स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता में बाधक हैं दूषित जलस्रोत

Contaminated Water: नल से आ रहे पानी के दूषित होने के कारण लगभग एक जैसे हैं. पहला कारण तो जलस्रोत ही है. जिस नदी, तालाब या भूजल से आपूर्ति हो रही है, वे ही स्वच्छ नहीं हैं. फिर उस पानी के शोधन के संयंत्र उससे अधिक गंदे हैं.

Contaminated Water: मध्य प्रदेश में इंदौर के एक मोहल्ले भागीरथीपुरा में हुई त्रासदी के बाद गुजरात की राजधानी गांधीनगर में भी आदिवाड़ा समेत कई सेक्टरों में दूषित पानी पीने से लोग और बच्चे बीमार पड़े हैं. इस बीच अब कई जगह घर में आ रहे नल के जल के असुरक्षित होने और लोगों के बीमार पड़ने की बात सामने आयी है. ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है. केंद्र सरकार की 2015 में शुरू की गयी अटल मिशन या अमृत-1 योजना में पाइप डालने और टंकी खड़े करने पर 2021 तक 72,656 करोड़ रुपये खर्च हुए. उसके बाद अमृत-2 में भी भारी भरकम व्यय हो रहा है, लेकिन तैयार संरचनाओं के रखरखाव और गुणवत्ता निर्धारण में बेपरवाही देखी गयी है. केंद्र सरकार के बजट से योजनाएं तो तैयार हो गयीं, लेकिन स्थानीय निकाय उनके निर्धारित मानक पर काम नहीं कर पा रहे. कहीं बजट नहीं है, तो कहीं स्थानीय राजनीति में हाथ बंधे होते हैं. और इसी की परिणति है कि जलजनित बीमारियां होने की खबरें आती रहती हैं.

राजधानी दिल्ली में ही अमृत-1 के तहत जल आपूर्ति, सीवरेज और शहरी बुनियादी ढांचे पर कुल 266 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए. इनमें से 215 करोड़ रुपये जलापूर्ति पर खर्च हुए. इसके बावजूद दिल्ली की करीब 10 फीसदी आबादी के घर तक नल नहीं पहुंच पाये. काम या अनियमित जलापूर्ति तथा टैंकरों पर निर्भरता तो आज भी 35 फीसदी आबादी की स्थायी दिक्कत है. दिल्ली जल बोर्ड के दिसंबर, 2025 के सैंपल टेस्ट में 33 नमूने फेल हुए. अतीत में झांकें, तो केंद्र सरकार की कई योजनाएं, दावे और नारे फाइलों में तैरते मिलेंगे, जिनमें देश के हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने का सपना था. इन पर अरबों रुपये खर्च हुए, पर आज भी सालाना करीब 3.77 करोड़ लोग दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं, करीब 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं और पेयजल से बीमार होने के कारण से 7.3 करोड़ कार्य दिवस बर्बाद होते हैं. इन सबसे देश की अर्थव्यवस्था को सालाना करीब 39 अरब रुपये की क्षति होती है.

एनएसएसओ (नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस) की 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी नहीं मिल पा रहा और महज 21.4 फीसदी लोगों को ही घर में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है. सरकार भी स्वीकारती है कि 78 फीसदी ग्रामीण और 59 फीसदी शहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं. नल से आ रहे पानी के दूषित होने के कारण लगभग एक जैसे हैं. पहला कारण तो जलस्रोत ही है. जिस नदी, तालाब या भूजल से आपूर्ति हो रही है, वे ही स्वच्छ नहीं हैं, और उस पानी के शोधन के संयंत्र उससे अधिक गंदे हैं. गांवों-कस्बों में भूजल पर निर्भरता ज्यादा है, पर यदि वह दूषित है, तो उसका निराकरण संभव नहीं. पहले से दूषित स्रोत से घर तक पानी पहुंचने के रास्ते में सबसे बड़े पड़ाव ‘बड़ी पानी की टंकी’ या ‘जलाशय’ खुद बीमार रहते हैं. देश के अनेक शहर-कस्बे के ऊंचे जलापूर्ति टैंक के गंदे होने की खबर अक्सर आती रहती है, क्योंकि उनकी सफाई के लायक बजट और सफाई के दौरान वैकल्पिक पानी आपूर्ति की कोई व्यवस्था होती नहीं. इस बारे में सोचने की जरूरत भी नहीं समझी जाती.

इसी तरह छोटी गलियों वाले मोहल्लों में कुछ ही फुट के दायरे में सीवर निकासी और जलापूर्ति की पाइप लाइन का होना आम बात है. फिर फोन-इंटरनेट प्रदाता कंपनी या गैस कंपनियां उसी संकरे इलाके में खुदाई करती और अपनी लाइन बिछाती रहती हैं. ठेकों के तहत होने वाले इन कामों में कोई यह परवाह नहीं करता कि पानी या सीवर की सरकारी लाइन को कहीं नुकसान तो नहीं हो रहा. जब तक पानी-गंदगी ऊपर न बहने लगे या इंदौर जैसी त्रासदी न हो जाये, तब तक किसी को पता नहीं चलता कि कितना जहर किस रास्ते से नलों तक आ रहा है.

पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय एजेंसी एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आइएमआइएस) द्वारा 2018 में पानी की गुणवत्ता पर करवाये गये सर्वे के मुताबिक, राजस्थान में सबसे ज्यादा 19,657 बस्तियां और वहां रहने वाले 77.70 लाख लोग दूषित पेयजल के सेवन से प्रभावित हैं. आइएमआइएस के अनुसार, पूरे देश में 70,736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित अन्य लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं. इस पानी की उपलब्धता के दायरे में 47.41 करोड़ आबादी आ गयी है. यह कड़वा सच है कि भारत इस समय तेजी से शहरीकरण की तरफ भाग रहा है और इस शहरीकरण का बड़ा हिस्सा अनियोजित है. शहरी नियोजन का प्राथमिक सिद्धांत कहता है कि पीने के पानी और सीवर की लाइनें कभी एक-दूसरे के इतने करीब नहीं होनी चाहिए कि एक का रिसाव दूसरे को ‘जहर’ बना दे. बहुत से शहरों में स्मार्ट सिटी के नाम पर भी कई करोड़ खर्च हो चुके हैं. हाल की घटनाओं ने सारे देश को चेतावनी दी है कि जब तक ‘जमीन के ऊपर’ की सफाई ‘जमीन के नीचे’ की सुरक्षा के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेगी, तब तक स्वच्छता या स्मार्ट के तमगे अधूरे ही रहेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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