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  • May 20 2019 2:58AM
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विद्यासागर और महात्मा गांधी

 रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
 
चार महीने बाद महान शिक्षाविद, समाज सुधारक, दार्शनिक, लोकोपकारक, मुद्रक, प्रकाशक, उद्यमी, मानवतावादी, दानवीर, लेखक, अनुवादक, एकेडमिक, नारी शिक्षा के प्रबल समर्थक राजा राममोहन राय (22 मई, 1772- 27 सितंबर, 1833) के उत्तराधिकारी बंगाल नवजागरण के प्रमुख स्तंभ ईश्वरचंद्र विद्यासागर (26 सितंबर, 1820- 29 जुलाई, 1891) की द्विजन्मशती आरंभ हो रही है और अभी महात्मा गांधी (2 अक्तूबर, 1869- 30 जनवरी, 1948) की 150वीं जयंती मनायी जा रही है. 
 
लगभग एक ही समय चुनाव-प्रचार के दौरान कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी गयी और मालेगांव बम विस्फोटक की मुख्य आरोपी, भाेपाल संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर ने गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे (19 मई, 1910- 15 नवंबर,1949) को देशभक्त कहा- 'नाथुराम गोडसे देशभक्त थे, हैं और रहेंगे.
 
' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिक्रिया व्यक्त की- 'साध्वी प्रज्ञा को कभी मन से माफ नहीं कर पाऊंगा.' बाद में प्रज्ञा ठाकुर ने माफी मांगी. हेमंत करकरे पर दिये अपने बयान के बाद भी उन्होंने माफी मांग ली थी. प्रज्ञा ठाकुर के गोडसे-संबंधी विचार को भाजपा ने उनका निजी विचार कहा और जनता को यह बताया कि पार्टी उनके साथ नहीं है.
 
 भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दस दिन में अनुशासनात्मक कमेटी द्वारा फैसला लेने की बात कही है. जबकि मणिशंकर अय्यर को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री को 'नीच' कहे जाने पर पार्टी से निलंबित कर दिया था. भाजपा ने प्रज्ञा ठाकुर को निलंबित क्यों नहीं किया? प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने की बात विचारधारा और राष्ट्रहित के खातिर कही गयी है. 
 
ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति किसने तोड़ी? उन्मादी भीड़ तो तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों की थी. बिना किसी ठोस प्रमाण के प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने यह मूर्ति तोड़ी. बंगाल में चुनावी हिंसा साठ के दशक के अंत से आरंभ हुई है.
 
 बंगाल का भद्र समाज ही नहीं, सामान्य जन भी अपने नायकों-महानायकों के गौरव को कभी नहीं भूलता. ईश्वर चंद्र विद्यासागर का मूर्तिभंजक वह समाज शायद ही हो सकता है. अहंकारियों, उन्मादियों, उपद्रवियों, विद्याहीनों, समाज संहारकों की बात अलग है. विद्यासागर ने सच्चे नागरिक का धर्म स्वहित से पहले समाजहित और देशहित को माना था. 
 
उन्होंने संयम के साथ विद्यार्जन को महत्व दिया था और विद्या का संबंध सबके परोपकार से जोड़ा था. संयम से विवेक को, ध्यान को एकाग्रता से जोड़कर शांति, संतुष्टि और परोपकार को मनुष्यता से संबंध-स्थापन किया था. 'विद्या' को उन्होंने 'सबसे अनमोल धन' कहा है. उन्हें 'विद्यासागर' की उपाधि उनके कॉलेज ने प्रदान की. बाद में वे 'दयार सागर' भी कहलाये. 
 
माइकल मधुसूदन दत्त ने उनमें प्राचीन ऋषियों की-सी प्रतिभा और प्रज्ञा, अंग्रेजों की-सी ऊर्जा और बंग-माता की-सी सहृदयता देखी थी. गांधी ने उन्हें 1905 में केवल 'विद्या का सागर' न मानकर 'करुणा और उदारता आदि अनेक गुणों के सागर' भी कहा और रबींद्रनाथ ठाकुर ने उनका चारित्रिक गौरव केवल उनकी करुण और विद्या में न देखकर 'उनके निर्भ्रांत मानवीय गुणों एवं उनके अटल साहस' में भी देखा. 
 
विद्यासागर भुवनेश्वर विद्यालंकार के प्रपौत्र, रामजय तर्कभूषण के पौत्र और ठाकुर दास बंद्योपाध्याय के पुत्र थे. नाना तर्कशास्त्री रामकांत तर्कवागीश थे. शिक्षा के क्षेत्र में विद्यासागर ने क्रांतिकारी कार्य किये. साल 1856 में उनके प्रयत्नों से ही 'विधवा पुनर्विवाह कानून' बना.
 
 बंगाली शिक्षा और संस्कृति के विकास में उनका अप्रतिम योगदान है. बालविवाह, बहुविवाह, सतीप्रथा के वे विरोधी थे. उनके एकमात्र पुत्र नारायण चंद्र वंद्योपाध्याय ने स्वेच्छा से भावसुंदरी से विधवा-विवाह किया. शिक्षा का स्तर ऊंचा करने के लिए प्रत्येक जिले में मॉडल स्कूल खोलने की विद्यासागर ने योजना बनायी और योग्य अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए नाॅर्मल स्कूल खोले. 
 
उनके महत्व को समझने के लिए सुबत्र चंद्र मिश्रा की 675 पृष्ठों की, 36 अध्यायों में लिखी गयी पुस्तक 'ईश्वरचंद्र विद्यासागर एंड हिज इल्यूसिव माइलस्टोंस' (न्यू बंगाल प्रेस, 1902) विशेष महत्वपूर्ण है. विद्यासागर के निधन के बाद उनके स्त्री प्रशंसकों ने 'लेडीज विद्यासागर कमेटी' की स्थापना की. शांतिपुर के जुलाहों ने साड़ियों की किनारी पर विधवा पुनर्विवाह की प्रशंसा वाले पद्य को शामिल किया था, जो विद्यासागर साड़ियां कहलायीं. 
 
ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मूर्तिभंजक उन मूल्यों के विरुद्ध हैं, जिनके प्रति विद्यासागर समर्पित थे. पिछले कुछ वर्षों में देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों और विद्यानुगारियों पर हमले किसने किये? महात्मा गांधी अखंडता और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं. इसलिए गोडसे को देशभक्त कहनेवालों की मानसिकता हमें समझनी होंगी. 
 
हाल में 'टाइम' पत्रिका में आतिश तासीर ने नरेंद्र मोदी को 'डिवाइडर इन चीफ' कहा है. देश की वर्तमान राजनीति को न तो विद्यासागर से मतलब है, न गांधी से. गांधी शांति, सत्य और अहिंसा के पुजारी थे.
 
 भाजपा और उनके अनुयायी-समर्थक क्या सचमुच शांति, सत्य और अहिंसा के साथ हैं? फिर हमारे चारों ओर अशांति, झूठ और हिंसा क्यों है? प्रश्न बंगाली अस्मिता का ही नहीं, भारतीय अस्मिता की रक्षा का भी है. गांधी ने पूरे देश को एक किया. आज विभाजनकारी शक्तियां प्रबल हैं. सत्तालोलुपों ने देश को नरक-द्वार पर ला खड़ा कर दिया है.
 
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