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रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंपी गईं फिरोजाबाद की चूड़ियां, समारोह में आने वाली महिलाओं में बंटेगी

Ram Mandir :अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान चल रहा है इधर फिरोजाबाद से 10 हजार से अधिक रंगबिरंगी चूड़ियां पहुंचीं और उत्तरप्रदेश के पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह की मौजूदगी में श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंपी गईं ये चूड़ियां समारोह में आने वाली महिलाओं में बांटी जाएगी.

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रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंपी गईं फिरोजाबाद की चूड़ियां, समारोह में आने वाली महिलाओं में बंटेगी 2

फ़िरोज़ाबाद अपने कांच उद्योग के लिए प्रसिद्ध

अयोध्या: श्री राम जन्मभूमि स्थित मंदिर के गर्भ गृह में रामलला की मूर्ति की स्थापना के साथ ही प्राण प्रतिष्ठा का तीसरे दिन का अनुष्ठान संपन्न हो गया. चारों ओर भगवान राम की भक्ति की बयार बह रही है इधर फ़िरोज़ाबाद जो अपने कांच उद्योग के लिए प्रसिद्ध है और इसकी चूड़ियां हर जगह प्रसिद्ध है. यहां की 10 हजार चूड़ियां मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी गई है . इन्हें ट्रस्ट द्वारा भक्तों में वितरित किया जाएगा उत्तरप्रदेश के पर्यटन मंत्री ने कहा कि ये चूड़ियां हिंदू-मुस्लिम श्रमिकों की महीनों की मेहनत से तैयार होती है. इन चूड़ियों और कंगनों पर भगवान राम, माता सीता और भगवान हनुमान की तस्वीरें बनी हैं. समारोह में आने वाली महिलाओं में इनका वितरण निशुल्क किया जाएगा

फिरोजाबाद की चूड़ियां काफी मशहूर

क्या आपको पता है कि फिरोजाबाद की चूड़ियां काफी मशहूर है. फिरोजाबाद, रंगबिरंगी चुड़ियों के लिए जाना जाता है. नई दिल्ली से करीब 200 किमी दूर फिरोजाबाद कांच उद्योग के लिए मशहूर है. यहां पीढ़ियों से पारंपरिक तरीकों से कांच के कारखाने चलाए जा रहे हैं. प्राचीन समय में फिरोजाबाद को चंद्रवारनगर के नाम से जाना जाता था. कांच की चूड़ियों के उद्योगों के कारण फिरोजाबाद को सुहाग नगरी भी कहा जाता है. ये शहर दुनियाभर में कांच की चूड़ियों का सबसे बड़ा निर्माता है. यहां की चूड़ियां केवल देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भेजी जाती हैं.

फिरोजाबाद का इतिहास

फिरोजाबाद का इतिहास कलात्मक कांच की चूड़ियों के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध फिरोज़ाबाद को सुहाग नगरी के नाम से भी जाना जाता है जिसका लगभग 110 साल पुराना इतिहास है. साहित्यरत्न गणेश शर्मा (प्राणेश) द्वारा लिखी गई वर्ष 1962 में प्रकाशित पुस्तक ‘फिरोज़ाबाद परिचय’ के अनुसार कांच बनाने की शुरुआत चन्द्रवाड़ के राजाओं एवं आगरा के मुगल शासकों की राजधानी बनने से लगभग 250 से 300 वर्ष पूर्व मानी गई है.

चूड़ी बनाने की प्रक्रिया

जब भट्टी का तापमान 1300 से 1500 डिग्री तक पहुंच जाता है और घोल पिघलकर कांच बन जाता है तब, चूड़ी बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है. चूड़ी मज़दूर लोहे की रॉड में भट्टे से पिघला हुआ कांच निकालता है और वहां से सिकाई भट्टी पर आता है. यहां कांच के टुकड़े को आकृति और आकार देकर गर्म कांच को ठंडा किया जाता है श्रमिक फिर से उसी कांच पर भट्टी से नया कांच लेता है. कांच पर कांच चढ़ाने की यह प्रक्रिया तीन से चार बार तक दौहराई जाती है. इसके बाद यह बेलन पर मेकिंग के लिए जाता है जहां बेलन चलाने वाला कारीगर हाथों से रॉड का बैलेंस इस तरह का बनाता है कि बेलन पर चलने वाले कांच की डोर एक सी रहे. बेलन पर चूड़ी को आकार मिलता है और वह एक गोल लंबे लच्छे के रूप में तैयार हो जाती है.

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