प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को सामने रखते हुए आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा, कृषि, युवा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर जोर दिया.
लेकिन किसी भी बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य की विश्वसनीयता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसकी मापने योग्य प्रगति से तय होती है.
विकसित भारत का लक्ष्य 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का है.
ऐसे में अगले दो दशक में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार जिन क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रही है, उनमें वास्तविक बदलाव कितना हुआ. इसके लिए केवल बजट खर्च, सड़क की लंबाई, योजनाओं की संख्या या प्रशिक्षण पाने वाले लोगों की गिनती पर्याप्त नहीं होगी. असली सवाल होगा- इन खर्चों और योजनाओं का नागरिकों की आय, रोजगार, उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ा?
इसी नजरिए से विकसित भारत के लिए सरकार के प्रदर्शन को कुछ स्पष्ट संकेतकों के जरिए लगातार मापा जा सकता है.
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1. GDP के साथ रोजगार का आंकड़ा भी जरूरी
भारत के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल GDP बढ़ना पर्याप्त नहीं है. यदि आर्थिक वृद्धि के साथ पर्याप्त रोजगार नहीं बनते, तो उसका लाभ आम नागरिक तक सीमित रह सकता है.
इसलिए हर महीने या तिमाही यह बताया जाना उपयोगी होगा कि कितने नए फॉर्मल रोजगार बने, मैन्युफैक्चरिंग में कितनी नौकरियां बढ़ीं, युवाओं का रोजगार स्तर क्या रहा, महिलाओं की रोजगार भागीदारी कितनी बढ़ी और वास्तविक मजदूरी में कितना बदलाव आया.
सरकार का फोकस युवाओं, startups, skill development और manufacturing पर है. इसलिए इन क्षेत्रों के परिणामों को रोजगार के आंकड़ों से जोड़कर देखना जरूरी होगा.
2. ‘Make in India’ से आगे, भारत में कितना वैल्यू एडिशन?
आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल भारत में अंतिम उत्पाद को असेंबल करना नहीं होना चाहिए. असली सवाल यह है कि किसी उत्पाद में भारतीय वैल्यू एडिशन कितना है.
इलेक्ट्रॉनिक्स, डिफेंस, सोलर, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और दूसरे क्षेत्रों में यह जानना जरूरी है कि निर्यात किए जा रहे उत्पाद में कितने प्रतिशत मूल्य देश में जोड़ा गया और कितने घटक आयातित हैं.
इसके साथ ही भारत का वैश्विक निर्यात में हिस्सा, हाई-वैल्यू एक्सपोर्ट, इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन और किन देशों पर निर्यात निर्भर है- इन आंकड़ों को भी नियमित रूप से सामने लाना चाहिए.
इससे यह स्पष्ट होगा कि भारत वास्तव में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बन रहा है या केवल वैश्विक सप्लाई चेन का असेंबली सेंटर.
3. ऊर्जा सुरक्षा: आयात पर निर्भरता कितनी घट रही है?
भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण है. कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता और वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं.
इसलिए हर महीने क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल, घरेलू तेल और गैस उत्पादन, नई रिन्यूएबल क्षमता, परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की प्रगति और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की स्थिति जैसे आंकड़ों को ट्रैक किया जा सकता है.
सिर्फ यह बताना कि कोई बड़ा ऊर्जा प्रोजेक्ट शुरू हुआ है पर्याप्त नहीं होगा. उसकी मासिक प्रगति, 20 प्रतिशत, 30 प्रतिशत, 50 प्रतिशत जैसी जानकारी से जनता यह देख सकेगी कि परियोजना अपने समयबद्ध लक्ष्य की ओर बढ़ रही है या नहीं.
4. टेक्नोलॉजी में भारत की असली क्षमता कितनी बढ़ी?
Semiconductor, AI, क्रिटिकल मिनरल्स और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी अब केवल आर्थिक क्षेत्र नहीं हैं। ये राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़े हैं.
इसलिए पेटेंट की संख्या, R&D पर खर्च, घरेलू सेमीकंडक्टर उत्पादन, क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता और AI से जुड़े कौशल तथा रोजगार जैसे संकेतकों की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण होगी.
भारत यदि तकनीकी नेतृत्व चाहता है, तो उसे यह भी दिखाना होगा कि वह टेक्नोलॉजी का उपभोक्ता बनने से आगे बढ़कर उसका निर्माता कितना बन रहा है.
