Chanakya Niti: आचार्य चाणक्य की नीति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन काल में थी. उन्होंने लोगों के व्यवहार, इच्छाओं को बहुत गहराई से समझा. चाणक्य नीति का एक श्लोक यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य जिस वस्तु या पद को पाना चाहता है, उसी के प्रति उसका लगाव बढ़ता जाता है. यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि अनावश्यक आसक्ति यानि मन का लगाव अंततः दुख का कारण बनती है.
Chanakya Niti Shlok: चाणक्य नीति श्लोक
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः।
मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥
श्लोक का अर्थ: इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि निर्धन व्यक्ति धन की कामना करता है, पशु बोलने की शक्ति चाहते हैं, मनुष्य स्वर्ग की इच्छा करता है और स्वर्ग में रहने वाले देवता मोक्ष की कामना करते हैं. अर्थात जिसे जो प्राप्त नहीं है, वही उसे सबसे अधिक आकर्षित करता है. मनुष्य स्वभावतः उसी वस्तु के पीछे भागता है जो उसके पास नहीं होती.
Chanakya Niti on Attachment: किससे कभी लगाव नहीं करना चाहिए?
चाणक्य नीति का मूल संदेश यही है कि हमें अस्थायी चीज़ों से अत्यधिक लगाव नहीं रखना चाहिए.
- धन से अत्यधिक लगाव – धन आवश्यक है, लेकिन उसका मोह मन को अशांत कर देता है.
- पद और प्रतिष्ठा से लगाव – आज जो है, वह कल नहीं भी हो सकता.
- स्वार्थी संबंधों से लगाव – जो संबंध केवल लाभ पर टिके हों, वे समय के साथ टूट जाते हैं.
- भौतिक इच्छाओं से लगाव – इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं, इसलिए उनसे बंधना दुख को जन्म देता है.
यह भी पढ़ें: Chanakya Niti: कितना भी नेक काम क्यों न हो, गलत समय पर हो जाता है व्यर्थ
यह भी पढ़ें: Chanakya Niti: चौकीदार ही नहीं, ये 7 लोग अगर सो गए तो तय है अनर्थ – इन्हें तुरंत जगा दें
यह भी पढ़ें: Chanakya Niti: हाथ लगा सोना क्यों गंवा बैठता है इंसान? चाणक्य नीति देती है जवाब
Disclaimer: यह आर्टिकल सामान्य जानकारियों और मान्यताओं पर आधारित है. प्रभात खबर इसकी पुष्टि नहीं करता है.
