जोहार. आज है 1 अगस्त.
अगर कोई देश अपने पडोसी देश को अपनी सुरक्षा का हिस्सा मानने लगे, वहां अपनी पसंद की सरकार चाहता रहे, और वहां के सशस्त्र समूहों को अपनी रणनीति का औजार बना ले, तो क्या होगा?
पाकिस्तान की स्ट्रेटजिक डेप्थ की कहानी कुछ ऐसी ही है.
यह केवल सेना की रणनीति नहीं थी, बल्कि दशकों तक Pakistan की विदेश नीति, Afghanistan नीति और India के प्रति उसके रवैये का आधार रही.
लेकिन समय के साथ यही नीति पाकिस्तान के लिए सबसे बडा संकट बन गई.
क्या है स्ट्रेटजिक डेप्थ?
सरल शब्दों में समझें तो स्ट्रेटजिक डेप्थ यानी रणनीतिक गहराई.
युद्ध के समय किसी देश के पास इतना भौगोलिक, राजनीतिक या सैन्य सहारा हो कि वह शुरुआती नुकसान के बाद भी खुद को संभाल सके, सेना को फिर से संगठित कर सके और संघर्ष जारी रख सके.
रूस, चीन, भारत और अमेरिका जैसे विशाल देशों को यह गहराई स्वाभाविक रूप से मिली हुई है.
लेकिन पाकिस्तान का भूगोल अलग है.
उसके प्रमुख शहर, सैन्य ठिकाने और औद्योगिक क्षेत्र भारतीय सीमा से काफी नजदीक हैं.
लाहौर, सियालकोट और रावलपिंडी जैसे शहर सीमा से बहुत दूर नहीं हैं.
ऐसे में पाकिस्तान की सेना को हमेशा यह चिंता रही कि यदि भारत के साथ बडा युद्ध हुआ तो उसके पास पीछे हटकर दोबारा तैयारी करने की पर्याप्त जगह नहीं होगी.
यहीं से स्ट्रेटजिक डेप्थ का विचार मजबूत हुआ.
1971 के बाद और गहरा हुआ डर
1947 के विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान खुद को भारत की तुलना में कमजोर मानता रहा. लेकिन 1971 का युद्ध और बांग्लादेश का बनना उसकी सुरक्षा सोच को पूरी तरह बदल गया.
पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को लगा कि केवल सेना मजबूत करने से काम नहीं चलेगा. उसे अपने चारों ओर ऐसा माहौल बनाना होगा जहां भारत का प्रभाव कम से कम हो.
1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया. यह घटना पाकिस्तान के लिए चुनौती भी थी और अवसर भी.
जनरल जिया उल हक के दौर में पाकिस्तान ने अमेरिका और सऊदी अरब के साथ मिलकर अफगान मुजाहिदीन का समर्थन किया. इसी दौर में सेना के भीतर यह सोच मजबूत हुई कि यदि अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थक सरकार बनी रहती है तो वह पाकिस्तान के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगी.
Taliban और Proxy रणनीति
सोवियत सेना के वापस जाने के बाद अफगानिस्तान गृहयुद्ध में फंस गया.
इसी दौर में तालिबान का उदय हुआ.
पाकिस्तान ने तालिबान को समर्थन दिया. उसका मानना था कि यदि काबुल में तालिबान की सरकार होगी तो अफगानिस्तान उसकी सुरक्षा नीति के अनुरूप काम करेगा.
यही वह दौर था जब Strategic Depth केवल भूगोल तक सीमित नहीं रही.
यह प्राक्सी समूहों, धार्मिक नेटवर्क और खुफिया रणनीति का हिस्सा बन गई.
इसी समय कश्मीर में भी पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद तेजी से बढा. पाकिस्तान की सोच थी कि पश्चिम में अफगानिस्तान और पूर्व में प्राक्सी दबाव बनाकर वह भारत पर रणनीतिक बढत हासिल कर सकता है.
जनरल मिर्जा असलम बेग ने दिया स्पष्ट रूप
1980 के दशक के आखिर में सेना प्रमुख जनरल मिर्जा असलम बेग ने इस अवधारणा को खुलकर सामने रखा.
उनका मानना था कि युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान को अफगानिस्तान के भीतर तक रणनीतिक पहुंच होनी चाहिए.
