आचार्य चाणक्य की नीतियों में जीवन की कुछ ऐसी स्थितियों का उल्लेख मिलता हैं जो बिना आग के ही इंसान को भीतर तक जला देती हैं. चाणक्य नीति के कई श्लोक में केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन से जुड़े गहरे सत्य के बारे में भी बताया गया है. परिवार, समाज और व्यक्तिगत सम्मान से जुड़ी ये बातें आज हर किसी को मालूम होनी चाहिए.
चाणक्य नीति श्लोक
कान्तावियोगः स्वजनापमानो
ऋणस्य शेषः कु-नृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषया सभा च
विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥
अर्थ: प्रिय पत्नी से वियोग, अपने ही लोगों के द्वारा अपमान, कर्ज का बोझ, दुष्ट राजा (या गलत बॉस/प्रशासन) की सेवा, गरीबी की स्थिति और मूर्ख लोगों की सभा – ये सभी बातें बिना आग के ही मनुष्य के शरीर और मन को जलाती रहती हैं. यानी ये परिस्थितियां मानसिक पीड़ा और तनाव का बड़ा कारण बनती हैं.
चाणक्य नीति के अनुसार मानसिक पीड़ा और तनाव से बचने के लिए खास टिप्स
- पहली बात – रिश्तों को हल्के में न लें. करीबी संबंधों में संवाद बनाए रखें, दूरी और गलतफहमी मानसिक कष्ट देती है.
- अपने स्वाभिमान की रक्षा करें. जहां बार-बार अपमान हो, वहां सीमाएं तय करना सीखें.
- कर्ज सोच-समझकर लें. अनावश्यक ऋण मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण बनता है.
- गलत नेतृत्व से सावधान रहें. दुष्ट या अनैतिक लोगों के अधीन काम करने से बचें.
- मूर्ख या नकारात्मक सोच वाले लोगों की सभा से दूर रहना ही बुद्धिमानी है.
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Disclaimer: यह आर्टिकल सामान्य जानकारियों और मान्यताओं पर आधारित है. प्रभात खबर इसकी पुष्टि नहीं करता है.
