कर्नाटक: राज्य के कई ग्रामीण इलाकों में सैलून में जाति के आधार पर भेदभाव के मामले सामने आते रहे हैं, जहां नाई दलितों के बाल काटने या शेविंग करने से इनकार कर देते हैं. इस तरह की भेदभावपूर्ण प्रथाओं को खत्म करने के उद्देश्य से समाज कल्याण विभाग ने सरकार द्वारा संचालित नाई की दुकानों की स्थापना की है. कर्नाटक सरकार ने गडग जिले के शिंगातालुर गांव में उच्च जाति के लोगों द्वारा दलितों के बाल काटने से कथित रूप से इनकार किए जाने के बाद गांव में दलितों के लिए सैलून खोला है. सामाजिक कल्याण विभाग के सूत्रों ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी.
विभाग के सूत्रों ने बताया कि गांव के दलितों को साल के एक विशेष समय के दौरान कई वर्षों से मुंडन या हेयरकट सेवाओं से वंचित रखा जा रहा था, जिसके कारण उन्हें बाल कटवाने के लिए पड़ोसी गांवों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता था. दलित निवासियों की शिकायतों के बाद, अधिकारियों ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए हस्तक्षेप किया और दलितों के लिए सैलून खोला गया. यह नाई की दुकान समाज कल्याण विभाग, तालुक प्रशासन, तालुक पंचायत, दलित संगठनों के एक समूह और शिवशरणा हडपद अप्पन्ना समुदाय के संयुक्त प्रयास से स्थापित की गई है. सूत्रों के अनुसार, पड़ोसी तिप्पापुर गांव के बासवराज हडपदा को शिंगतालूर में नाई की सेवाएं देने के लिए यह दुकान आवंटित की गई है.
क्या है अंधविश्वास, जिसकी वजह से होता है भेदभाव?
गांव में यह मान्यता प्रचलित थी कि वीरभद्रेश्वर स्वामी हर साल महानवमी के दौरान हडपाड़ा समुदाय के सदस्यों के घरों में आते हैं और उस समय दलितों के बाल काटना दुर्भाग्य लाता है. सूत्रों ने कहा, ‘इस अंधविश्वास का हवाला देते हुए, कुछ व्यक्तियों ने दलितों को सेवाएं देना बंद कर दिया था.’
अब सरकार ने इस मामले को अपने हाथ में लेते हुए खुद नाई की दुकान खोली है. विभागीय सूत्रों ने कहा, ‘यह पहल अस्पृश्यता उन्मूलन जागरूकता और सौहार्दपूर्ण जीवन कार्यक्रम के तहत की गई है, ताकि सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया जा सके और बुनियादी सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित हो.’ प्रभावित निवासियों की याचिकाओं के बाद अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और एक स्थायी समाधान सुनिश्चित किया. समाज कल्याण विभाग के सूत्रों के अनुसार, नाई की दुकान का औपचारिक उद्घाटन अधिकारियों और ग्रामीणों की मौजूदगी में किया गया.
पहले भी सामने आती रही हैं इस तरह की घटनाएं
कर्नाटक के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में इस अपमानजनक प्रथा की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं. अक्टूबर 2019 में, जब नाइयों ने दलितों को सेवाएं देने से मना किया था, तब स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस और तहसील प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा था. कोप्पल और धारवाड़ जैसे जिलों में भी इसी तरह की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं.
द हिंदू की 25 जून 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक के हुलिकल गांव में दलितों को दाढ़ी बनवाने या बाल कटवाने के लिए करीब आठ किलोमीटर का सफर करना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि गांव में नाई नहीं हैं; बल्कि ऑन-कॉल सेवा देने वाले नाई भी उनके घर आने से इनकार कर देते हैं. उस समय गांव के दलित युवाओं ने तय किया था कि वे किसी दूसरे इलाके से एक नाई को लाकर गांव में सैलून खुलवाएंगे, क्योंकि गांव का कोई भी नाई उस परंपरा को तोड़ने को तैयार नहीं है, जो दलितों को सेवाएं देने से रोकती है.
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केरल से मिला भेदभाव मिटाने का तरीका
यह पहल केरल में सामने आए उन मामलों से प्रेरित है, जहां दलितों को आम सैलून का इस्तेमाल करने से रोका गया था. बाद में वहां राज्य सरकार ने गांवों में सरकारी नाई की दुकानें शुरू की थीं, जिसके सकारात्मक असर के बाद कर्नाटक में भी ऐसा कदम उठाने की बात सामने आई.
यह प्रस्ताव राज्य के तत्कालीनन मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा की अध्यक्षता में आयोजित एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम की समीक्षा बैठक के एजेंडे का हिस्सा था. इस तरह के मामलों में सरकार ने प्रस्ताव रखा था कि अगर गांवों में दलितों को नाई की सेवाओं से वंचित रखा जाता है, तो इससे जुड़े अत्याचार के मामले दर्ज हो रहे हैं. ऐसे में प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र में स्थानीय निकाय के माध्यम से नाई की दुकान खोली जानी चाहिए. इसके लिए आवश्यक वित्तीय सहायता समाज कल्याण विभाग द्वारा स्वीकृत की जा सकती है.
पीटीआई के इनपुट के साथ.
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