अपराध का शिकंजा

पहले ही विकास दुबे को सजा मिली होती, तो न उसके अपराधों की गिनती बढ़ती और न ही वह तमाम बंदोबस्त के बावजूद पुलिस की पकड़ से बाहर होता.

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के एक गांव में कुख्यात अपराधी विकास दुबे और उसके गुर्गों द्वारा आठ पुलिसकर्मियों की हत्या एक भयानक घटना भर नहीं है. इस प्रकरण में हो रहे खुलासे बताते हैं कि राजनीति, प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था में अपराधियों की पैठ किस हद तक है तथा उनके ऊपर लगाम लगाना आसान काम नहीं है. विकास दुबे हत्यारा और अपहरणकर्ता तो है ही, वह स्थानीय निकायों में लंबे समय तक निर्वाचित भी होता रहा था. उसने अपने परिजनों को जन प्रतिनिधि बनाने और कारोबार करने में सहयोग देता था. लेकिन उसका दायरा राज्य की राजनीति में सक्रिय हर बड़ी पार्टी तक था.

राजनीतिक संरक्षण के साथ उसे पुलिस महकमे के भ्रष्ट अधिकारियों का साथ भी मिलता था. हालिया घटना के बारे में भी बताया जा रहा है कि उसके ठिकाने पर पुलिस की दबिश की जानकारी पहले से ही थी. साथ से अधिक मामलों में अभियुक्त होने तथा कुछ अपराधों के लिए दंडित होने के बावजूद अदालत से उसका जमानत मिलना प्रशासन और न्यायालय की कार्यशैली पर चिंताजनक टिप्पणी है. ऊपरी अदालतों ने कई बार यह टिप्पणी की है कि निचली अदालतें भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हुई हैं.

ऐसे में इन स्थानों से न्याय और सुनवाई की उम्मीद करना आम नागरिक के लिए बहुत मुश्किल है. यही वजह है कि लोग अपराधियों की करतूतों की शिकायत पुलिस या अदालत तक ले जाने के बजाय उन्हें चुपचाप बर्दाश्त करना बेहतर समझते हैं क्योंकि उन्हें अपने जान-माल की परवाह होती है. राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ अपराध के गठजोड़ की गहराई का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि मौजूदा लोकसभा में 43 फीसदी से अधिक सदस्यों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से लगभग 29 फीसदी मामले गंभीर अपराधों से जुड़े हैं.

राज्यों की विधानसभाओं में ऐसे सदस्यों का अनुपात और भी अधिक है. यह भी उल्लेखनीय है कि पुलिस बल पर अपराधियों के ऐसे हमलों की खबरें लगातार आती हैं, पर कुछ दिन सुर्खियों में रहने के बाद उनके ऊपर से ध्यान हट जाता है. पुलिस में ऐसे लोगों का होना भी चिंताजनक है, जो गरीब और निरीह लोगों पर अत्याचार कर अपनी ताकत दिखाते हैं तथा अपराधियों को संरक्षण देते हैं तथा उनकी कारगुजारियों की वजह से कर्मठ व ईमानदार पुलिसकर्मियों को अपनी जान कुर्बान करनी पड़ती है.

यदि पहले ही विकास दुबे जैसे अपराधी को कानूनन सजा मिली होती, तो न उसके अपराधों की गिनती बढ़ती और न ही यह दिन देखना पड़ता कि तमाम बंदोबस्त के बावजूद वह पकड़ से बाहर है. देर-सेबर उसकी गिरफ्तारी होगी या वह मुठभेड़ में मार दिया जायेगा या फिर अदालत उसे सजा देगी, लेकिन यह सवाल भी अहम है कि क्या उसे मदद पहुंचानेवाले नेताओं और पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई होगी. अगर ऐसा होता है, तो यह एक बड़ा संदेश होगा, अन्यथा ऐसे किरदार पनपते रहेंगे.

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Published by: संपादकीय

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