कार में 6 या 8 एयरबैग्स हैं तो क्या आप पूरी तरह सुरक्षित हैं? जानें क्रैश के समय बॉडी शेल क्यों है जरूरी

क्या आपकी कार में 6 या 8 एयरबैग्स होना आपको पूरी तरह सुरक्षित बना देता है? इस आर्टिकल में जानें कि दुर्घटना के समय कार का बॉडी शेल कितना महत्वपूर्ण होता है और यह कैसे आपकी सेफ्टी सुनिश्चित करता है.

भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में सुरक्षा को लेकर ग्राहकों के बीच जागरूकता काफी बढ़ी है. कार खरीदते समय लोग अब यह जरूर देखते हैं कि उसमें कितने एयरबैग दिए गए हैं. सरकार ने भी कारों में सुरक्षा मानकों को सख्त किया है, लेकिन अक्सर एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या केवल एयरबैग्स होने से ही दुर्घटना के समय कार में बैठे लोग सुरक्षित रह सकते हैं? आइए इस आर्टिकल में हम आपको इसके बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं.

बॉडी शेल की मजबूती क्यों है सबसे जरूरी?

कार की बॉडी शेल उसकी मेन स्ट्रक्चर या फ्रेमवर्क होती है. किसी भी बड़े हादसे के समय सबसे पहला और सबसे बड़ा असर इसी फ्रेमवर्क पर पड़ता है. अगर कार की बॉडी शेल मजबूत है, तो वह टकराने के बाद जेनरेट होने वाली एनर्जी को अपने ऊपर ले लेती है और केबिन के अंदर तक उस झटके को नहीं पहुंचने देती.

अगर कार का फ्रेमवर्क ही कमजोर होगा, तो दुर्घटना के समय केबिन बुरी तरह पिचक जाएगा. ऐसे में भले ही कार के अंदर छह या आठ एयरबैग्स खुल जाएं, लेकिन केबिन का ढांचा सिकुड़ने के कारण उसमें बैठे लोगों को गंभीर चोट लग सकती है. इसलिए एयरबैग से भी पहले कार की बॉडी शेल की मजबूती सबसे प्राइमरी सेफ्टी साइकल (Primary Safety Cycle) का काम करती है.

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क्रैश टेस्ट रेटिंग और बॉडी शेल की स्टेबिलिटी

जब भारत-NCAP या ग्लोबल-NCAP जैसी संस्थाएं किसी कार का क्रैश टेस्ट करती हैं, तो वे केवल एयरबैग्स खुलने को नहीं मापतीं. वे यह भी देखती हैं कि टक्कर के बाद कार का ढांचा कितना स्थिर रहा. क्रैश टेस्ट रिपोर्ट में कई बार बॉडी शेल को 'स्टेबल' या 'अनस्टेबल' की कैटेगरी में रखा जाता है.

अनस्टेबल बॉडी शेल का मतलब होता है कि कार का ढांचा अधिक दबाव झेलने के लायक नहीं है. ऐसी गाड़ियों में एयरबैग्स होने के बाद भी यात्रियों के बचने की संभावना कम हो जाती है. वहीं स्टेबल बॉडी शेल वाली कारें झटके को बेहतर तरीके से सह पाती हैं और केबिन के अंदर सुरक्षित जगह बनाए रखती हैं.

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सीटबेल्ट के बिना बेकार हैं एयरबैग्स 

बहुत से लोगों को यह गलतफहमी होती है कि एयरबैग्स होने पर सीटबेल्ट लगाने की जरूरत नहीं है. सच यह है कि एयरबैग और सीटबेल्ट एक साथ मिलकर ही काम करते हैं. एयरबैग बहुत तेज रफ्तार से फूलते हैं. अगर आपने सीटबेल्ट नहीं लगाई है, तो टक्कर के समय आपका शरीर तेजी से आगे की तरफ फेंका जाएगा और एयरबैग के खुलने का दबाव ही आपको गंभीर रूप से घायल कर सकता है. इसके अलावा कई आधुनिक कारों में सीटबेल्ट न बंध होने पर एयरबैग खुलते ही नहीं हैं.

