Prabhat Khabar Special: Prabhat Khabar Special: "लाइट्स... कैमरा... एक्शन" फिल्म इंडस्ट्री का यह मशहूर वाक्य सिर्फ एक डायलॉग नहीं, बल्कि हर शूटिंग की शुरुआत का सबसे अहम हिस्सा है. इनमें सबसे पहला शब्द 'लाइट्स' ही बताता है कि बिना सही रोशनी के न कैमरा अपना कमाल दिखा सकता है और न ही किसी स्टार की एंट्री पर्दे पर वैसी नजर आती है, जैसी दर्शक देखना चाहते हैं. बड़े पर्दे पर चमकते सितारों, शानदार फ्रेम्स और दमदार सीन्स के पीछे सबसे बड़ा योगदान उन लाइटमैन का होता है, जो घंटों ऊंचाई पर चढ़कर, भारी-भरकम इक्विपमेंट के बीच और कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर सेट को रोशन करते हैं. हालांकि रियल लाइफ में न तो उनके जान की कोई कीमत होती है, और ना ही उन्हें इतना पैसा मिलता है, जिससे वह अपना परिवार ठीक से चला पाएं
FWICE ने प्रभात खबर को बताई लाइट मजदूरों की वास्तविक स्थिति
लाइट मजदूरों की वास्तविक स्थिति को लेकर फेडरेशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लॉइज (FWICE) के अध्यक्ष बीएन तिवारी ने प्रभात खबर संग एक्सक्लूसिव बातचीत की. उनके मुताबिक सेट पर इस्तेमाल होने वाले उपकरणों का इंश्योरेंस तो कराया जाता है, लेकिन मजदूर बस भगवान भरोसे ही काम कर रहे होते हैं.
क्या मशीन से भी सस्ती है, लाइटमैन की जिंदगी
उनसे पूछा गया कि लाइटमैन का काम इतना जोखिम भरा होता है, तो क्या उनके लिए कोई इंश्योरेंस की व्यवस्था होती है? इस पर बीएन तिवारी ने कहा, "इक्विपमेंट (Equipments) का इंश्योरेंस तो कराया जाता है, लेकिन लाइटमैन के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसके लिए अक्सर यह वजह बताई जाती है कि वर्कर बदलते रहते हैं, इसलिए इंश्योरेंस करना मुश्किल होता है.''
उन्होंने कोविड के समय की व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा, ''कोविड के समय हमने व्यवस्था लागू करवाई थी कि किसी कर्मचारी की जान जाने पर 20 लाख रुपये की मदद मिलनी चाहिए और उस दौरान यह मिल भी रहा था, लेकिन प्रोड्यूसर अक्सर कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट में नुकसान हो रहा है. मेरा कहना है कि जब तुम्हें पता है कि लॉस होगा, तो करते ही क्यों हो ऐसा काम.''
फेडरेशन वाले शख्स बोले- "शूटिंग से पहले आते हैं, बाद में जाते हैं... लेकिन एक्स्ट्रा चार्ज नहीं मिलता"
बीएन तिवारी ने बताया कि लाइटमैन को शूटिंग शुरू होने से काफी पहले सेट पर पहुंचना पड़ता है, ताकि पूरी यूनिट के आने से पहले लाइटिंग का काम पूरा किया जा सके. उन्होंने कहा, "लाइट मजदूरों को शूटिंग शुरू होने से करीब एक घंटे पहले सेट पर पहुंचना पड़ता है, ताकि पूरी यूनिट के आने से पहले लाइटिंग का सेटअप तैयार किया जा सके. वहीं, शूट खत्म होने के बाद भी उन्हें लगभग एक घंटा रुकना पड़ता है, लेकिन इस एक्स्ट्रा समय के लिए उन्हें अलग से कोई एक्स्ट्रा पेमेंट नहीं मिलता. उनकी ड्यूटी के लिए 8 घंटे और 12 घंटे की शिफ्ट तय होती है, लेकिन इसके बाद वे चाहे जितने घंटे काम करें, अतिरिक्त समय का कोई अलग चार्ज नहीं दिया जाता."
12 घंटे काम, लेकिन पेमेंट 8 घंटे का?
जब बीएन तिवारी से पूछा गया कि अगर लाइटमैन तय समय से ज्यादा काम करते हैं तो क्या उनका टाइमिंग को दूसरी शिफ्ट में गिना जाता है. इस पर उन्होंने कहा, "कायदे से होना तो चाहिए, लेकिन ऐसा रियल लाइफ में होता नहीं है, क्योंकि 12 घंटे की एक शिफ्ट मानी जाती है. ये लोग काम करते हैं 12 घंटे की और इन्हें पैसे महज 8 घंटे के हिसाब से ही मिलते हैं."
लाइट मैन को रिस्क भरा काम के लिए मिलती है बस इतनी दिहाड़ी
लाइटमैन का काम सिर्फ लाइट लगाने तक सीमित नहीं होता. ऊंचाई पर चढ़कर भारी इक्विपमेंट के साथ काम करना और बिजली से जुड़े सेटअप संभालना भी है. बीएन तिवारी के मुताबिक, "लाइटमैन की एक दिन की फीस करीब 1500 से 2500 रुपये तक होती है, जबकि स्पॉट बॉय को लगभग 1200 रुपये मिलते हैं. ये आंकड़े एसोसिएशन की तरफ से हैं."
टाइम पर नहीं मिलता है पेमेंट
आगे बीएन तिवारी ने कहा, "लाइटमैन का काम काफी जोखिम भरा होता है. उनके लिए सबसे बड़ी बात यही है कि उन्हें समय पर पेमेंट मिल जाए. एक तरफ उनकी कमाई पहले ही कम होती है और दूसरी तरफ पेमेंट भी समय पर नहीं मिलता. डेली बेसिस पर काम करने वाले इन लोगों को कई बार महीनों तक अपने पैसे का इंतजार करना पड़ता है."
बेहाल है लाइट मैन की स्थिति
उन्होंने आगे कहा, "अगर कोई लाइटमैन सप्लायर के जरिए काम करता है तो उसकी सैलरी करीब 20 से 25 हजार रुपये तक होती है, लेकिन वह कितने घंटे काम कर रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं रखा जाता. सोचिए, इतने लंबे काम के बाद वह अपने परिवार के लिए कितना समय निकाल पाता होगा. कई लोग वसई तो कई नालासोपारा जैसे इलाकों में रहते हैं. इतनी कम कमाई में परिवार चलाना आसान नहीं है, खासकर तब जब काम भी लगातार नहीं मिलता. कैमरे के पीछे काम करने वाले इन लोगों की स्थिति सच में काफी मुश्किल है. यह वाकई दुखद स्थिति है."
कैमरे के पीछे खड़े इन लोगों की कहानी कौन सुनेगा?
बॉलीवुड की फिल्मों में लाइटिंग का महत्वपूर्ण रोल होता है. लाइट सही ना हो नो कोई सीन दमदार नहीं लगता है, लेकिन उस रोशनी को पैदा करने वाले लोगों की जिंदगी खुद कई अंधेरों से गुजर रही है. एक तरफ करोड़ों की फिल्मों के सेट हैं, बड़े सितारे हैं और शानदार शूटिंग लोकेशन हैं. दूसरी तरफ वही लोग कम पैसों में जिंदगी जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
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