आंकड़े बताते हैं कि पाकिस्तान का आंतरिक सुरक्षा संकट लगातार गहराता जा रहा है और विद्रोही हिंसा के खिलाफ सेना की लड़ाई पहले से अधिक खूनी होती जा रही है. आंकड़े दर्शाते हैं कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी से जुड़े संघर्षों में सुरक्षा बलों की मौतें टीटीपी से जुड़े मामलों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं. साल 2024 में बीएलए से जुड़ी घटनाओं में 151 और टीटीपी से जुड़े मामलों में 71 सुरक्षाकर्मी मारे गये थे.
साल 2025 में बीएलए से संघर्ष में 339 पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी
साल 2025 में बीएलए से संघर्ष में 339 और टीटीपी के साथ 174 पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई. इस साल सितंबर की शुरुआत तक बीएलए से जुड़े संघर्षों में 136 और टीटीपी से जुड़े मामलों में 87 सुरक्षाकर्मियों की मौतें सामने आयी हैं. हालांकि कई हमले अप्रत्यक्ष या अज्ञात श्रेणी में भी होते हैं. साफ है कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वाह दोनों ही पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं.
- दो साल में 131% बढ़ीं मौतें
- 2023 : 532 सुरक्षाकर्मी मारे गये
- 2024 : यह संख्या बढ़कर 754 हुई, यानी 41.7% की वृद्धि
- 2025 : मौतें 1,229 पहुंच गयीं, यानी एक साल में करीब 63% की बढ़ोतरी
- 2026 : आठ महीनों में 957 सुरक्षाकर्मी मारे गये
कहां और क्यों हो रहे विद्रोह
पाकिस्तान में सुरक्षा बलों की यह मौतें मुख्य रूप से दो प्रमुख अंचलों- बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा- में केंद्रित हैं. बलूचिस्तान में अकेले 2025 में 751 और खैबर पख्तूनख्वा में 455 सुरक्षाकर्मी मारे गये थे. दोनों को मिलाकर कुल 1,206 मौतें इन दो प्रांतों में हुईं, जबकि पूरे देश का कुल आंकड़ा 1,229 था. इस साल अब तक अकेले बलूचिस्तान में 630 सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं, जबकि खैबर पख्तूनख्वा में यह संख्या 280 है. इस तरह इस साल अब तक लगभग 68 फीसदी सुरक्षा बलों की मौतें केवल बलूचिस्तान से सामने आयी हैं. यह पाकिस्तान की बदलती आंतरिक सुरक्षा स्थिति का सबसे बड़ा संकेत है. खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान मुख्य आतंकी चुनौती बना है.
दुनिया के नक्शे पर भारत के वोट से तिलमिलाया पाकिस्तान
संयुक्त राष्ट्र में दुनिया के नक्शे को लेकर आये एक प्रस्ताव पर भारत के समर्थन के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच बयानबाजी फिर तेज हो गयी है. भारत ने चार सितंबर को अपनाये गये प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत ने यह भी साफ किया कि प्रस्ताव का जम्मू-कश्मीर, लद्दाख या किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा के राजनीतिक दर्जे से कोई लेना-देना नहीं है. इसके बावजूद अगले ही दिन पाकिस्तान ने भारत के रुख को निशाना बनाया और जम्मू-कश्मीर पर अपने पुराने दावे दोहरा दिये.
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