Choice Filling Process: कॉलेज में एडमिशन के लिए सिर्फ अच्छा स्कोर या रैंक हासिल करना ही काफी नहीं होता. कई कोर्स में एडमिशन के लिए काउंसलिंग प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इस दौरान उम्मीदवारों को अपनी पसंद के कॉलेज और कोर्स चुनने का मौका मिलता है. इसी प्रक्रिया को चॉइस फिलिंग कहा जाता है.
अभी नीट यूजी समेत कई एडमिशन काउंसलिंग में यह चरण चल रहा है. नीट यूजी 2026 काउंसलिंग के राउंड 1 में भी उम्मीदवारों को अपनी पसंद के कॉलेज और कोर्स चुनने का मौका दिया गया है.
ऐसे में अगर आप भी किसी काउंसलिंग में हिस्सा ले रहे हैं, तो चॉइस फिलिंग का मतलब और इसका सही तरीका समझना जरूरी है.
What is Choice Filling: चॉइस फिलिंग क्या होती है?
चॉइस फिलिंग काउंसलिंग के दौरान किया जाने वाला ऑनलाइन प्रोसेस है. इसमें उम्मीदवार उपलब्ध कॉलेज, कोर्स या ब्रांच में से अपनी पसंद के विकल्प चुनता है. इसके बाद इन ऑप्शन्स को प्रेफरेंस ऑर्डर में लगाया जाता है. यानी जिस कॉलेज या कोर्स को आप सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, उसे ऊपर रखना होता है.
इसके बाद दूसरी पसंद, तीसरी पसंद और इसी तरह बाकी विकल्पों को क्रम में रखा जाता है. सीट अलॉटमेंट के समय काउंसलिंग अथॉरिटी आपके रैंक, कैटेगरी, उपलब्ध सीट और भरी गई प्रेफरेंस को ध्यान में रखती है. इसलिए चॉइस का ऑर्डर बहुत महत्वपूर्ण होता है.
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Choice Filling Process: चॉइस फिलिंग कैसे करें?
- सबसे पहले जिस काउंसलिंग में आपने रजिस्ट्रेशन किया है, उसकी ऑफिशियल वेबसाइट पर जाएं.
- अपने रजिस्ट्रेशन नंबर, पासवर्ड या मांगी गई लॉगिन डिटेल्स की मदद से अकाउंट में लॉगिन करें.
- अब काउंसलिंग डैशबोर्ड में चॉइस फिलिंग या चॉइस एंट्री का ऑप्शन दिखाई देगा.
- इस पर क्लिक करने के बाद आपके सामने उपलब्ध कॉलेज और कोर्स की लिस्ट आएगी.
- अपनी एलिजिबिलिटी के अनुसार पसंद के कॉलेज और कोर्स चुनें.
- इसके बाद उन्हें अपनी पसंद के क्रम में अरेंज करें.
- सबसे पसंद वाला ऑप्शन सबसे ऊपर रखें.
- जरूरत के अनुसार आप अपनी लिस्ट में और भी कॉलेज या कोर्स जोड़ सकते हैं.
- अंत में पूरी प्रेफरेंस लिस्ट को दोबारा ध्यान से चेक करें.
चॉइस लॉक करना क्यों जरूरी है?
चॉइस फिलिंग पूरी करने के बाद अगला महत्वपूर्ण स्टेप चॉइस लॉकिंग होता है. इसमें उम्मीदवार अपनी फाइनल प्रेफरेंस लिस्ट को कन्फर्म करता है. लॉक करने से पहले यह जरूर देख लें कि कॉलेज और कोर्स का ऑर्डर सही है या नहीं.
किसी गलत ऑप्शन को ऊपर या नीचे रखने पर सीट अलॉटमेंट आपकी उम्मीद के मुताबिक नहीं हो सकता है. कुछ काउंसलिंग में डेडलाइन तक चॉइस लॉक करना जरूरी होता है, इसलिए संबंधित काउंसलिंग के नियम जरूर देखें.
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चॉइस फिलिंग में इन गलतियों से बचें
सिर्फ एक-दो कॉलेज चुनकर चॉइस फिलिंग पूरी न करें. अपनी रैंक, कैटेगरी और एलिजिबिलिटी के अनुसार पर्याप्त ऑप्शन रखें. दूसरे उम्मीदवार की प्रेफरेंस लिस्ट देखकर अपनी चॉइस तय न करें. कॉलेज की फीस, लोकेशन, हॉस्टल, कोर्स और पिछले साल के कटऑफ जैसी चीजों को भी ध्यान में रखें.
सबसे जरूरी बात, जिस कॉलेज में एडमिशन लेने की बिल्कुल इच्छा नहीं है, उसे केवल सीट मिलने की उम्मीद में प्रेफरेंस लिस्ट में शामिल न करें. चॉइस लॉक करने से पहले पूरी लिस्ट एक बार जरूर जांच कर लें.
चॉइस फिलिंग के बाद क्या होता है?
चॉइस फिलिंग और लॉकिंग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद काउंसलिंग अथॉरिटी सीट अलॉटमेंट करती है. अगर आपकी रैंक, कैटेगरी, उपलब्ध सीट और प्रेफरेंस के अनुसार कोई सीट मिलती है, तो अलॉटमेंट रिजल्ट जारी किया जाता है.
इसके बाद उम्मीदवार को काउंसलिंग के नियमों के अनुसार अलॉटेड सीट स्वीकार करनी होती है और जरूरी डॉक्यूमेंट्स के साथ एडमिशन प्रक्रिया पूरी करनी होती है.
अगर पहली पसंद नहीं मिलती है, तो कई काउंसलिंग सिस्टम में आगे के राउंड में अपग्रेड या नई प्रेफरेंस के आधार पर सीट मिलने का मौका भी हो सकता है.
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