संसद में गतिरोध बने रहना चिंता का विषय

Parliament : विपक्ष के 118 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया. भले ही अध्यक्ष को हटाने के लिए जरूरी संख्याबल विपक्ष के पास न हो, लेकिन इससे लोकसभा अध्यक्ष की छवि प्रभावित होती है.

Parliament : वर्षों से संसद के कामकाज में आयी गिरावट हमारी सामूहिक चिंता का कारण बनती जा रही है. कई बार बिना चर्चा के ही संसद में बिल पारित हो जाते हैं. संसद चल रही होती है, और माननीय सदस्यगण अध्यक्ष के आसन तक पहुंच जाते हैं. वे एक-दूसरे पर कागज फेंकते हैं. संसदीय कार्यवाही कई दिनों तक रुक जाती है और पीठासीन अधिकारियों पर पक्षपात के आरोप लगाये जाते हैं. ये सब अब संसदीय आचरण का हिस्सा बन चुके हैं. इसके बावजूद बजट सत्र के पहले चरण में जो हुआ, वह बेहद चिंताजनक है.

विपक्ष के 118 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया. भले ही अध्यक्ष को हटाने के लिए जरूरी संख्याबल विपक्ष के पास न हो, लेकिन इससे लोकसभा अध्यक्ष की छवि प्रभावित होती है. वर्षों के संसदीय इतिहास में विपक्ष ने यह कदम उठाने के बारे में सोचा न था. उतना ही अभूतपूर्व वह कदम था, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री को लोकसभा में आने से रोका. उनके पास ठोस सूचना थी कि प्रधानमंत्री जहां बैठते हैं, वहां कांग्रेस की महिला सांसद बाधा पहुंचाने का काम कर सकती हैं.

दूसरे शब्दों में, लोकसभा अध्यक्ष चिंतित थे कि प्रधानमंत्री को निशाना बनाया जा सकता है, इसलिए लोकसभा में उनका आना सुरक्षित नहीं. लोकसभा अध्यक्ष की यह सूचना सुरक्षा के लिहाज से बेहद चौंकाने वाली थी. गौरतलब है कि 2024 के मध्य से वॉच एंड वार्ड स्टाफ नहीं, बल्कि केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) पर संसद की सुरक्षा की जिम्मेदारी है. अगर सरकार की तरफ से किसी भी तरह यह संदेश जाये कि प्रधानमंत्री लोकसभा में सुरक्षित नहीं, तो यह बेहद गंभीर मामला है.


दूसरी तरफ, सरकार पर सुर्खियां बटोरने का आरोप लगाते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशिक पुस्तक, ‘फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी’ का जिक्र करते हुए 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीनी सेना की आक्रामकता के बरक्स केंद्र सरकार की कथित रक्षात्मकता का मुद्दा उठाने की कोशिश की. लेकिन चूंकि प्रकाशक ने इस पुस्तक के प्रकाशित न होने की जानकारी दी, तथा नरवणे ने भी प्रकाशक के रुख से सहमति जतायी, ऐसे में, स्थिति विस्फोटक हो गयी. स्थिति तब और जटिल हो गयी, जब एक एफआइआर दर्ज हो गयी और सदन में बहस किताब में दर्ज मुद्दे के बजाय इस पर केंद्रित हो गयी कि राहुल गांधी के पास यह किताब आयी कहां से. सदन में राहुल गांधी के भाषण के बाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने उनके खिलाफ एक प्रस्ताव पास कराया. उन्होंने राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द करने की मांग करने के साथ उन पर जीवनभर चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगाने की भी मांग की.


इन घटनाक्रमों के कारण संसद की दो महत्वपूर्ण संस्थाओं- यानी नेता प्रतिपक्ष तथा लोकसभा अध्यक्ष की छवि प्रभावित हुई. इसने एक बार फिर सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच भरोसे की कमी की रेखांकित किया, जिस कारण संसद ही नहीं चल पायी. इस कारण सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद भी कठिन हो गया. बेशक संसद को सुचारु तरीके से चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है. लेकिन यह विपक्ष के सहयोग या आपसी संवाद में शालीनता के बगैर संभव नहीं है.

