओं को नकदी वितरण जैसे बाहरी कारक भी प्रभावी हैं. घोषणापत्र मजाक बनकर रह गये हैं. किशोरों और छात्रों के लिए फ्रिज, लैपटॉप, ग्राइंडर, व्हीलचेयर, वाइफाइ और मुफ्त इंटरनेट का वादा किया जा रहा है.

अन्नाद्रमुक और टीवीके के साथ द्रमुक मुफ्त उपहारों की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की कोशिश कर रही है. पहली बार लॉटरी किंग सैंटियागो मार्टिन सभी दलों को वित्तपोषित कर रहे हैं. अखबारों की सुर्खियां हैं कि ‘हर जगह मार्टिन है’. सैंटियागो मार्टिन की पत्नी लीमा अन्नाद्रमुक पर दांव लगा रही हैं, बेटा चार्ल्स एलजेके में किस्मत आजमा रहा है, जबकि दामाद टीवीके के साथ हैं. तमिल समाचार चैनल अन्नाद्रमुक, भाजपा, टीवीके और द्रमुक की रैलियों का सीधा प्रसारण कर रहे हैं. जबकि पहले ये चैनल द्रमुक का गुणगान करते थे. हालांकि, अब जनता सोशल मीडिया और यूट्यूब लाइव रिपोर्टिंग की ओर मुड़ गयी है. यह तमिलनाडु में एक नया मोड़ है. एआइ द्वारा निर्मित नकली वीडियो और वास्तविक लगने वाली ऑडियो क्लिप अन्नादुरई, कामराज, एमजीआर, जयललिता और करुणानिधि के नाम पर हलचल मचा रहे हैं.

द्रमुक और अन्नाद्रमुक की जड़ें तमिलनाडु के हर गांव में हैं, पर भाजपा या कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की स्थिति ऐसी नहीं है. इस बार टीवीके जैसी नयी पार्टी चुनावी मैदान में उतरी है. तमिल सिनेमा के एक ‘सुपर हीरो’ जोसेफ विजय इसके प्रमुख हैं, जिन्हें ‘थलपति’ कहा जाता है. महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार तमिलनाडु चतुष्कोणीय मुकाबले का सामना कर रहा है और ऐसे मुकाबले में जीत का अंतर 1,000 वोटों से भी कम रहे, तो आश्चर्य नहीं होगा. विजय के प्रवेश से राज्य के ईसाइयों को एक रणनीतिक बल मिला है और पहली बार अल्पसंख्यक वोट द्रमुक से हटकर टीवीके की ओर जा सकते हैं. विजय के विशाल सिनेमाई प्रशंसकों के कारण टीवीके छह लाख मतदाताओं में से 20-25 फीसदी पर कब्जा कर सकती है. हालांकि प्री-पोल सर्वे में बताया गया है कि विजय की पार्टी आठ से 10 सीटें जीत सकती है. गौरतलब है कि 1990 के दशक से विजय के फैन क्लब की 5,000 शाखाएं स्थापित हैं.


द्रविड़ भूमि में मोदी-अमित शाह की जोड़ी के कारण भाजपा को बड़ा बढ़ावा मिल रहा है, जिससे एनडीए के अन्नाद्रमुक नेता पलानीस्वामी को लाभ होने की उम्मीद है. जयललिता के जीवनकाल में ही अन्नाद्रमुक के चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर के लिए भाजपा के एजेंडे का उल्लेख किया गया था. जयललिता ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग भी लिया था. तमिलनाडु में ‘कमल’ का चुनाव चिह्न लोकप्रिय है. हालांकि निवर्तमान विधानसभा में भाजपा के चार ही विधायक थे. इस चुनाव में भाजपा विधायकों का आंकड़ा कितना रहता है, यह देखने वाली बात होगी.

दूसरी तरफ, तमिलनाडु में कांग्रेस न सिर्फ एक जानी-पहचानी पार्टी है, बल्कि द्रमुक गठबंधन में इसकी मौजूदगी धर्मनिरपेक्ष वोट हासिल करने के लिए भी महत्वपूर्ण है. दिलचस्प बात यह है कि विजय द्वारा टीवीके लॉन्च करने और करूर रैली में भगदड़ में 41 मौतों के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के टीवीके के करीब आने से राजनीतिक परिदृश्य बदला है. राहुल गांधी पिछले छह महीनों से टीवीके के करीब आने के इच्छुक थे, पर द्रमुक ने इसे भांप लिया. फिर सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से स्टालिन ने कांग्रेस को द्रमुक के नये गठबंधन ‘सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस’ (एसपीए) से बाहर जाने से रोक दिया. एनटीके के नेता सीमन लिट्टे नेता प्रभाकरण के पुराने समर्थक हैं, जो तमिल ईलम का मुद्दा उठाते हुए अकेले चुनाव लड़ रहे हैं. उनके पास उन आठ प्रतिशत लोगों का वोट बैंक है, जो तमिल राष्ट्रवाद का समर्थन करते हैं. द्रमुक इस चुनाव में मुख्यमंत्री स्टालिन के पांच साल के कार्यकाल पर वोट मांग रही है.


द्रमुक अपने कामकाज, कल्याणकारी योजनाओं के सुचारु वितरण और अपने घटक दलों के साथ बेहतर तालमेल को अपनी उपलब्धि बता रही है. हालांकि सत्ता विरोधी लहर के साथ आर्थिक चिंताएं तथा कानून-व्यवस्था व भ्रष्टाचार के मामले में विपक्षी हमले इस चुनाव में द्रमुक की कड़ी परीक्षा लेंगे. द्रमुक के चुनावी भाषणों में ज्यादातर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की आलोचना होती है. स्टालिन की रणनीति अल्पसंख्यक वोटों को आकर्षित करने की है. द्रमुक का मानना है कि ईसाई वोटों के अलावा मुस्लिम मतदाता भी विजय की ओर झुक सकते हैं. पिछले चुनावों में जब मुकाबला मुख्य रूप से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच था, तब ईसाइयों और मुसलमानों के वोट ने जीत में निर्णायक भूमिका निभायी थी. पर टीवीके की अभी शुरुआत ही होने और ‘जोसेफ’ विजय के ईसाई टैग से मुस्लिम वोटों के एक हिस्से के उससे छिटकने की उम्मीद है. चूंकि अल्पसंख्यक वोटों के द्रमुक और टीवीके के बीच बंटने की संभावना है, इसलिए हिंदू वोटों के, जिनमें कोनार, मुक्कुलाथोर, मुथराय्यार और अनुसूचित जाति के समुदाय शामिल हैं, चुनावी जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद की जा रही है. अलबत्ता आप इसे किसी भी नजरिये से देखें, तमिलनाडु के चुनाव परिणाम निष्पक्ष और हिंसा मुक्त होंगे. यही तो लोकतंत्र की खासियत है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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