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5. कृषि: उत्पादन से आगे किसान की वास्तविक आय
कृषि के मामले में केवल यह बताना कि इस वर्ष गेहूं या धान का उत्पादन कितना हुआ, पर्याप्त नहीं है. असली सवाल किसान की आय और उत्पादकता का है.
फसल की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता, वास्तविक किसान आय, कृषि निर्यात, प्रोसेस्ड फूड एक्सपोर्ट, कोल्ड-चेन क्षमता, फसल विविधीकरण और निर्यात में कृषि उत्पादों की अस्वीकृति जैसे आंकड़े ज्यादा उपयोगी होंगे.
विशेष रूप से यह देखना महत्वपूर्ण है कि किसी अंतिम उत्पाद की कीमत में किसान का हिस्सा कितना है. इससे कृषि उत्पादन और किसान की आर्थिक स्थिति के बीच का अंतर समझने में मदद मिलेगी.
6. इंफ्रास्ट्रक्चर: कितने किलोमीटर नहीं, कितना आर्थिक फायदा?
भारत में हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट और वाटरवेज पर बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है. लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता को केवल बनाई गई सड़कों या एयरपोर्ट की संख्या से नहीं मापा जा सकता.
जरूरी सवाल होंगे- लॉजिस्टिक्स लागत कितनी घटी? माल की औसत आवाजाही का समय कितना कम हुआ? रेलवे और हाईवे की क्षमता का कितना इस्तेमाल हो रहा है? एयरपोर्ट पर प्रतिदिन कितनी उड़ानें हैं? कितनी परियोजनाएं समय से पीछे चल रही हैं?
यानी इंफ्रास्ट्रक्चर का आउटपुट नहीं, उसका आर्थिक आउटपुट महत्वपूर्ण होगा.
7. युवाओं के लिए ट्रेनिंग से नौकरी तक का सफर
भारत के युवा विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए स्किल ट्रेनिंग को वास्तविक रोजगार से जोड़ना होगा.
कितने युवाओं ने प्रशिक्षण लिया, उनमें से कितनों को नौकरी मिली, प्रशिक्षण से पहले और बाद की आय में कितना अंतर आया, कितने अप्रेंटिस बने और कितने युवाओं ने उद्यम शुरू किए- इन आंकड़ों से योजनाओं की वास्तविक सफलता पता चल सकती है.
सिर्फ यह कहना कि लाखों लोगों को प्रशिक्षण दिया गया, पर्याप्त नहीं है. सवाल होना चाहिए- ट्रेनिंग के बाद उनकी जिंदगी कितनी बदली?
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8. राष्ट्रीय सुरक्षा अब सिर्फ सीमा तक सीमित नहीं
आधुनिक युद्ध के दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल सीमा सुरक्षा नहीं है. साइबर हमले, बैंकिंग सिस्टम, ऊर्जा प्रतिष्ठान, रिफाइनरी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और महत्वपूर्ण सप्लाई चेन भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा हैं.
इसलिए साइबर घटनाओं, प्रतिक्रिया समय, रणनीतिक भंडार और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा जैसे संकेतकों पर भी नियमित निगरानी जरूरी होगी.
9. संस्थागत सुधार: सरकार कितनी तेजी से डिलीवर कर रही है?
विकसित भारत के लिए मजबूत संस्थानों की जरूरत होगी. न्यायिक लंबित मामलों, रेगुलेटरी देरी, सरकारी परियोजनाओं में देरी, नागरिक शिकायतों के समाधान और भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई जैसे संकेतक सरकार की संस्थागत क्षमता को माप सकते हैं.
हर मंत्रालय के लिए स्पष्ट KPI- Key Performance Indicators तय किए जाएं और यह बताया जाए कि निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले प्रदर्शन कितना रहा.
नागरिकों से डिजिटल माध्यम से सेवा-संतुष्टि का फीडबैक लेना भी सरकारी जवाबदेही को मजबूत कर सकता है.
10. सबसे जरूरी सवाल: 2047 तक हर साल कितना हासिल करना है?
विकसित भारत 2047 कोई एक दिन में हासिल होने वाला लक्ष्य नहीं है.
इसलिए 2025 को बेसलाइन मानकर 2026, 2027, 2028 और आगे हर वर्ष के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं.
आखिर 2047 का लक्ष्य तभी विश्वसनीय बनेगा जब नागरिक यह देख सकें कि आज हम कहां हैं, अगले साल कहां पहुंचना है और उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कौन-सा मंत्रालय क्या कर रहा है.
