भारत का बंटवारा सिर्फ देश के दो हिस्से होने की कहानी नहीं था. 1947 में लाखों लोगों के घर छूट गए, परिवार बिछड़ गए और कई लोगों ने अपनी जान गंवाई. ‘बंटवारा 1947’ इसी दर्द को एक परिवार और कुछ रिश्तों की कहानी के जरिए दिखाती है. फिल्म बताती है कि जब चारों तरफ नफरत हो, तब भी इंसानियत को जिंदा रखा जा सकता है.
क्या है ‘बंटवारा 1947’ की कहानी?
फिल्म की कहानी 1947 के लाहौर की है. देश के बंटवारे के समय लोगों के बीच डर और गुस्सा बढ़ रहा है. हिंदू और मुस्लिम परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि अब उनका घर और उनका भविष्य क्या होगा.
इसी माहौल में सनी देओल का किरदार सिकंदर मिर्जा सामने आता है. सिकंदर एक मुस्लिम शख्स है, लेकिन उसके लिए इंसान की पहचान उसके धर्म से बड़ी है. जब एक बुजुर्ग हिंदू महिला मुश्किल में पड़ती है, तो सिकंदर उसकी मदद के लिए सामने आता है.
यहीं से फिल्म की असली कहानी शुरू होती है. फिल्म दिखाती है कि बंटवारे की वजह से लोग एक-दूसरे से दूर हो रहे हैं, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं जिन्हें धर्म और सरहद नहीं तोड़ सकती.
सनी देओल की एक्टिंग कैसी है?
सनी देओल को हमने कई फिल्मों में गुस्से वाले अंदाज में देखा है. लेकिन ‘बंटवारा 1947’ में उनका किरदार सिर्फ गुस्सा करने वाला इंसान नहीं है. सिकंदर के अंदर डर, दर्द, प्यार और अपनी माई को बचाने की बेचैनी भी है.
कुछ सीन में सनी देओल बिना ज्यादा बोले ही अपनी बात समझा देते हैं. यही उनकी एक्टिंग की सबसे बड़ी ताकत है। वहीं जहां जरूरत पड़ती है, उनके दमदार डायलॉग और आवाज फिल्म को और मजबूत बनाते हैं.
फिल्म देखकर लगता है कि सनी देओल के लिए यह सिर्फ एक और फिल्म नहीं है, बल्कि उनके करियर के एक नए दौर की शुरुआत भी हो सकती है.
शबाना आजमी बनीं फिल्म की जान
शबाना आजमी ‘माई’ के किरदार में दिल जीत लेती हैं. उनका किरदार एक बुजुर्ग हिंदू महिला का है, जो अपने घर और अपनी जमीन को छोड़ना नहीं चाहती.
माई के लिए वह घर सिर्फ एक मकान नहीं है. उसमें उनकी पूरी जिंदगी बसी हुई है। शबाना आजमी इस दर्द को बहुत आसान और सच्चे तरीके से दिखाती हैं.
सनी देओल और शबाना आजमी के बीच का रिश्ता फिल्म की सबसे प्यारी चीजों में से एक है. दोनों अलग धर्मों से हैं, लेकिन उनके बीच मां-बेटे जैसा रिश्ता बन जाता है. फिल्म इसी रिश्ते के जरिए बताती है कि इंसानियत धर्म से बड़ी हो सकती है.
करण देओल भी दिखे दमदार
सनी देओल के बेटे करण देओल भी फिल्म में नजर आते हैं. उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने पिता जैसे बड़े स्टार के सामने अपनी जगह बनाना है.
करण कई सीन में आत्मविश्वास के साथ नजर आते हैं. अच्छी बात यह है कि वह हर जगह अपने पिता की कॉपी करने की कोशिश नहीं करते। उनकी अपनी स्क्रीन प्रेजेंस दिखाई देती है.
प्रीति जिंटा और अली फजल का भी अहम रोल
फिल्म में प्रीति जिंटा की मौजूदगी कहानी को भावनात्मक बनाती है. उनकी वापसी देखकर पुराने दर्शकों को भी अच्छा लगेगा.
अली फजल अपने शांत अंदाज से कहानी में एक अलग रंग जोड़ते हैं. वहीं अभिमन्यु सिंह का किरदार फिल्म में बढ़ती नफरत और कट्टर सोच को दिखाता है.
सपोर्टिंग कास्ट की वजह से कहानी सिर्फ सनी देओल की फिल्म बनकर नहीं रह जाती. हर किरदार बंटवारे के समय के अलग-अलग दर्द को सामने लाता है.
1947 का लाहौर कैसा दिखाया गया है?
फिल्म की एक बड़ी खासियत इसका माहौल है. पुराने लाहौर की गलियां, घर, कपड़े, भीड़ और उस समय का माहौल कहानी को असली जैसा महसूस कराते हैं.
पहले हिस्से में फिल्म धीरे-धीरे कहानी और किरदारों को समझाती है. जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, हालात खराब होते जाते हैं और फिल्म ज्यादा भावुक हो जाती है.
फिल्म का दूसरा हिस्सा ज्यादा असरदार है. खासकर जब कहानी रिश्तों और इंसानियत पर ज्यादा ध्यान देती है.
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
‘बंटवारा 1947’ की सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म बंटवारे की कहानी दिखाते हुए किसी एक धर्म के खिलाफ नफरत पैदा करने की कोशिश नहीं करती. फिल्म यह समझाने की कोशिश करती है कि गलत काम धर्म नहीं, बल्कि इंसान करता है। बुरे समय में किसी की मदद करना ही असली इंसानियत है.
यही वजह है कि फिल्म सिर्फ 1947 की कहानी नहीं लगती. यह आज भी एक जरूरी सवाल पूछती है कि अगर पूरी दुनिया आपको किसी से नफरत करना सिखाए, तो क्या आप फिर भी उसके साथ इंसान जैसा व्यवहार कर सकते हैं?
‘बंटवारा 1947’ देखें या नहीं?
अगर आपको इतिहास, भावनात्मक कहानियां और मजबूत किरदार वाली फिल्में पसंद हैं, तो ‘बंटवारा 1947’ देखी जा सकती है. फिल्म हर जगह तेज नहीं है, लेकिन इसकी कहानी और कलाकारों की एक्टिंग आपको बांधे रखती है.
सनी देओल और शबाना आजमी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं. दोनों के बीच का रिश्ता कहानी को दिल से जोड़ता है.
कुल मिलाकर, ‘बंटवारा 1947’ बंटवारे के दर्द के बीच इंसानियत और रिश्तों की कहानी है. फिल्म याद दिलाती है कि देश और जमीन की सीमाएं बनाई जा सकती हैं, लेकिन इंसानियत की कोई सीमा नहीं होती.
रेटिंग: 3.5
