PHOTO : जब जंतर-मंतर खाली हुआ… तिरंगे समेटे गए, टेंट उखड़े और हजारों सपने अपने घर लौट गए

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PHOTO : जब जंतर-मंतर खाली हुआ… तिरंगे समेटे गए, टेंट उखड़े और हजारों सपने अपने घर लौट गए
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जंतर मंतर की तस्वीर (Photo- PTI)

शनिवार (25 जुलाई) की रात ठीक 12 बजे. दिनभर नारों से गूंजने वाला जंतर-मंतर एक अलग ही कहानी लिख रहा था. मंच पर रोशनी थी, लेकिन भीड़ का रंग बदल चुका था. कहीं जीत का जश्न था, तो कहीं बैग पैक हो रहे थे. कोई अपने शहर लौटने की तैयारी में था, तो कोई आखिरी बार उस जगह को कैमरे में कैद कर रहा था, जिसने उसे उम्मीद का नया अर्थ सिखाया.

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जंतर मंतर पर खुशी मनाते युवा

हजारों युवाओं की विदाई की रात

यह आंदोलन खत्म होने की रात नहीं थी. यह हजारों युवाओं की विदाई की रात थी, जो अलग-अलग शहरों से एक साझा सपने के साथ यहां पहुंचे थे. जंतर-मंतर की सड़क पर छात्र अपने बैग पैक कर रहे थे. किसी ने आंदोलन का पोस्टर यादगार के रूप में बैग में रखा, तो किसी ने तिरंगे को सबसे ऊपर सहेज लिया. कुछ के हाथों में ट्रेन के टिकट थे, कुछ रात की बस से लौटने वाले थे और कई पहली बार दिल्ली आए थे.

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जंतर मंतर पर युवा खुश नजर आए

युवा एक-दूसरे के मोबाइल में नंबर सेव करने लगे

थोड़ी दूर पर युवा एक-दूसरे के मोबाइल में नंबर सेव कर रहे थे. “संपर्क में रहेंगे”, “फिर मिलेंगे” जैसे छोटे-छोटे वादे इस आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी बन गए थे. कुछ दिन पहले तक अजनबी रहे लोग अब दोस्त बन चुके थे.

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जंतर मंतर पर युवाओं ने इस तरह मनाई खुशी

लंगर की आखिरी चाय पर भी रौनक

लंगर की आखिरी चाय पर भी रौनक थी. वहीं दूसरी ओर छात्र आंदोलन स्थल की सफाई में जुटे थे. कोई पोस्टर समेट रहा था, कोई पानी की बोतलें उठा रहा था. उधर पुलिस भी धीरे-धीरे बैरिकेड हटाने की तैयारी कर रही थी. खाली होती सड़कें बता रही थीं कि एक बड़ा अध्याय अपने अंतिम पड़ाव पर है.

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गरिमा तिवारी सेल्फी लेतीं

गरिमा तिवारी लगातार सेल्फी ले रही थीं

कानपुर से आई गरिमा तिवारी लगातार सेल्फी ले रही थीं. उन्होंने प्रभात खबर से कहा, “मैं खास तौर पर इस आंदोलन में शामिल होने आई थी. सरकार के फैसले के बाद इस ऐतिहासिक पल की गवाह बनना चाहती थी. ये तस्वीरें हमेशा याद दिलाएंगी कि बदलाव सड़कों पर भी लिखा जाता है.”

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आखिरी तस्वीरें खिंचवाते युवा

आखिरी तस्वीरें खिंचवा रही थीं अर्पिता और अदिति पांडेय

वहीं लखनऊ की अर्पिता और अदिति पांडेय अपने दोस्तों के साथ आखिरी तस्वीरें खिंचवा रही थीं. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ आंदोलन नहीं, जिंदगी का ऐसा अनुभव है जिसे वे हमेशा याद रखेंगी.

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जोश में युवा

जोश कम नहीं हुआ लोगों का

रात गहराती जा रही थी, लेकिन जोश कम नहीं हुआ था. कहीं देशभक्ति के गीत गूंज रहे थे, तो कहीं “भारत माता की जय” और “छात्र एकता जिंदाबाद” के नारे सुनाई दे रहे थे. यह आखिरी सेल्फी थी, आखिरी चाय थी और शायद इस आंदोलन का आखिरी नारा भी.

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लेखक के बारे में

By Amitabh Kumar

अमिताभ कुमार प्रभात खबर डिजिटल में Sr. Content writer हैं. पिछले 15 साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं.

अमिताभ 1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है.

प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है. 📩 संपर्क : amitabh.kumar@prabhatkhabar.in

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