Bihar Chunav 2025 : बिहार में कन्हैया का इम्तिहान बाकी, क्या कर पाएंगे कोई चमत्कार, सामने क्या-क्या चुनौतियां

Bihar Chunav 2025 : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारी में सभी दल सक्रिय है. कांग्रेस अब भी कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता को लेकर असमंजस में है. "पलायन रोको, नौकरी दो" यात्रा से मिले संकेतों के बावजूद कांग्रेस उन्हें बड़ी भूमिका देने से बच रही है, जिससे राजनीतिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है.

Bihar Chunav 2025, शशिभूषण कुंवर, पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आहट के साथ राजनीतिक तापमान तेज हो चुका है. सभी प्रमुख दल अपने मोहरे सजाने में जुटे हैं, लेकिन कांग्रेस अब भी बिहार के युवा नेता को लेकर रणनीतिक दुविधा में दिखाई देती है. खासकर जब बात होती है कन्हैया कुमार जैसे प्रभावशाली युवा नेता की. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रयोगशाला में

कन्हैया का इम्तिहान होना अभी बाकी है

राजनीतिक जानकार बताते हैं कि मार्च में पश्चिम चंपारण से शुरू हुई “पलायन रोको, नौकरी दो” यात्रा कांग्रेस के लिए सिर्फ एक अभियान नहीं, बल्कि एक राजनीतिक प्रयोगशाला थी. इसमें राहुल गांधी की सहभागिता इस बात का संकेत थी कि कांग्रेस कन्हैया कुमार को लेकर गंभीर है. लेकिन अब तक जो संकेत मिले हैं वो दुविधा और अनिर्णय की ओर इशारा करते हैं.

कन्हैया कुमार की वाकपटुता, आक्रामक अंदाज और छात्र राजनीति से निकल कर राष्ट्रीय मंच पर उभरना उन्हें बिहार की युवा आबादी से जोड़ता है. फिर भी कांग्रेस उन्हें कोई स्पष्ट भूमिका देने से बचती रही है. इसकी एक बड़ी वजह है, महागठबंधन में कांग्रेस की सीमित भूमिका और राजद का वर्चस्व.

गठबंधन की राजनीति बनाम व्यक्तिगत करिश्मा

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा पहले ही घोषित कर दिया है. इस घोषणा के बाद महागठबंधन के भीतर कोई दूसरा चेहरा, विशेषकर युवा और लोकप्रिय चेहरा खड़ा करना राजद को स्वीकार नहीं. कन्हैया कुमार जैसे नेता को प्रचार का बड़ा चेहरा बनाने से तेजस्वी की राजनीतिक पकड़ पर सवाल खड़े हो सकते हैं और यही बात कांग्रेस की रणनीति को सीमित कर देती है.

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राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस के पास दो रास्ते हैं

कन्हैया को एक स्टार प्रचारक के रूप में उभारना, जिससे उनका प्रभाव सीमित और नियंत्रित रहे या उन्हें नेतृत्व की बड़ी भूमिका देकर महागठबंधन में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करना, जिसमें जोखिम ज्यादा है, लेकिन लंबे समय में पार्टी को एक ठोस युवा चेहरा मिल सकता है.

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कन्हैया की चुनौती: दिल्ली की सक्रियता बनाम बिहार की जमीनी हकीकत

कन्हैया कुमार भले ही बिहार से आते हों लेकिन उनकी सक्रियता दिल्ली और राष्ट्रीय मंच तक सीमित रही है. वह अब तक कोई चुनाव नहीं जीत पाये हैं जिससे उनकी चुनावी वैधता पर भी सवाल उठता है. कांग्रेस नेतृत्व शायद इसी कारण उन्हें सीधे चुनावी मैदान में उतारने से हिचकिचा रहा है.

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