खास बातें
EV Localisation Report: भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है. वित्तीय वर्ष 2020 के बाद से देश में सालाना ईवी बिक्री में लगभग 14 गुना वृद्धि हुई है. इसी बीच इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) और जेएमके रिसर्च एंड एनालिटिक्स (JMK Research) की एक रिपोर्ट ‘बियॉन्ड बैटरी पैक्स : लोकलाइजेशन इन मैन्युफैक्चरिंग ईवी कंपोनेंट्स’ आयी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वर्ष 2030 तक बैटरी को छोड़कर ईवी के अन्य कई हाई-वैल्यू कंपोनेंट कैटेगरीज में 90 से 100 प्रतिशत तक घरेलू उत्पादन (लोकलाइजेशन) हासिल कर सकता है. यानी आत्मनिर्भर हो सकता है. लेकिन इस बड़ी कामयाबी के बाद भी एक बड़ी चिंता है.
- विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाईल मार्केट है भारत
- 2.56 करोड़ वाहन बिके भारत में वित्त वर्ष 2025 में
- 6.73 लाख करोड़ रुपए का ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री बना भारत
चीन और ताइवान पर बनी रहेगी निर्भरता
रिपोर्ट के मुख्य लेखक और जेएमके रिसर्च के कंसल्टेंट राहुल माईती के अनुसार, भारत में केवल पार्ट्स को असेंबल कर देना वास्तव में आत्मनिर्भरता नहीं है. अगर कोई कंपोनेंट भारत में असेंबल हो रहा है, तो उसमें लगने वाली जरूरी चीजें जैसे सेमीकंडक्टर (चिप्स), रेयर-अर्थ मैग्नेट्स (दुर्लभ पृथ्वी चुंबक) और एडवांस्ड मटेरियल्स के लिए भारत आज भी पूरी तरह से आयात पर निर्भर है.
इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल के मुख्य कंपोनेंट्स
- ट्रैक्शन मोटर
- मोटर कंट्रोल
- इन्वर्टर
- ऑन-बोर्ड चार्जर
- डीसी-डीसी कन्वर्टर
- वीसीयू
- वायरिंग हार्नेस
- टीएमएस
- चेसिस और ढांचा निर्माण
- टेलीमैटिक्स
- ऑफ-बोर्ड चार्जर
इन कंपोनेंट्स के निर्माण में पीछे है भारत
- ट्रैक्शन मोटर
- मोटर कंट्रोल
- इन्वर्टर
- ऑन-बोर्ड चार्जर
- डीसी-डीसी कन्वर्टर
- वीसीयू
- टेलीमैटिक्स
- ऑफ-बोर्ड चार्जर
इन कंपोनेंट्स के निर्माण में आत्मनिर्भर
- वायरिंग हार्नेस
- टीएमएस
- चेसिस और ढांचा निर्माण
चीन और ताइवान ही बनाते हैं मैग्नेट्स और चिप्स
चौंकाने वाली बात यह है कि ईवी मोटर्स, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और व्हीकल कंट्रोल सिस्टम के लिए बेहद जरूरी इन मैग्नेट्स और चिप्स का वैश्विक उत्पादन मुख्य रूप से चीन और ताइवान में होता है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है.
EV Localisation Report: पीएलआई ऑटो स्कीम पर बड़ा खुलासा
रिपोर्ट में भारत सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI Auto) पर एक डेटा साझा किया गया है, जो चिंता को बढ़ाने वाला है. आंकड़ों के मुताबिक, हाल के दिनों में कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को लेकर जितने भी बड़े बिजनेस की घोषणा हुई है, उनमें से करीब 60 प्रतिशत उन कंपनियों द्वारा किये गये हैं, जिन्हें पीएलआई ऑटो स्कीम के तहत मंजूरी मिली हुई है.
25938 करोड़ का 10 फीसदी ही कंपनियों को मिला
इसके बावजूद, वर्ष 2026 की शुरुआत तक इस योजना के तहत उपलब्ध कुल 25,938 करोड़ रुपए (2.98 अरब डॉलर) के फंड में से 10 प्रतिशत से भी कम राशि कंपनियों को दिया गया है. फंड जारी होने में यह सुस्ती घरेलू विनिर्माण की रफ्तार को धीमा कर सकती है.
कहां भारत की पकड़ मजबूत, कहां फोकस की जरूरत?
IEEFA के एनर्जी स्पेशलिस्ट चारित कोंडा और जेएमके के सीनियर कंसल्टेंट प्रभाकर शर्मा कहते हैं कि भारत ने अपने पुराने ऑटोमोटिव मैन्युफैक्चरिंग अनुभव के दम पर स्ट्रक्चरल कंपोनेंट्स, वायरिंग हार्नेस, सस्पेंशन और ब्रेकिंग सिस्टम में नियर-कंप्लीट लोकलाइजेशन हासिल कर लिया है.
ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के लिए जरूरी हैं ये कदम
अगर भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है, तो उसे अपनी खुद की स्वदेशी रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) बढ़ानी होगी, कंपोनेंट स्टैंडर्डाइजेशन पर जोर देना होगा और ईवी स्टार्टअप्स को लोकलाइजेशन प्रोग्राम से जोड़ना होगा, ताकि चीन के दबदबे और एकाधिकार को खत्म किया जा सके.
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