सैन्य संसाधनों का फैलाव, पश्चिमी दिशा में सुरक्षित क्षेत्र और भारत के खिलाफ दो मोर्चों पर दबाव, यही इस सोच का आधार था.
उस समय पाकिस्तान को लगा कि उसने अपनी सबसे बडी रणनीतिक कमजोरी का समाधान खोज लिया है.
लेकिन इतिहास की दिशा कुछ और थी.
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वही नीति पाकिस्तान पर भारी पड गई
किसी भी प्राक्सी समूह को लंबे समय तक नियंत्रित रखना आसान नहीं होता.
तालिबान धीरे-धीरे स्वतंत्र शक्ति बन गया.
इसके बाद पाकिस्तान के भीतर तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान यानी TTP जैसे संगठन उभरने लगे.
आज पाकिस्तान में होने वाले अनेक आतंकी हमलों के पीछे इन्हीं समूहों का नाम सामने आता है.
यानी जिस नेटवर्क को पाकिस्तान ने अपनी सुरक्षा के लिए तैयार किया, वही उसके लिए खतरा बन गया.
इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा में "ब्लोबैक" कहा जाता है.
2021 के बाद पूरी तस्वीर बदल गई
अगस्त 2021 में तालिबान फिर से अफगानिस्तान की सत्ता में लौटा.
पाकिस्तान को उम्मीद थी कि पुराने रिश्तों का फायदा मिलेगा.
लेकिन हुआ उल्टा.
डूरंड रेखा को लेकर दोनों देशों में मतभेद बने हुए हैं.
टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी दोनों देशों के बीच लगातार तनाव है.
सीमा पर कई बार गोलीबारी और झडपें हो चुकी हैं.
जिस अफगानिस्तान को पाकिस्तान कभी अपनी सुरक्षा की ढाल मानता था, वही आज उसकी सबसे कठिन सुरक्षा चुनौती बन गया है.
क्या आज भी यह अवधारणा प्रासंगिक है?
कुछ हद तक हां.
भूगोल आज भी नहीं बदला है. पाकिस्तान की मुख्य आबादी और सैन्य ढांचा अब भी भारतीय सीमा के करीब है.
लेकिन आधुनिक युद्ध अब पहले जैसे नहीं रहे.
आज ड्रोन, मिसाइल, साइबर हमला, सैटेलाइट निगरानी और लंबी दूरी की मारक क्षमता के दौर में केवल भौगोलिक गहराई पर्याप्त नहीं मानी जाती.
आज किसी देश की असली स्ट्रेटजिक डेप्थ उसकी मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, राजनीतिक स्थिरता, सामाजिक एकजुटता और भरोसेमंद कूटनीति होती है.
भारत के लिए क्या सबक?
भारत ने अफगानिस्तान में अलग रास्ता चुना.
उसने संसद भवन बनाया, सलमा बांध का निर्माण कराया, सडकें बनाईं, शिक्षा और स्वास्थ्य परियोजनाओं में सहयोग दिया.
भारत ने अपनी मौजूदगी विकास और कूटनीति के जरिये मजबूत करने की कोशिश की.
यह तरीका धीमा जरूर था, लेकिन दीर्घकाल में अधिक टिकाऊ माना जाता है.
निष्कर्ष
पाकिस्तान की स्ट्रेटजिक डेप्थ की कहानी बताती है कि केवल भूगोल से सुरक्षा नहीं मिलती.
यदि कोई देश अपनी सुरक्षा नीति को प्राक्सी संगठनों, उग्रवाद और अस्थायी रणनीतिक लाभ पर आधारित करता है, तो वही नीति आगे चलकर उसके लिए सबसे बडा खतरा बन सकती है.
आज पाकिस्तान उसी स्थिति का सामना कर रहा है.
जिस अफगानिस्तान को उसने दशकों तक अपनी रणनीतिक गहराई बनाने की कोशिश की, वही अब उसकी सुरक्षा चिंता का सबसे संवेदनशील मोर्चा बन चुका है.
इसलिए स्ट्रेटजिक डेप्थ अब केवल एक सैन्य अवधारणा नहीं, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि गलत रणनीतिक निवेश का असर कई पीढियों तक किसी देश को भुगतना पड सकता है.
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