पृथ्वी की कक्षा में बढ़ती उपग्रहों की भीड़ बनी खतरे की घंटी, सख्त नियमों की उठी मांग

Space Debris: पृथ्वी की कक्षा में तेजी से बढ़ती उपग्रहों की संख्या ने वैज्ञानिकों और विधि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी और सख्त नियमन लागू नहीं किया गया, तो अंतरिक्ष में उपग्रहों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ सकती हैं. लगातार बढ़ती अंतरिक्ष परियोजनाओं के कारण पृथ्वी की कक्षा में भीड़ तेजी से बढ़ रही है. जो आने वाले समय में गंभीर चुनौती खड़े कर सकती है.

Space Debris: पृथ्वी की कक्षा में तेजी से बढ़ती उपग्रहों की संख्या को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जाहिर की है. विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रभावी और सख्त नियम नहीं बनाए गए, तो अंतरिक्ष में उपग्रहों के बीच टकराव की आशंका काफी बढ़ सकती है. ऐसी स्थिति न केवल अंतरिक्ष मिशनों के लिए खतरा बनेगी, बल्कि इससे अंतरिक्ष मलबा (Space Debris) बढ़ने के कारण पर्यावरणीय और तकनीकी संकट भी पैदा हो सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ते उपग्रहों से पृथ्वी की निचली कक्षा में भीड़ बढ़ रही है. यदि टकराव की घटनाएं बढ़ती हैं, तो इससे संचार, मौसम पूर्वानुमान, नेविगेशन और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण उपग्रह भी प्रभावित हो सकते हैं. हालांकि, वैज्ञानिकों और विधि विशेषज्ञों की राय है कि समय रहते ठोस नीतिगत कदम और सख्त नियमन लागू करके इस संभावित संकट को टाला जा सकता है. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नियम और जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा.

स्पेस एक्स ने मांगी 10 लाख उपग्रह भेजने की अनुमति

यह सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है क्योंकि 30 जनवरी 2026 को स्पेसएक्स ने अमेरिका के संघीय संचार आयोग को एक अहम आवेदन दायर किया है. इस आवेदन में अंतरिक्ष में डेटा केंद्र संचालित करने के मकसद से अधिकतम 10 लाख उपग्रह भेजने की अनुमति मांगी गई है. प्रस्ताव के अनुसार, इन उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में 500 से 2000 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच स्थापित किया जाएगा. इनमें से कुछ कक्षाओं को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे लगभग लगातार सूर्य के प्रकाश में रह सकें, जिससे उनकी कार्यक्षमता बेहतर बनी रहे. इस महत्वाकांक्षी प्रस्ताव को लेकर फिलहाल सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बड़ी योजनाओं को मंजूरी देने से पहले सुरक्षा, पर्यावरण और अंतरिक्ष प्रबंधन से जुड़े सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

पृथ्वी की कक्षा में हजारों सक्रिय उपग्रह, लाखों और प्रस्तावित

फरवरी 2026 तक पृथ्वी की कक्षा में करीब 14000 सक्रिय उपग्रह मौजूद हैं, जबकि करीब 12.3 लाख प्रस्तावित उपग्रह परियोजनाएं विभिन्न चरणों में हैं. यह तेजी से बढ़ती संख्या अंतरिक्ष प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर नई चुनौतियां खड़ी कर रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान स्वीकृति प्रक्रिया मुख्य रूप से तकनीकी पहलुओं, जैसे रेडियो आवृत्तियों के आवंटन और प्रक्षेपण सुरक्षा तक ही सीमित है.
हालांकि, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और व्यापक पर्यावरणीय प्रभावों को इस प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, जिससे भविष्य में गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं.

रात के आकाश पर पड़ सकता है स्थायी प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में उपग्रहों की तैनाती से रात का आकाश स्थायी रूप से बदल सकता है. निम्न पृथ्वी कक्षा में मौजूद उपग्रह सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले करीब दो घंटे तक सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हैं, जिससे वे पृथ्वी से स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. खगोलविदों ने साल 2021 में अनुमान लगाया था कि एक दशक से भी कम समय में रात के आकाश में दिखाई देने वाले हर 15 प्रकाश बिंदुओं में से एक उपग्रह हो सकता है. उस समय यह अनुमान करीब 65,000 प्रस्तावित उपग्रहों के आधार पर लगाया गया था. अब, जब प्रस्तावित उपग्रहों की संख्या इससे कई गुना अधिक हो चुकी है, तो वैज्ञानिकों को आशंका है कि भविष्य में रात का प्राकृतिक दृश्य और खगोलीय अध्ययन दोनों ही गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं.

‘केसलर सिंड्रोम’ के खतरे की भी विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

विशेषज्ञों ने ‘केसलर सिंड्रोम’ के खतरे की भी चेतावनी दी है, जिसमें एक टक्कर से मलबे की श्रृंखला बनती है इसके बाद आगे और टक्कर होती जाती हैं, और चेन रिएक्शन की तरह यह प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रहती है. फिलहाल पृथ्वी की कक्षा में 10 सेंटीमीटर या उससे बड़े आकार के करीब 50,000 मलबे के टुकड़े मौजूद हैं. आंकड़ों के अनुसार, यदि टक्कर-रोधी उपाय बंद कर दिए जाएं तो कुछ ही दिनों में बड़ी टक्कर हो सकती है. इसके अलावा, बड़ी संख्या में उपग्रहों के प्रक्षेपण से जीवाश्म ईंधन की खपत बढ़ेगी और ओजोन परत को नुकसान पहुंच सकता है. सेवा-समाप्ति के बाद उपग्रहों को वायुमंडल में जलाने से धातुओं का जमाव बढ़ेगा, जिससे रासायनिक प्रतिक्रियाएं तेज हो सकती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि उपग्रहों की तेज चमक और रेडियो उत्सर्जन खगोलीय अनुसंधान को भी प्रभावित करेंगे, जबकि आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं पर भी असर पड़ सकता है.

विशेषज्ञों ने दिया ‘डार्क स्काईज इम्पैक्ट असेसमेंट’ लागू करने का सुझाव

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के तहत अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाले नुकसान के लिए संबंधित देश जिम्मेदार होते हैं. विधि विशेषज्ञों ने ‘डार्क स्काईज इम्पैक्ट असेसमेंट’ लागू करने का सुझाव दिया है, ताकि किसी भी उपग्रह समूह को मंजूरी देने से पहले उसके वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों का समग्र आकलन किया जा सके. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मकसद अंतरिक्ष विकास को रोकना नहीं, बल्कि संतुलित और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया तय करना है, ताकि आकाश में हो रहे बदलाव स्थायी संकट में न बदलें. (ग्रेरी रेडिसिक – बॉन्ड यूनिवर्सिटी , समान्था लॉलेर – यूनिवर्सिटी ऑफ रेजिना- भाषा)

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लेखक के बारे में

By Pritish Sahay

12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.

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