संसद में गतिरोध पैदा होना कोई नया नहीं है. मुझे 1996 का एक दृश्य याद आता है, जब सदन में भारी शोरगुल से परेशान तत्कालीन गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त संसद के सेंट्रल हॉल के दरवाजे के पास हाथों में अपना सिर टिकाये परेशान और निरुपाय बैठे थे. गठबंधन सरकारों के दौर में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच की असहमति से संसद के कामकाज में बार-बार गतिरोध पैदा होते थे. उस दौर में क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय खिलाड़ी बन गयी थीं, और उनके सांसद जब-तब संसद ठप कर अपने प्रमुखों को यह संदेश देते थे कि वे दिल्ली में अपने राज्य के हितों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं.

मुझे याद है कि दिसंबर, 2011 में लोकपाल बिल का विरोध करते हुए राजद के एक सांसद ने बिल की प्रति फाड़ दी थी. राजद प्रमुख लालू प्रसाद उस दिन विजिटर्स गैलरी में बैठे अपने सांसदों को देख रहे थे. वर्ष 2016 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुस्से में प्रदर्शन करते सांसदों को फटकारते हुए कहा था, ‘ईश्वर के लिए, अपना काम कीजिए’. अतीत में जब भी कभी संसद में गतिरोध पैदा होता था, तब पीठासीन अधिकारी सदन की कार्यवाही स्थगित कर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं को अपने कक्ष में बुलाकर संयम बरतने और सदन को सुचारु रूप से चलाने के लिए रास्ता निकालने की बात कहते थे. वैसे प्रयास अक्सर सफल होते थे, क्योंकि पीठासीन अधिकारी अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते थे.


इसके अलावा, तब दोनों ही ओर ऐसे कई नेता थे, जो संसद की गरिमा में विश्वास करते थे और चाहते थे कि संसद चले. तब हमारे संसदीय लोकतंत्र की क्या छवि थी? इसके उत्तर भी संसद से ही मिलते हैं. उस दौर के अनेक सांसदों के यादगार भाषण सुरक्षित हैं. सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच स्वस्थ रिश्तों की स्मृतियों की एक झलक स्वर्गीय सुषमा स्वराज के 2014 के एक भाषण से मिलती है, जब वह नेता प्रतिपक्ष थीं. सुषमा स्वराज ने 15वीं लोकसभा के विघटित होने से ठीक पहले जो कुछ कहा था, वह आज के संदर्भ में ऐतिहासिक है. उन्होंने कहा था, ‘भाई कमलनाथ अपनी शरारत से इस सदन को उलझा देते थे और आदरणीय शिंदे जी (सुशील कुमार शिंदे) अपनी शराफत से उसे सुलझा देते थे’.

उसके बाद सुषमा स्वराज ने संकट के समय मध्यस्थता के लिए सोनिया गांधी की प्रशंसा की. जबकि अतीत में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में इन्हीं सुषमा स्वराज ने अपना सिर मुड़वा लेने की धमकी दी थी. फिर तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनकी विनम्रता, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को उनकी सहिष्णुता और लालकृष्ण आडवाणी को उनकी न्यायप्रियता के लिए धन्यवाद दिया. जाहिर है, संसदीय गतिरोध के समय इन सबकी भूमिका उल्लेखनीय थी. सुषमा स्वराज ने कहा था कि ‘भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख भावना यह है कि विपक्ष में होते हुए भी हम शत्रु नहीं हैं’. इसीलिए वैचारिक मतभेदों के बावजूद संबंध बनाये रखना संभव हो सका. सुषमा स्वराज के ये शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने कि वे बारह साल पहले थे.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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