राष्ट्र निर्माण में नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण
concept of nation in India : एक उन्नत और समृद्ध राष्ट्र के लिए वहां के नागरिकों को भी कुछ उत्तम कर्तव्य निभाने चाहिए. उन कर्तव्यों में कुछ तो सनातन हैं और कुछ ऐसे हैं, जो समय, काल और परिस्थिति के आधार पर तय होते रहते हैं.
concept of nation in India : किसी भी राष्ट्र के निर्माण में वहां के नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. यहां नागरिक शब्द का मतलब, जन, यानी जनता से है. एक आदर्श समाज के निर्माण के लिए नागरिकों के लिए कुछ अहम मापदंड होते हैं. जिस राष्ट्र की जनता जितनी अनुशासित और व्यवस्थित होती है, उस राष्ट्र को उतना ही उत्तम और समृद्ध माना जाता है. जहां तक भारत राष्ट्र की बात है, तो वह विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक है. इसीलिए भारतीय राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी गयी है. क्योंकि, जिस प्रकार दुनिया के अन्य भागों में राष्ट्र-राज्य की संकल्पना विकसित हुई, वैसा भारत में नहीं हुआ है. इसे समझने के लिए हमें वेदों में वर्णित राष्ट्र से संबंधित तथ्यों को समझना होगा.
अथर्ववेद के मंत्रों में राष्ट्र की आराधना और व्याख्या की गयी है. इससे स्पष्ट होता है कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा आधुनिक नहीं, प्राचीन है. अथर्ववेद का एक मंत्र है- ‘भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः तपोदीक्षां उपसेदुःअग्रे, ततो राष्ट्रं बलं ओजश्व जातं तदस्मै देवाः उपसं नमन्तु.’ अर्थात, आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत कल्याण की इच्छा से सृष्टि के आरंभ में दीक्षा लेकर अपने तप द्वारा राष्ट्र तेज को उत्पन्न किया. इसी तेज से राष्ट्र के दो प्रमुख घटक राजा और प्रजा प्रकट हुए. साथ ही, राष्ट्र के सभी घटकों का निर्माण हुआ. वहीं, ऋग्वेद में एक ऐसे सुसंगठित राष्ट्र की कल्पना की गयी है, जहां राष्ट्र के सदस्य एक-दूसरे की सहायता के लिए हर समय तत्पर रहते हैं.
इस प्रकार हम देखते हैं कि एक उन्नत और समृद्ध राष्ट्र के लिए वहां के नागरिकों को भी कुछ उत्तम कर्तव्य निभाने चाहिए. उन कर्तव्यों में कुछ तो सनातन हैं और कुछ ऐसे हैं, जो समय, काल और परिस्थिति के आधार पर तय होते रहते हैं. उन कर्तव्यों में से ऐसे पांच नागरिक कर्तव्यों को चुना गया है, जो आज के लिए बेहद जरूरी हैं. उनमें से पहला है सामाजिक समरसता. समाज में मौजूद हर तरह के भेदभाव को समाप्त करना और एक समान चलने का प्रण लेना. हम तभी एक समृद्ध और बलशाली राष्ट्र कहलायेंगे एवं जो संसाधन उपलब्ध हैं, उसके हिस्सेदार होंगे, जब हम एक साथ मिलकर चलेंगे और सोचेंगे.
हमारा दूसरा नागरिक कर्तव्य, अपने परिवार और कुटुंबों को संगठित रखना है.
यदि परिवार और कुटुंब संगठित नहीं रहे, तो राष्ट्र भी बिखर जायेगा. इसलिए कुटुंबों का प्रबोधन आज का युगधर्म है. वैसे भी, भारतीय संस्कृति में परिवार को अत्यंत पवित्र संस्था के रूप में परिभाषित किया गया है. संस्कारों का संरक्षण, माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति सम्मान, बच्चों को अच्छे संस्कार देना और परिवार में अनुशासन बनाये रखना आवश्यक है. संयुक्त परिवार की परंपरा, आधुनिक जीवनशैली के बावजूद परिवारों को आपस में जोड़े रखना, महिला सशक्तिकरण, परिवार में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना और निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ाना, आज के परिवार के लिए जरूरी तत्व हैं. तीसरा नागरिक कर्तव्य पर्यावरण व प्रकृति का संरक्षण है. पश्चिमी सोच ने प्रकृति को एक कमजोर नारी के रूप में देखा और उसके खिलाफ संघर्ष प्रारंभ कर दिया, जबकि भारतीय संस्कृति प्रकृति के संरक्षण की रही है. प्रकृति को हम देवताओं के अंश के रूप में देखते हैं. प्रकृति संरक्षण के लिए हम वृक्ष लगा सकते हैं, वृक्षों की सेवा कर सकते हैं. जो लोग प्रकृति की अवहेलना कर रहे हैं उन्हें सकारात्मक तरीके से प्रबोधित कर सकते हैं. पर्यावरण और प्रकृति के प्रति जागृति लाने की कोशिश कर सकते हैं.
एक बड़ी विडंबना यह है कि हम स्वदेशी वस्तुओं पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करते. यदि हमें आत्मनिर्भर बनना है, तो स्वदेशी अपनाना ही पड़ेगा. स्वदेशी से ही स्वावलंबन आयेगा. यदि हम आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे, तो राष्ट्र की मजबूती अधूरी रहेगी. आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्थानीय उद्योगों, स्वरोजगार और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना, हमारी प्रथमिकताओं में शामिल होना चाहिए. ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों से प्रेरित होकर देशी उत्पादों का प्रयोग और उत्पादन, हमारे आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक है. व्यक्तिगत स्तर पर आत्मनिर्भरता का अर्थ हर नागरिक को इतना सक्षम बनाना है कि वह अपने परिवार और समाज का सहारा बन सके. प्रत्येक भारतीय का एकमात्र लक्ष्य ऐसे भारत का निर्माण करना होना चाहिए जो विदेशी निर्भरता से मुक्त हो और अपनी क्षमताओं पर खड़ा हो.
पांचवां नागरिक कर्तव्य है, राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को याद रखना. जैसे, हर नागरिक को लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदान में भाग लेना चाहिए. करों का ईमानदारी से भुगतान, ट्रैफिक नियमों का पालन और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, स्वच्छता और सेवा, अपने आसपास सफाई रखना और जरूरतमंदों की मदद करने जैसे कर्तव्य हर भारतीय नागरिक को निभाने चाहिए. अंत में, आधुनिक भारत के निर्माण में यदि हम अपनी भूमिका सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो देश की जनता को अनुशासित करना होगा. इसके लिए सरकारी स्तर पर सारे कार्य नहीं हो सकते. सो, हम सभी को नागरिक कर्तव्यों को अपने हाथों में लेना होगा. यदि उपरोक्त पांचों नागरिक कर्तव्य को प्रत्येक नागरिक निष्ठापूर्वक निभाता है, तो हमारे राष्ट्र को समृद्ध, सशक्त और सुरक्षित होने से दुनिया की कोई शक्ति नहीं रोक सकती. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
