सुप्रीम कोर्ट ने कहा- CJP प्रोटेस्ट के दौरान छात्रों के साथ हुई बर्बरता की जांच के लिए बनाई गई कमेटी का दोबारा नहीं होगा गठन, आरोप निराधार

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए बनी कमेटी को बदलने से इनकार कर दिया है. सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट के सामने इस कमेटी के पुनर्गठन की मांग की थी.

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ आयोजित छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस ज्यादतियों की जांच के लिए बनाई गई पांच मेंबर वाली कमेटी (HPEC) को फिर से बनाने से मना कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस कमेटी को दोबारा से बनाने के लिए जो आरोप पैनल पर लगाए जा रहे हैं वो अंदाजे और धारणाओं पर आधारित हैं.


निष्पक्षता के साथ हुआ है कमेटी का गठन

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया(CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि कमेटी को निष्पक्षता और ट्रांसपेरेंसी के ऊंचे स्टैंडर्ड और निष्पक्ष नजरिए के साथ बनाया गया है. अभी से कमेटी के कार्यों पर सवाल उठाना सही नहीं होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी कोर्ट के सामने किसी एक या दूसरे पक्ष के कारणों का समर्थन करने के लिए नहीं बनाई गई है. इस कमेटी का उद्देश्य यह बताना है कि 20 जुलाई के दिन जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ ज्यादती हुई थी या नहीं?

कमेटी में बदलाव की गुंजाइश नहीं

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 10 सितंबर के ऑर्डर में इस मांग को ठुकरा दिया कि जांच कमेटी दोबारा बनाई जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को आज 16 सितंबर को कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है. बेंच ने कहा, हम कमेटी के गठन में कोई बदलाव करने के पक्ष में नहीं हैं, खासकर तब जब ऐसे पुनर्गठन की प्रार्थना सिर्फ अंदाजे और पहले से बनी-बनाई बातों पर आधारित हैं.


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By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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