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Tuesday, February 27, 2024

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उत्साहजनक नहीं है मोदी सरकार की शुरुआत

।। पवन के वर्मा ।। मोदी सरकार ने एक महीने का कार्यकाल पूरा किया, तो उनकी शिकायत थी कि हर सरकार को मिलनेवाला 100 दिन का हनीमून पीरियड भी उन्हें नहीं मिला. 100 घंटे से भी कम समय में उनकी आलोचना शुरू हो गयी. सरकार का रेल और आम बजट जल्द पेश होनेवाला है. हर […]

।। पवन के वर्मा ।।

मोदी सरकार ने एक महीने का कार्यकाल पूरा किया, तो उनकी शिकायत थी कि हर सरकार को मिलनेवाला 100 दिन का हनीमून पीरियड भी उन्हें नहीं मिला. 100 घंटे से भी कम समय में उनकी आलोचना शुरू हो गयी. सरकार का रेल और आम बजट जल्द पेश होनेवाला है. हर बात पर यूपीए सरकार की आलोचना करनेवाले मोदी की सरकार के कई फैसलों पर जदयू के राज्यसभा सदस्य पवन के वर्मा प्रश्न खड़े कर रहे हैं.

शासन एक पेचीदा काम है. निश्चित रूप से यह सरकार की आलोचना से जटिल काम है. सरकार पर लगातार बढ़ती अपेक्षाओं को पूरा करने की जिम्मेवारी होती है. आलोचना आपको बिना किसी उत्तरदायित्व के सरकार के कामकाज की बखिया उधेड़ने का पूरा मौका देती है. यूपीए सरकार की असफलताओं को रेखांकित करते हुए नरेंद्र मोदी जोरदार वाक्पटुता का प्रदर्शन कर रहे थे. सत्ता में आने के बाद उनके व्यक्तित्व में बड़ा परिवर्तन दिख रहा है. कुछ सप्ताह पहले तक वे दूसरों की असफलताओं पर गीतात्मक व्यंग्य कर सकते थे, लेकिन अब उन्होंने नीरस गद्यात्मक चुप्पी ओढ़ ली है.

उनकी इस गंभीरता के अनेक कारण हैं. शुरुआती दिनों में ही नयी सरकार से कई प्रशासनिक और राजनीतिक भूलें हुईं, जिन्हें टाला जा सकता था. इनमें पहला था उनके प्रमुख सहयोगी, प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रधान सचिव की नियुक्ति. नृपेंद्र मिश्र एक भले आदमी और सक्षम नौकरशाह हैं. इसलिए, यह इस जिम्मेवारी को वहन करने की उनकी व्यक्तिगत योग्यता के बारे में चर्चा नहीं है.

हालांकि, वर्ष 2006 से 2009 तक टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राइ) के अध्यक्ष रहने के कारण उन्हें कोई सरकारी पद लेने की मनाही थी. यह व्यवस्था वर्ष 2000 में एनडीए ने ही बनायी थी. इसके पीछे उचित कारण भी थे. ट्राइ का अध्यक्ष बड़ी संख्या में ठेकों का आवंटन करता है. इसमें सरकार का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. इसलिए वह कार्यकाल की समाप्ति के बाद कई तरह के लाभ पा सकने की स्थिति में होता है. मोदी के सामने स्पष्ट विकल्प थे, या तो वे अपनी पसंद का अधिकारी चुनने की जिद करते या अपनी ही पार्टी द्वारा सुधारों के क्रम में लाये गये कानून का सम्मान करते. उन्होंने अध्यादेश के असाधारण तरीके के सहारे पहला विकल्प चुना.

स्मृति ईरानी भले तेज-तर्रार नेता हों, अति महत्वपूर्ण मानव संसाधन विकास मंत्री बन कर हम सबको चौंका सकती हैं. मोदी ने इस पद के लिए उनका चुनाव अपनी ही पार्टी के कई योग्य दावेदारों को किनारे लगा कर किया होगा. यह तथ्य कि वह स्नातक भी नहीं हैं, किसी भी उस व्यक्ति के लिए एक प्रासंगिक कारक है, जो एक ऐसे देश के भविष्य का निर्धारण करने जा रहा है, जहां दुनिया के सबसे अधिक आकांक्षी युवाओं की फौज है. चुनाव आयोग के सामने जमा उनके विरोधाभासी हलफनामे शर्मिंदगी का कारण बने हैं.

