रूसी तेल पर प्रतिबंध से घटेगी सरकारी कंपनियों की कमाई, सस्ता क्रूड भी नहीं बढ़ा पाएगा मुनाफा
Russian Oil Sanctions: रूसी कच्चे तेल और परिष्कृत उत्पादों पर लगे प्रतिबंधों से वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति अधिशेष बना रह सकता है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें कम रहने की संभावना है. नुवामा की रिपोर्ट के अनुसार, सस्ता क्रूड होने के बावजूद आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल की कमाई मुख्य रूप से रिफाइनिंग मार्जिन पर निर्भर रहेगी. मजबूत घरेलू मांग और 6–7 डॉलर प्रति बैरल जीआरएम से सरकारी तेल कंपनियों को सीमित राहत मिल सकती है.
Russian Oil Sanctions: रूसी कच्चे तेल और परिष्कृत उत्पादों पर जारी प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है. नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक बाजार में अधिक आपूर्ति और रूसी तेल के प्रवाह में बाधा के चलते कच्चे तेल की कीमतें आने वाले समय में दबाव में रह सकती हैं. हालांकि, इसका सीधा लाभ सरकारी तेल विपणन कंपनियों इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) को पूरी तरह नहीं मिलेगा.
समुद्र में फंसा रूसी तेल
नुवामा की रिपोर्ट में बताया गया है कि रूसी कच्चे तेल पर लगे प्रतिबंधों के कारण बड़ी मात्रा में तेल समुद्र में तैरते भंडार के रूप में जमा हो गया है. जैसे-जैसे ये बैरल धीरे-धीरे भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाजारों तक पहुंचेंगे, वैश्विक तेल बाजार में अधिशेष आपूर्ति की स्थिति बनी रह सकती है. एफजीई नेक्सेंट के अनुमान के मुताबिक, रोजाना करीब 20 लाख बैरल का अधिशेष रह सकता है, जिससे वर्ष 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमत 55 से 60 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहने की संभावना है.
सस्ते कच्चा तेल से फायदा तो चुनौती भी
रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की कम कीमतें भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल और गैस कंपनियों के लिए संरचनात्मक रूप से सकारात्मक मानी जाती हैं, क्योंकि इससे इनपुट लागत घटती है और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव कम होता है. इससे सरकार को भी कीमतों को नियंत्रित रखने में सहूलियत मिलती है. लेकिन नुवामा की रिपोर्ट के अनुसार, आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल की वास्तविक कमाई का निर्धारण कच्चे तेल की कीमतों से कम और रिफाइनिंग मार्जिन से अधिक होता है.
रिफाइनिंग मार्जिन बनेंगे कमाई का असली आधार
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि रूसी तेल व्यापार पर प्रतिबंध और यूरोपीय संघ द्वारा रूसी परिष्कृत उत्पादों पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते रोजाना लगभग 10 लाख बैरल रूसी डीजल और ईंधन तेल निर्यात खतरे में पड़ गया है. इससे वैश्विक उत्पाद आपूर्ति में कमी आई है और रिफाइनिंग मार्जिन को मजबूती मिली है. खासकर, डीजल जैसे मध्यम डिस्टिलेट्स के मार्जिन बढ़े हैं, जो भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के उत्पादन का अहम हिस्सा हैं.
सिंगापुर जीआरएम पर टिकी उम्मीदें
नुवामा की रिपोर्ट के मुताबिक, सिंगापुर बेंचमार्क सकल शोधन मार्जिन (जीआरएम) दीर्घकालिक रूप से 6 से 7 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर स्थिर हो सकता है. यह स्तर भारत की सरकारी रिफाइनरियों के लिए अनुकूल माना जाता है, क्योंकि उनकी रिफाइनरी संरचनाएं जटिल हैं. वे भारी और डिस्काउंटेड क्रूड को प्रोसेस करने में सक्षम हैं. साथ ही, मजबूत घरेलू मांग इन कंपनियों को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती है.
आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को मिलेगा सहारा
रिपोर्ट में कहा गया है कि आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को उनके बड़े पैमाने पर संचालन, एकीकृत लॉजिस्टिक्स और व्यापक रिटेल नेटवर्क का लाभ मिलता रहेगा. ये कंपनियां घरेलू बाजार पर केंद्रित हैं, जिससे वैश्विक निर्यात प्रतिबंधों का सीधा असर सीमित रहता है. विनियमित मूल्य निर्धारण व्यवस्था भी इनके लिए एक स्थिरता का कारक बनी हुई है.
अस्थिरता का खतरा अब भी बरकरार
हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि वैश्विक कच्चे तेल भंडार में बढ़ोतरी, रिफाइनरी उपयोग दरों में इजाफा और नई वैश्विक रिफाइनिंग क्षमता के जुड़ने से निकट भविष्य में मार्जिन में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. यदि रूस के साथ व्यापारिक तनाव में तेजी से कमी आती है, तो उत्पाद क्रैक पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे रिफाइनिंग मार्जिन प्रभावित होंगे.
निर्यात पर अप्रत्यक्ष असर, घरेलू बाजार से राहत
नुवामा के अनुसार, यूरोपीय संघ के कड़े नियमों का भारतीय रिफाइनरियों पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है, लेकिन इसका प्रभाव निजी निर्यातकों पर अधिक होगा. घरेलू खपत पर केंद्रित सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के लिए जोखिम अपेक्षाकृत सीमित है, क्योंकि उनकी लाभप्रदता मुख्य रूप से घरेलू मांग और सरकारी मूल्य निर्धारण नीति पर निर्भर करती है.
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सस्ता क्रूड मगर मुनाफे की राह आसान नहीं
कुल मिलाकर, रिपोर्ट बताती है कि कच्चे तेल की कम कीमतें और संरचनात्मक रूप से मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल को सहारा देंगे. बावजूद इसके, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक प्रतिबंध ऊर्जा बाजार में समय-समय पर अस्थिरता पैदा करते रहेंगे, जिससे सरकारी तेल कंपनियों की कमाई पर दबाव बना रह सकता है.
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