इन बातों का ध्यान रखना जरूरी 

कार खरीदते समय केवल एयरबैग की गिनती न देखें. कार की क्रैश टेस्ट रेटिंग, उसकी बॉडी शेल की स्टेबिलिटी और अपनी तरफ से सीटबेल्ट का रेगुलर इस्तेमाल ही आपको सड़क पर असली सेफ्टी प्रदान करता है.


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By शिवांश शेखर

शॉर्ट बायो 

शिवांश शेखर ऑटोमोबाइल और खेल स्पेशलिस्ट हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. ऑटो सेक्शन में कार/बाइक लॉन्च, फीचर्स, खासियत, टिप्स, कंपेरिजन और सपेक्स से संबंधित खबरें कवर करते हैं.

विस्तृत बायो 

शिवांश शेखर ऑटोमोबाइल और खेल स्पेशलिस्ट पत्रकार हैं, जो पिछले 3 वर्षों से डिजिटल मीडिया में ऑटो और खेल जगत से जुड़ी खबरों के बारे में लगातार लिखते हैं. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं. ऑटो सेक्शन में उनकी रूचि कार/बाइक लॉन्च, फीचर्स, स्पेसिफिकेशन, टिप्स, ट्रिक्स और कंपेरिजन से जुड़े विषयों में है. इसके अलावा फ्लेक्स फ्यूल टेक्नोलॉजी और ऑटो इंडस्ट्रीज के बदलते ट्रेंड्स पर लगातार लिखते हैं. 

उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को सिर्फ लॉन्च, कीमत और फीचर्स के बारे में ही न बताया जाए, बल्कि यह भी जानकारी दी जाए कि वह तकनीक आम लोगों के लिए कितने काम का है, उसे इस्तेमाल करने का अनुभव कैसा रहेगा और उसे खरीदना सही रहेगा या नहीं.

पढ़ाई  

बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में जन्में शिवांश शेखर की शुरुआती शिक्षा (BSEB) से पूरी हुई. इसके बाद उन्होंने साल 2023 में चौधरी चरण सिंह यूनीवर्सिटी, मेरठ (CCSU) के अंतर्गत आने वाली इंसटीच्युट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, नोएडा (IMS) से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की. पढ़ाई के दौरान ही शिवांश की रुचि खेल और ऑटो के विषयों पर लिखने में बढ़ने लगी. इसी दौरान उन्होंने खेल और ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरों पर काम करना शुरू किया और आगे चलकर इन्हीं विषयों को अपने काम का हिस्सा बना लिया. 

काम का सफर 

पत्रकारिता का ककहरा सीखने के बाद शिवांश का सफर एपीएन न्यूज से शुरू हुआ था. उन्होंने पत्रकारिता का समूह जागरण न्यू मीडिया में बतौर सब एडिटर खेल और अन्य खबरों की तकनीकी समझ विकसित की. जेएनएम में करीब डेढ़ साल खेल और अन्य विषयों पर काम करने के बाद उन्होंने एसियानेट न्यूज की तरफ रुख अपनाया. वहां, करीब डेढ़ साल तक ऑटोमोबाइल और स्पोर्ट्स सेक्शन में काम किया और फिर प्रभात खबर का रुख किया, जहां ऑटो बीट पर काम कर रहे हैं. ट्रेंड्स को लगातार फॉलो करते हैं.

विजन 

शिवांश का मानना है कि ऑटोमोबाइल से जुड़ी खबरें केवल नई गाड़ियों के बारे में जानकारी नहीं देती, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, खरीदारों के फैसलों और डिजिटल एक्सपिरियंस पर भी असर डालती हैं.

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