देश निर्माण में महिलाओं की भूमिका को मिले स्वीकृति

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का अर्थ उनकी भूमिका को स्वीकृति देना भी होता है कि महिला सामाजिक निर्माण में अपनी भूमिका निभा रही है.

यह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का अवसर है. इसे प्रति वर्ष देश में हर सरकारी संस्थानों, गैर-सरकारी संस्थान, स्कूलों-कॉलेजों आदि में मनाया जाता है. इसका अर्थ यह हुआ कि आज हर कोई महिलाओं से जुड़ी बातें सुनना चाहता है और उनके जीवन से जुड़ना चाहता है. ऐसे में इस अवसर पर महिलाओं की सामाजिक बराबरी में हुई प्रगति के बारे में बातें करना बहुत जरूरी हो जाता है. यह महिला आंदोलनों और उनके संघर्ष का ही नतीजा है, जिससे महिलाओं को कई आयामों में आगे बढ़ने का अवसर मिला है.
राजनीति में यदि महिलाआें की प्रगति की बात करें, तो महिलाओं को राजनीतिक हिस्सेदारी देने के लिए महिला आरक्षण बिल लाया गया. इसके अतिरिक्त, जब जी-20 का डिक्लेरेशन आया, तब उसमें भी विकास में महिलाओं की भागीदारी को सही तरीके से सामने रखा गया और भारत में महिला नेतृत्व में विकास की बातें कही गयीं. जी-20 का जो मसौदा तैयार किया गया, उसमें भी स्वीकार किया गया कि महिलाएं देश के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं. राजनीति के अतिरिक्त भी अन्य क्षेत्रों में बहुत सी चीजें हो रही हैं, जो महिलाओं की प्रगति को बताती हैं. देश में जो तरह-तरह के आर्थिक उद्यम हैं- स्व-उद्यम जैसे जो छोटे-छोटे उद्यम हैं- उनमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. तो यहां जो अच्छी बातें हुई हैं, उन्हें हमें स्वीकार करना चाहिए. साथ-साथ जो कठिनाइयां हैं, हमें उनकी तरफ भी देखना पड़ेगा. उन्हें हम नजरअंदाज नहीं कर सकते. जैसे महिलाओं के साथ हो रही हिंसा की घटनाएं. उनके बारे में बात करना जरूरी है. एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि महिलाओं के साथ हिंसा में चार प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इसका अर्थ हुआ कि महिलाएं अपने दम पर सामाजिक भागीदारी भी कर रही हैं, आर्थिक उद्यम में भी लगी हुई हैं. परंतु परिवार के भीतर उनकी स्थिति में अधिक परिवर्तन नहीं आया है. दूसरी तरफ जब हम देखते हैं कि महिलाओं को राजनीतिक हिस्सेदारी का जो अवसर मिल रहा है, विशेषकर पंचायतों में, वहां उन्होंने बहुत से काम किये हैं. बहुत सी रिपोर्ट यह बताती हैं कि जहां-जहां पंचायतों में महिलाएं 50 प्रतिशत भागीदारी कर रही हैं, वहां-वहां शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक विकास के बहुत सारे काम हुए हैं. इनमें हर घर जल पहुंचाने, शौचालय बनवाने आदि को लेकर गंभीरता से काम करवाया गया है. इसका अर्थ हुआ कि महिलाएं धीरे-धीरे कर अपनी सामाजिक भूमिका को समझ रही हैं और उस समझ के साथ आगे बढ़ रही हैं. महिलाएं आगे बढ़ भी रही हैं, और उनके सामने जो चुनौतियां हैं उन्हें दूर करने के लिए अपने स्तर से प्रयास भी कर रही हैं.


जहां तक राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी की बात है, तो यह कहने की नहीं, करके दिखाने की बात है. और आज यह जिम्मेदारी सभी राजनीतिक दलों पर है. कारण यह कि सभी राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने में कोताही कर रहे हैं. चूंकि अब महिलाओं का वोट महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि महिलाएं पुरुषों से कहीं अधिक संख्या में मतदान में भाग ले रही हैं और जिस भी दल के पक्ष में मतदान करना चाह रही हैं, खुलकर कर रही हैं. ऐसे में यदि उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ती है, तो उसके तीन लाभ होंगे. पहला, जो भी राजनीतिक दल उनकी भागीदारी बढ़ायेंगे, उनके साथ महिलाएं जुड़ेंगी. उनका भरोसा बढ़ेगा और आने वाले समय में उनकी राजनीति और अधिक परिपक्व होगी. दूसरा, जब महिलाएं राजनीति में आयेंगी और राजनीतिक नेतृत्व उनको मिलेगा, तो वे सामाजिक विकास के तमाम कार्यों को जिम्मेदारी के साथ करेंगी. यह पंचायती राज में स्पष्ट दिखाई दे रहा है. तीसरा, उन पर होने वाली हिंसा भी रुकेगी. क्योंकि जब महिला नेतृत्व को स्वीकृति मिलेगी, तो समाज में उनका दर्जा भी बढ़ेगा. राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने का अर्थ उनकी भूमिका को स्वीकृति देना भी होता है कि महिला सामाजिक निर्माण में अपनी भूमिका निभा रही है.
जहां तक परिवार का मामला है, तो भारतीय समाज में परिवार के अंदर आज लोग महिलाओं से यह अपेक्षा करते हैं कि वह नौकरी भी करे, घर आकर चूल्हा-चौका भी देखे, बच्चा भी पाले और परिवार के बुजुर्गों की सेवा भी करे. आज की परिस्थिति में यह संभव नहीं है. इसलिए अब पुरुषों को भी अपने घर की महिलाओं के साथ घर-गृहस्थी के काम में साझेदारी करनी होगी. साथ ही उन पर हो रही हिंसा को भी पूरी तरह रोकना पड़ेगा. जब तक महिलाओं के विरुद्ध होने वाली सभी तरह की हिंसा पर रोक नहीं लगेगी, लड़के-लड़की को बराबरी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक विश्व पटल पर शीर्ष देश के रूप में स्थापित होने का हमारा सपना भी साकार नहीं होगा. इतना ही नहीं, हमारे घर के बेटों को, पुरुषों को जो विशेषाधिकार मिला हुआ है, वह भी बना रहेगा. तो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर, हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि जब तक हम देश के निर्माण में महिलाओं की भूमिका को पूरी तरह स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हमारा सारा प्रयास अधूरा है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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