संवेदना और सहकार

सरकारी राहत कोष में तथा नागरिक संगठनों व स्वयंसेवकों को आर्थिक सहयोग देकर नागरिकों और उद्योग जगत को हरसंभव योगदान करना चाहिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए उठाये गये कदमों से लोगों, खासकर गरीबों, को हो रही परेशानी के लिए माफी मांगी है. उन्होंने अपने संबोधन ‘मन की बात’ में फिर से इस बात को रेखांकित किया कि उनके सामने ऐसे फैसलों के अलावा और कोई चारा नहीं था. यह जगजाहिर है कि कोविड-19 नामक इस वायरस को रोकने का कोई टीका या कोई दवा नहीं है और इसके संक्रमण की गति भी बहुत तेज है.

ऐसे में सार्वजनिक स्थानों पर या सामाजिक स्तर पर मेल-जोल को रोक कर ही इसके प्रसार को रोका जा सकता है. आज विश्व के बड़े हिस्से में लॉकडाउन है यानी लोग अपने घरों में रहने के लिए मजबूर हैं. हमारे देश में यदि सावधानी नहीं बरती गयी, तो किसी भी समय स्थिति बेकाबू हो सकती है. इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी को देशव्यापी लॉकडाउन करने जैसा बड़ा फैसला करना पड़ा क्योंकि हमारे सामने कोई और विकल्प नहीं है.

इस कदम से हर तरह की, विशेष रूप से आर्थिक, गतिविधियों पर गंभीर असर पड़ा है तथा इसका सबसे ज्यादा खामियाजा गरीबों और निम्न आय वर्ग को भुगतना पड़ा है. हम देख रहे हैं कि रोजी-रोटी के जरिया बंद होने और सर से छत छिन जाने से बहुत बड़ी संख्या में कामगारों ने अपने गांवों का रुख कर लिया है. साधनों के बंद होने की वजह से लोग पैदल ही सैकड़ों-हजारों किलोमीटर के सफर पर हैं. इनमें बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, बीमार, और दिव्यांग भी हैं.

गरीब तबके के जो लोग अब भी शहरों में हैं, वे भी आशंकित हैं कि जाने कब कूच करने की हालत पैदा हो जाए. भविष्य तो भविष्य, वर्तमान भी अनिश्चितताओं से घिरा है. यह लड़ाई जीतने के बाद उद्योग, कारोबार और रोजगार की संभावित स्थितियों को लेकर भी आशंकाएं हैं. ऐसे में, जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है, संक्रमण से बचने के की शारीरिक और सामाजिक दूरी बनाना है, न कि भावनात्मक और मानवता के स्तर पर एक-दूसरे से अलग-थलग पड़ना है. आस-पड़ोस से लेकर गली-मुहल्लों तक में लोग आपस में संवाद बनाये रखने और किसी मुश्किल में साथ देने की बड़ी जरूरत है.

यह देखना भावुक अनुभव है कि देशभर में लोग जरूरतमंद लोगों को खाना-पीना, नकदी और दवाइयां उपलब्ध करा रहे हैं. केंद्र और राज्य सरकारें भी राहत मुहैया करा रही हैं. इन कोशिशों का दायरा बढ़ाने की दरकार है. अफसोस की बात है कि संक्रमण की आशंका के कारण अपने को अलग-थलग रह रहे तथा मेडिकल से लेकर अन्य अन्य जरूरी सेवाएं दे रहे लोगों के साथ भेदभाव की भी घटनाएं हो रही हैं. पुलिस और प्रशासन के स्तर पर भी दुर्व्यवहार की खबरें आ रही हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. सरकारी राहत कोष में तथा नागरिक संगठनों व स्वयंसेवकों को आर्थिक सहयोग देकर नागरिकों और उद्योग जगत को हरसंभव योगदान करना चाहिए.

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Published by: संपादकीय

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