पत्नी की हड्डी टूटने पर ही मिलेगी पति को सजा, तालिबान ने जारी किया खौफनाक कानून

Taliban New Penal Code: तालिबान के नए फरमान ने अफगान महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक नया सवाल खड़ा कर दिया है. अब, पति का हमला तब तक जुर्म नहीं माना जाएगा जब तक हड्डी न टूट जाए. साथ ही इस भेदभाव वाले इस कानून में अमीरों को सिर्फ सलाह और गरीबों को कोड़े मारने का प्रावधान है. जानिए, कैसे यह नया दंड संहिता मानवाधिकारों का गला घोंट रहा है.

Taliban New Penal Code: अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया और बेहद चौंकाने वाला दंड संहिता (पीनल कोड) लागू किया है. यह नया कानून घरेलू हिंसा को एक तरह से ‘हरी झंडी’ देता नजर आ रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संगठन ‘रवादारी’ के अनुसार, अब अफगानिस्तान में कोई पति अपनी पत्नी या बच्चों को तब तक पीट सकता है, जब तक कि उनकी हड्डी न टूट जाए या शरीर पर कोई गहरा घाव न हो जाए.

‘हड्डी नहीं टूटी तो जुर्म नहीं’

द डेली मिरर के अनुसार, रविवार, 15 दिसंबर 2026 को जारी 90 पेज के नए कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि घरेलू हिंसा को अपराध तभी माना जाएगा जब वह अत्यधिक बल की श्रेणी में आए. इसका मतलब है कि अगर मारपीट से शरीर पर ‘खुले घाव’ या ‘हड्डी टूटने’ जैसे निशान नहीं हैं, तो पति पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी. ‘रवादारी’ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह कानून महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न को जायज ठहराने जैसा है.

15 दिन की जेल और ‘चैपेरॉन’ की पाबंदी

अगर कोई महिला यह साबित कर भी देती है कि उसके साथ बहुत ज्यादा मारपीट हुई है और उसकी हड्डी टूटी है, तो भी आरोपी पति को अधिकतम सिर्फ 15 दिन की जेल होगी. लेकिन असली चुनौती तो अदालत तक पहुंचना है. कानून के अनुसार, महिला को अपनी चोट जज को दिखानी होगी, वह भी पूरी तरह ढके रहने की पाबंदी के बीच. सबसे बड़ी बात यह है कि अदालत जाने के लिए भी उसे अपने पति या किसी पुरुष रिश्तेदार (चैपेरॉन) के साथ ही जाना होगा.

रिश्तेदारों से मिलना भी पड़ेगा भारी, हो सकती है जेल

महिलाओं की आजादी पर एक और बड़ी चोट की गई है. नए नियमों के मुताबिक, अगर कोई शादीशुदा महिला अपने पति की इजाजत के बिना अपने माता-पिता या रिश्तेदारों के घर जाती है, तो उसे 3 महीने तक की जेल हो सकती है. यह नियम महिलाओं को पूरी तरह से उनके पतियों के नियंत्रण में रखने के लिए बनाया गया है.

समाज को चार हिस्सों में बांटा, अमीर-गरीब के लिए अलग सजा

तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा साइन किए गए इस कोड ने समाज को चार जातियों या श्रेणियों में बांट दिया है:

  • धार्मिक विद्वान (उलेमा): अगर ये कोई अपराध करते हैं, तो इन्हें सिर्फ ‘नसीहत’ देकर छोड़ दिया जाएगा.
  • कुलीन वर्ग (अशरफ): इन्हें अदालत में बुलाकर केवल सलाह दी जाएगी.
  • मध्यम वर्ग: इन्हें अपराध के लिए जेल की सजा मिलेगी.
  • निचला वर्ग: इस श्रेणी के लोगों को जेल के साथ-साथ कोड़े मारने जैसी शारीरिक सजा भी दी जाएगी.

पुराने कानून खत्म

इस नए कोड ने साल 2009 में पिछली सरकार द्वारा बनाए गए ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन’ (EVAW) कानून को पूरी तरह खत्म कर दिया है. अब गंभीर अपराधों के लिए सजा जेल प्रशासन नहीं, बल्कि इस्लामिक मौलवी तय करेंगे. ‘द इंडिपेंडेंट’ की खबर के मुताबिक, लोग इस कानून के खिलाफ बोलने से भी डर रहे हैं क्योंकि इस कानून पर चर्चा करना भी अब एक अपराध घोषित कर दिया गया है.

दुनिया ने जताई चिंता- यह सब डराने वाला है

संयुक्त राष्ट्र (UN) की विशेष दूत रीम अलसालेम ने इस पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि महिलाओं और लड़कियों के लिए इस कोड के नतीजे भयानक होंगे. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान को रोकने के लिए कुछ करेगा या वे ऐसे ही मनमानी करते रहेंगे? मानवाधिकार संगठन ‘रवादारी’ ने भी संयुक्त राष्ट्र से अपील की है कि इस कोड को तुरंत रुकवाया जाए.

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लेखक के बारे में

By Govind Jee

गोविन्द जी ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से की है. वे वर्तमान में प्रभात खबर में कंटेंट राइटर (डिजिटल) के पद पर कार्यरत हैं. वे पिछले आठ महीनों से इस संस्थान से जुड़े हुए हैं. गोविंद जी को साहित्य पढ़ने और लिखने में भी रुचि है.

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