हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में से एक ‘मुगल-ए-आजम’ में जब भी शहजादा सलीम का जिक्र होता है, तो सबसे पहले दिलीप कुमार का चेहरा याद आता है. 1960 में रिलीज हुई इस फिल्म में दिलीप कुमार ने सलीम के किरदार को ऐसा निभाया कि वह भारतीय सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन गया.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिलीप कुमार इस किरदार के लिए निर्देशक के. आसिफ की पहली पसंद नहीं थे? दरअसल, फिल्म की शुरुआती योजना में सलीम का किरदार किसी और अभिनेता के लिए तय किया गया था.
Why Dilip Kumar Was Rejected: दिलीप कुमार को क्यों किया गया था रिजेक्ट?
के. आसिफ ने ‘मुगल-ए-आजम’ बनाने का विचार 1944-45 के आसपास किया था. उस समय वह इस फिल्म को इम्तियाज अली ताज के चर्चित नाटक ‘अनारकली’ की कहानी से प्रेरित होकर बनाने की तैयारी कर रहे थे. फिल्म में सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी को बड़े स्तर पर दिखाने की योजना थी.
उस दौर में दिलीप कुमार एक उभरते हुए कलाकार थे और बॉम्बे टॉकीज से जुड़े हुए थे. फिल्म के प्रोडक्शन कंट्रोलर हितेन चौधरी ने के. आसिफ को सलीम के लिए युवा दिलीप कुमार का नाम सुझाया था. लेकिन निर्देशक ने उन्हें इस भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं माना. के. आसिफ (K Asif) को लगा कि उस समय दिलीप कुमार में शहजादे की शाही छवि और राजसी व्यक्तित्व नजर नहीं आता था.
Who Was Choosen as Salim in Mughal -e- Azam: फिर किसे बनाया गया था सलीम?
दिलीप कुमार की जगह डी.के. सप्रू (D.K Sapru) को शहजादा सलीम के किरदार के लिए चुना गया. सप्रू उस समय अपने दमदार व्यक्तित्व और प्रभावशाली आवाज के लिए पहचाने जाते थे. के. आसिफ को लगा कि उनका व्यक्तित्व और स्क्रीन प्रेजेंस एक मुगल शहजादे के किरदार के लिए ज्यादा सही है।
साल 1946 में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। उस समय फिल्म में सप्रू के साथ नरगिस अनारकली के किरदार में और चंद्रमोहन बादशाह अकबर की भूमिका में थे. फिल्म की करीब 25 प्रतिशत शूटिंग भी पूरी हो चुकी थी। यानी उस वक्त ‘मुगल-ए-आजम’ की कहानी और उसके किरदार आज की फिल्म से बिल्कुल अलग नजर आने वाले थे।
India Pakistan Partition Changed the Film: बंटवारे ने बदल दी पूरी फिल्म की कहानी
फिल्म का काम आगे बढ़ ही रहा था कि 1947 में देश के बंटवारे के कारण प्रोडक्शन रुक गया. फिल्म के फाइनेंसर पाकिस्तान चले गए और प्रोजेक्ट मुश्किलों में फंस गया. इसके बाद 1949 में बादशाह अकबर का किरदार निभा रहे चंद्रमोहन की मौत ने फिल्म को एक और बड़ा झटका दिया. इसके साथ ही शुरुआती स्टारकास्ट के साथ फिल्म को पूरा करना संभव नहीं रहा.
कई साल बाद के. आसिफ ने फिल्म को नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया. इस बार उन्होंने स्टारकास्ट में बड़ा बदलाव किया. दिलीप कुमार को शहजादा सलीम, मधुबाला को अनारकली और पृथ्वीराज कपूर को अकबर के किरदार में लिया गया. फिल्म में दुर्गा खोटे, निघार सुल्ताना, अजित और मुराद जैसे कलाकार भी शामिल हुए.
Dilip Changed Salim's Character: दिलीप कुमार ने बदल दी सलीम की पहचान
आखिरकार 5 अगस्त 1960 को ‘मुगल-ए-आजम’ रिलीज हुई और हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी क्लासिक फिल्मों में शामिल हो गई. दिलीप कुमार के सलीम और मधुबाला की अनारकली की प्रेम कहानी ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी. फिल्म की भव्यता, संवाद, संगीत और कलाकारों के अभिनय ने इसे ऐतिहासिक बना दिया.
दिलचस्प बात यह है कि जिस अभिनेता को शुरुआती दौर में सलीम के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था, वही दिलीप कुमार आगे चलकर इस किरदार की पहचान बन गए. अगर फिल्म की पहली योजना उसी तरह पूरी हो जाती, तो शायद सलीम के रूप में दिलीप कुमार की वह यादगार छवि कभी देखने को नहीं मिलती.
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