West Asia Crisis: इस्राइल-अमेरिका के ईरान पर हमले और उसके जवाब में ईरान के हमले से दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं. खासतौर से इस युद्ध में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के मारे जाने के बाद ईरान द्वारा इसका बदला लेने की बात कहे जाने से साफ है कि युद्ध लंबा चलेगा. ऐसे भारत की भी चिंता बढ़ सकती है. यह चिंता कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, शेयर बाजार में गिरावट, माल ढुलाई की लागत बढ़ने, खाद्य वस्तुओं की महंगाई, भारत से बासमती चावल, चाय, मशीनरी, इस्पात तथा फुटवियर जैसे क्षेत्रों में निर्यात, निर्यात के लिए बीमा लागत में वृद्धि, पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा की चिंता तथा इस्राइल और ईरान सहित पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में कमी की आशंकाओं से संबंधित हैं.
इस युद्ध का असर वैश्विक शिपिंग रूट्स खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ईरान ने 33 किलोमीटर चौड़ा यह जलमार्ग रोक दिया है. यह वैश्विक यातायात का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है. दुनिया को मिलने वाला करीब एक तिहाई तेल और खाद्य व कृषि उत्पादों का अधिकांश यातायात इसी मार्ग से होता है. ऐसे में इस क्षेत्र में शिपिंग बाधित होने से कच्चे तेल की ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है. साथ ही इससे खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने के आसार हैं. चूंकि ईरान भारत का पड़ोसी क्षेत्र है और भारत का करीब आधा कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर आता है, ऐसे में यह युद्ध भारत के लिए कच्चे तेल संबंधी चिंता निर्मित करते हुए दिखाई दे रहा है. युद्ध के तनाव के बीच 28 फरवरी को कच्चे तेल की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल के मूल्य स्तर पर पहुंच गयी, जो सात माह का रिकॉर्ड मूल्य स्तर था. युद्ध के लंबा खिंचने पर कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है. ईरान चूंकि दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल उत्पादकों में से एक है, लिहाजा ईरान के तेल बाजार में अस्थिरता से पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद महंगे होने लगेंगे. इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है.
इस युद्ध से भारतीय शेयर बाजार में बड़ी संख्या में विदेशी निवेशकों द्वारा जोखिम वाली संपत्तियां बेची जाने और बड़ी संख्या में निवेश निकालने की स्थिति दिखाई दे सकती है. सेंसेक्स और निफ्टी के लिए यह महीना बड़ी गिरावट का माह हो सकता है. ऐसे में, सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की मांग बढ़ने से सोने की खपत और कीमत बढ़ सकती है. भारत के वित्तीय बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है और रुपया कमजोर हो सकता है. युद्ध के लंबा खिंच जाने पर पश्चिम एशिया में रहने वाले करीब 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा भी भारत के लिए चिंता का कारण बन सकती है. हालांकि आंतरिक रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है, इस कारण युद्ध के लंबा खिंचने का सीधा असर देश पर बहुत ज्यादा नहीं भी दिखाई दे सकता है.
उदाहरण के लिए, देश में महंगाई नियंत्रित है, महंगाई दर चार प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे है, थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर जनवरी में 1.81 फीसदी पर, तो उपभोक्ता महंगाई दर 2.75 फीसदी रही है. यदि युद्ध से जरूरी दवाओं की आपूर्ति में कोई कमी आती है, तो सरकार पीएलआइ योजना के तहत दवा उद्योग में काम आने वाले 35 प्रमुख कच्चे मालों (एपीआइ) का उत्पादन देश में ही तेजी से बढ़ायेगी. इससे दवाओं के दामों पर नियंत्रण रखा जा सकेगा. जहां तक कच्चे तेल की कमी की बात है, तो देश के पास 74 दिनों का रणनीतिक कच्चा तेल भंडार उपलब्ध है. पहले भारत 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था, अब ऐसे देशों की संख्या बढ़कर 39 हो गयी है. इससे तेल खरीद संबंधी जोखिम कम हो गया है.
यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आगामी वित्त वर्ष के बजट के तहत शीघ्र खराब होने वाले सामान की बाजार में समुचित आपूर्ति सुनिश्चित करने, महंगाई नियंत्रण और जरूरी दवाइयों की किफायती दाम पर आपूर्ति के लिए जो प्रभावी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गयी हैं, वे युद्ध की चुनौती के बीच देश के आम आदमी को राहत देते हुए दिखाई दे सकेंगी. यह बात भी महत्वपूर्ण है कि इस समय भारत पूरी दुनिया में मुक्त व्यापार की तरफ तेजी से आगे बढ़ा है. पिछले कुछ वर्षों में भारत द्विपक्षीय व्यापार और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) से दुनिया के कई विकसित देशों में निर्यात बढ़ाने की राह पर आगे बढ़ा है और इस वर्ष यूरोपीय संघ, ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ एफटीए क्रियान्वित करते हुए दिखाई देगा. इससे भारतीय सामान की दुनिया के बाजारों में पहुंच और बढ़ेगी तथा युद्ध की चुनौती के बीच भी भारत निर्यात के मोर्चे पर मजबूत दिखाई देगा. फरवरी तक भारत के पास रिकॉर्ड स्तर पर 723 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है. इससे भारत किसी भी आर्थिक जोखिम का आसानी से सामना करने में सक्षम है.
हम उम्मीद करें कि सरकार इस युद्ध से निर्मित आर्थिक चुनौतियों की आशंका के मद्देनजर ऐसी बहुआयामी रणनीति के साथ आगे बढ़ेगी, जिससे देश के आमजन व अर्थव्यवस्था को युद्ध के दुष्प्रभावों से बचाया जा सकेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