एक हलफनामे में उन्होंने कहा कि तीन साल के स्नातक पाठ्यक्रम का पहला साल पत्राचार के जरिये पूरा किया है. दूसरे में कहा कि वे स्नातक हैं. देश को यह जानने का अधिकार है कि सच क्या है. यही गलती यूपीए के मंत्री से हुई होती, तो भाजपा ने खूब राजनीतिक रोटियां सेकीं होती.

मोदी सरकार में राज्यमंत्री निहाल चंद को दोषी सिद्ध होने तक अपने निर्दोष होने का दावा करने का अधिकार है, लेकिन यह सच है कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराध के एक आरोपित के रूप में उनका नाम है. संबंधित जिला अदालत ने उन्हें हाजिर होने का आदेश भेजा है. यह सही है कि निहाल चंद के खिलाफ मामले को 2012 में बंद करा दिया गया था, लेकिन यह भी सही है कि पीडि़ता ने न्याय की खोज बरकरार रखी. जिला अदालत को फिर से उसकी शिकायत स्वीकार करने के लिए तैयार किया.

भाजपा को यह खुद से पूछना चाहिए कि अगर उसके विरोधी दल के मंत्री के साथ यह स्थिति होती, तो वह क्या करती? यूपीए पर हमला करने के उसके रवैये को देखते हुए इसमें संदेह नहीं है कि वह उस मंत्री को हटाने की जबरदस्त मुहिम चला रही होती. लेकिन, लगता है कि सरकार में आने के साथ व्यवहार के स्तर में सुविधाजनक बदलाव आ गया है.

मुझे जनरल वीके सिंह को व्यक्तिगत रूप से जानने का अवसर मिला है. उनके बारे में यह चर्चा उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी या योग्यता को लेकर नहीं है. लेकिन, सरकार के एक मंत्री के रूप में उनका ट्वीट, जिसमें उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा नियुक्त नये थल सेनाध्यक्ष की तुलना डकैतों को संरक्षण देनेवाले के रूप में किया है, एक अत्यधिक गैरजिम्मेवाराना हरकत है. मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व का खुला उल्लंघन है.

आश्चर्य है कि उन्हें न तो चेतावनी दी गयी, न उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई. यह देखा जाना अभी बाकी है कि उनका सार्वजनिक रूप से दिया गया अपमानजनक बयान सेनाध्यक्ष के कार्यभार संभालने के बाद उनके संबंधों को किस तरह प्रभावित करता है. देश की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे के दो प्रमुख जिम्मेवार लोगों के बीच बरकरार स्पष्ट तनाव जनहित को किस तरह प्रभावित करता है.

इन सब मामलों के अलावा, बढ़ती महंगाई ने भी उस भरोसे को कमजोर किया है, जिसमें मोदी द्वारा खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दर्शाया जाता है, जिसके पास उन सभी समस्याओं का समाधान है, जिन्हें पिछली सरकार सुलझाने में विफल रही. महंगाई की आग में घी डालते हुए सरकार ने रेल बजट से पहले ही यात्री और माल भाड़ा में भारी बढ़ोतरी कर दी.

सरकार अभी एक महीने से कुछ अधिक पुरानी ही है. इसलिए कोई निश्चित निर्णय देना जल्दबाजी है, लेकिन सरकार की शुरुआत उत्साहजनक नहीं है. विपक्षी पार्टी के रूप में अपेक्षाओं को बढ़ावा देना आसान होता है. सरकार में आ कर आप उन्हें कैसे पूरा करेंगे, देश के लोग यह देखने का इंतजार कर रहे हैं.

लेकिन, एक बात तो स्पष्ट है. दोषारोपण करती वाक्पटुता सन्नाटा भरी चुप्पी में बदल गयी है, जैसा दो जून को देखने को मिला, जब युवक मोहसिन शेख की हत्या कथित तौर पर दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्र सेना के गुंडों के द्वारा कर दी गयी. मोदी के ट्वीट, जिनकी ओर भारत के युवाओं ने देखना शुरू किया है, पूरी तरह चुप रहे.

(लेखक जनता दल (यूनाइटेड) के राज्यसभा सांसद हैं.)

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