-प्रवीण कौशल-
Air Travel Safety : रांची से दिल्ली जा रही एक एयर एंबुलेंस झारखंड में दुर्घटनाग्रस्त हो गयी, जिसमें सवार सभी सात लोगों की मौत हो गयी. यह दुर्घटना विमानन क्षेत्र में पहले हुई दुर्घटनाओं और तकनीकी खराबी की एक शृंखला के बाद हुई है. हालांकि जांच चल रही है और हादसे का कोई निश्चित कारण नहीं बताया गया है, लेकिन व्यापक सवाल बना हुआ है. ऐसा क्यों लग रहा है कि देश में विमानन दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं? इसका उत्तर देने के लिए व्यक्तिगत त्रासदियों से परे देखना होगा और विमानन पारिस्थितिकी तंत्र, यानी एविएशन इकोसिस्टम के भीतर संरचनात्मक दबावों की जांच करनी होगी.
भारत अब अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार है. बीते एक दशक में घरेलू सीटों की क्षमता लगभग दोगुनी हो गयी है. वर्ष 2014 में लगभग 80 लाख सीट प्रतिमाह से बढ़कर आज यह संख्या लगभग 1.5-1.6 करोड़ हो गयी है. अधिक उड़ानों का मतलब है अधिक टेक-ऑफ और लैंडिंग, मौसम का ज्यादा सामना करना, विमानों का रखरखाव और मानवीय निर्णय. यह विकास स्वाभाविक रूप से असुरक्षित नहीं है. लेकिन विमानन क्षेत्र का तेजी से विस्तार उन प्रणालियों पर दबाव डालता है, जो शायद उसी गति से विस्तार नहीं कर पाती हैं.
नियामक क्षमता की चुनौती भी अपनी जगह है. नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) विमान की उड़ान योग्यता, एयरलाइन अनुपालन और सुरक्षा ऑडिट की निगरानी के लिए जिम्मेदार है. दैनिक तकनीकी निरीक्षण, अनुसूचित ए, बी, सी और डी रखरखाव जांच, वार्षिक उड़ान योग्यता प्रमाणीकरण तथा निरंतर दोष सुधार उसकी जिम्मेदारी है. इसके अलावा, डीजीसीए घटनाओं के बाद ऑडिट, रैंप निरीक्षण और विशेष समीक्षा आयोजित करता है. हालांकि, सार्वजनिक आंकड़े क्षमता की कमी के बारे में बताते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, 1,600 से अधिक तकनीकी पदों में से केवल 553 ही भरे गये हैं. अमेरिकी संघीय उड्डयन प्रशासन जैसे समकक्षों की तुलना में डीजीसीए के लिए धन आवंटन मामूली है, जो दसियों हजार कर्मियों को रोजगार देता है.
भारत का विमानन बाजार विश्व स्तर पर भले तीसरे स्थान पर है, लेकिन इसकी नियामक संस्था में कर्मियों की संख्या और वित्तीय क्षमता उसके अनुपात में नहीं है. यह असंतुलन तनाव पैदा करता है. भारतीय विमानन क्षेत्र में हाल के वर्षों में तकनीकी कमियों के बढ़ते मामले सामने आये हैं. जिन तकनीकी समस्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है, वे हैं- इंजन की चेतावनी, हाइड्रोलिक विफलताएं, ईंधन तेल का रिसाव, उड़ान के बीच में विमान की वापसी तथा जमीनी देरी और मार्ग परिवर्तन. कुछ मामलों में, एयरलाइनों पर वैध उड़ान योग्यता दस्तावेजों के बिना परिचालन करने जैसी खामियों के लिए जुर्माना लगाया गया है. विमानन पारिस्थितिकी तंत्र आपस में जुड़ा हुआ है.
रखरखाव में देरी, पायलटों की कमी, आपूर्ति शृंखला के मुद्दे या हवाई यातायात नियंत्रण में खराबी तेजी से व्यापक असर डाल सकते हैं. चार्टर और एयर एंबुलेंस की निगरानी का मामला भी महत्वपूर्ण है. वाणिज्यिक एयरलाइंस कंपनियां कड़ी निगरानी में काम करती हैं. चार्टर ऑपरेटरों और एयर एंबुलेंसों को भी इसी तरह निरंतर उड़ान योग्यता मानकों को पूरा करना होगा. सभी विमानों में लगातार ऑडिट सुनिश्चित करने के लिए जनशक्ति और नियामक शक्ति की आवश्यकता होती है. एयर एंबुलेंस दुर्घटना का सही कारण तो ब्लैक बॉक्स विश्लेषण सहित जांच से पता चलेगा, लेकिन यह हादसा प्रतिकूल मौसम के कारण हुआ होगा. इसके बावजूद सभी ऑपरेटर श्रेणियों में निगरानी तंत्र मजबूत होना चाहिए.
बड़ी हवाई दुर्घटनाओं के बाद विस्तृत जांच रिपोर्ट जारी करने में देरी पारदर्शिता की कमी के बारे में बताती है. जबकि जन विश्वास के लिए पारदर्शिता महत्वपूर्ण है. जब दुर्घटना होती है, तो प्रश्न उठते हैं कि क्या रखरखाव की जांच नियमित थी, क्या ऑडिट समय पर पूरे किये गये थे, क्या नियामक चेतावनियां पहले जारी की गयी थीं, आदि-आदि. भारत में विमानन क्षेत्र का विस्तार आर्थिक आवश्यकता है, पर यह विस्तार संस्थागत मजबूती के अनुरूप होना चाहिए. ऐसे में, हवाई यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए इन बातों पर ध्यान देना होगा- डीजीसीए का फंड बढ़ाने के साथ कर्मियों की संख्या बढ़ानी होगी, नियामक को अधिक परिचालन स्वायत्तता देनी होगी, कुशल निरीक्षकों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन देना होगा, जांच रिपोर्टों को पारदर्शी होना होगा और इन्हें समय पर जारी करना होगा तथा चार्टर और एयर एंबुलेंस ऑपरेटरों की मजबूत निगरानी करनी होगी.
विमानन में सुरक्षा कई स्तरों के, यानी पायलटों, इंजीनियरों, निरीक्षकों और संस्थानों के भरोसे पर निर्भर करती है. जब यात्री विमान में सवार होते हैं, तब वे सिर्फ कॉकपिट क्रू पर नहीं, प्रभावी ढंग से काम करने वाले पूरे नियामक पारिस्थितिकी तंत्र पर भरोसा करते हैं. भारत के विमानन क्षेत्र ने उल्लेखनीय वृद्धि हासिल की है. अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इसका सुरक्षा ढांचा उसी गति से विकसित हो, क्योंकि विमानन क्षेत्र आत्मविश्वास पर बना है और आत्मविश्वास जवाबदेही पर टिका होता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
