फागुन चल रहा है. फागुन माने वसंत का आगमन. वसंती हवा का चलना. सर्दी का कुछ कम होना. चारों ओर फूल ही फूल. हर तरफ पेड़-पौधे, फूल, पत्तियों की मुस्कराहट. भंवरों और तितलियों की धमा-चौकड़ी. फागुन और उत्तर भारत का बड़ा संग-साथ है. ब्रज प्रदेश की होली तो वैसे भी बहुत मशहूर है. आज से पचास-पचपन साल पहले ब्रज प्रदेश के ही अपने गांव और अन्य गांवों में होली एक महीने तक चलती. यानी होली तक बस राग-रंग, गाना बजाना ही चलता. उन दिनों घर का आंगन लीपकर, शाम के वक्त आटे का चौक पूरा जाता. उस पर सत्यानाशी के पौधे के पीले फूल सजाये जाते. महिलाएं ढोलक लेकर गाने-बजाने लगतीं. नाचने लगतीं. कई दिन पहले से घरों में पकवानों के बनने की गंध से पूरा वातावरण महकने लगता. हर घर के आंगन में एक छोटी होली बनायी जाती. बड़ी होली बाहर ऐसी किसी जगह, जहां होली जलने पर कहीं आग न लग जाये. इतनी जगह भी हो जहां बहुत से लोग खड़े हो सकें.
होली के दिन दोपहर के वक्त घर में बने पकवानों को लेकर महिलायें जातीं और पूजा करतीं. उसके बाद ही गुझिया, नमकीन, कांजी, दही बड़े आदि का स्वाद परिवार वालों को मिलता. शाम को घर में बनी होली जलाकर सब परिवार वाले आसपास बैठ जाते. लोगों का आना-जाना शुरू होता. वे अपने हाथों में गेहूं की बालियां लिये होते, जो वे भेंट में देते. उन्हें उसी होली में भूनकर खाया जाता. एक दिलचस्प बात यह है कि होली से पहले कोई भी अपनी खाट या लकड़ी से बने किसी भी ऐसे सामान को बाहर न छोड़ता, जिसे होली में समर्पित किया जा सके. अगर ऐसा होता, तो घर के सामने से वह सामान उठा लिया जाता और कोई शिकायत भी नहीं कर पाता. ऐसे हंसी-मजाक खूब चलते. ‘बुरा न मानो होली है’ गूंजता ही रहता.
मथुरा- वृंदावन में तो आज भी सात दिन तक तरह-तरह से होली मनायी जाती है. वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में होली से पहले एकादशी के दिन रंगों की जगह फूलों की पंखुड़ियों से होली खेली जाती है. बरसाने के श्रीजी मंदिर में लड्डुओं की होली मनती है. वहां की लठमार होली देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. स्त्रियां हाथों में लट्ठ या डंडा पकड़े उन लोगों को पीटती हैं, जो उन पर रंग डालने आते हैं. गांव में जलाने वाली होली के अगले दिन की होली को गांव में धूल कहा जाता था. इसे कहीं-कहीं धुलंडी भी कहते हैं. इस दिन सवेरे कुछ भी नहीं पकाया जाता था. पिछले दिन ही अगले दिन के खाने के लिए बना लिया जाता. धूल वाले दिन तो जो भी बर्तन दिखता, उसमें लाल-पीले रंग घोल लिये जाते. पलाश के सूखे फूलों को, जिन्हें टेसू कहा जाता, कई दिन पहले भिगोकर रंग तैयार किया जाता. महिलाएं अपने पुराने कपड़ों से कोड़े तैयार करतीं. इसके बाद दरवाजे पर जैसे-जैसे होली खेलने वाले हुरियारों का आना-जाना बढ़ता, स्त्रियां हाथों में कोड़े और डंडे पकड़े दरवाजों पर दिखायी देतीं. जैसे ही कोई उन पर रंग डालने की कोशिश करता, वे उसे पीटने लगतीं. यह भी लठमार होली का ही एक रूप था. घर-घर में ये दृश्य दिखाई देते. लोग जबरिया रंग फेंकने की कोशिश करते, स्त्रियों से पिटते और हंसते. इस दौरान तरह-तरह के हंसी-मजाक चलते रहते. महिलाएं खूब गालियां भी देतीं.
तब तो यह सब आनंददायक और हंसने के लायक लगता. लेकिन अब अगर सोचती हूं, तो ऐसा महसूस होता है कि जो स्त्रियां समाज में पुरुषों के सामने तभी बोल नहीं सकती थीं, उन्हें इतनी ताकत मिलती कि वे कम से कम साल में एक बार उन्हें पीट सकें और होली के कारण इसका कोई बुरा भी न माने. चाहे यह सब एक त्योहार के कारण हो, लेकिन यह है तो अनोखी बात. स्त्रियों को ताकत सौंपने का यह एक तरीका भी था. यह चेतावनी भी है कि स्त्रियों के बाजुओं में भी इतनी ताकत है कि वे किसी को पीट सकती हैं. यह स्त्री सशक्तीकरण की ऐसी अनोखी मिसाल है, जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता.
दोपहर तक इस तरह होली खेलने के बाद सब लोग रंग छुड़ाने और नहाने में लग जाते, क्योंकि शाम तक अड़ोसी-पड़ोसी होली मिलन के लिए आना शुरू हो जाते. उन्हें घर में बने पकवान परोसे जाते. कोई आपके घर आता, आप किसी के घर जाते. बुजुर्ग कहते थे कि होली एक ऐसा त्योहार है, जिसमें गले मिलकर दुश्मनियां तक भुला दी जाती हैं. इसीलिए अगर किसी से लड़ाई है, तो उसके घर भी होली मिलन के लिए जरूर जाया जाता. और इस तरह बिना किसी कोर्ट-कचहरी के दुश्मनियां खत्म भी हो जातीं. जिनके घर कोई शोक हुआ होता, वहां इस दिन दूसरों के घर से पकवान पहुंचाये जाते. इसे शोक उठाना कहते. अब गांव में यह सब कितना बचा हुआ है, मैं नहीं कह सकती. वक्त के साथ हम बदल जाते हैं, तो परंपरायें भी लुप्त होती जाती हैं. लेकिन जो परंपरायें अच्छी हैं, वैमनस्य मिटाती हैं, वे अगर बनी रहें, तो वे समाज के हित में ही हैं. वक्त के साथ जैसे हम बदलते हैं, उसी तरह परंपरायें भी बदलती हैं. अब शायद गांवों में भी महीने भर ऐसे उत्सव न चलते हों. (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
