त्रिशूली में 216 मेगावाट प्रोजेक्ट की सुरंग में काम कर रहे बिहार के रक्सौल के राहुल कुमार सिंह 26 अगस्त को आई बाढ़ में लापता हो गए. सात दिन बाद भी जब राहुल का शव नहीं मिला तो उनके पिता धर्म सिंह ने कुश से बने प्रतीकात्मक शरीर का अंतिम संस्कार किया.
इसके अलावा नेपाल से भी ऐसी जानकारी सामने आ रही है कि विनाशकारी बाढ़ के बाद कई परिवार अपनों के शव मिलने का इंतजार कर रहे हैं तो कई ऐसे भी हैं जिन्होंने कुश घास से मृतक की प्रतीकात्मक शव बनाकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं. सवाल है कि क्या ऐसा किया जा सकता है? अगर हां तो शव नहीं मिलने पर कैसे होता है अंतिम संस्कार?
नेपाल में आई बाढ़ से हजारों लोग लापता
- नेपाल में आई बाढ़ और भूस्खलन ने कई परिवारों को प्रभावित किया. सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों लोग अभी भी लापता हैं.
- यह ऐसी त्रासदी है, जिससे उन्हें अपनों की मौत की खबर तो मिल गई, लेकिन शव अब तक नहीं मिल पाया.
- कई शव बह जाने या दूर-दराज इलाकों में चले जाने के कारण उनकी पहचान और बरामदगी मुश्किल बनी हुई है.
- ऐसी स्थिति में नेपाल के कुछ परिवार कुश घास से मृतक की प्रतीकात्मक आकृति बनाकर अंतिम संस्कार कर रहे हैं
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शव न मिलने पर कैसे किया जाता है अंतिम संस्कार
- गरुड़ पुराण-सारोद्धार के प्रेतकल्प के अध्याय 10 में श्लोक 88 से 90 के बीच ऐसी स्थिति का उल्लेख है, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए लेकिन उसका शरीर प्राप्त न हो सके तो क्या किया जाए.
- इन श्लोकों में बताया गया है कि किसी निर्जन स्थान, जंगल या अन्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाए और शव के ना मिले तो ऐसी स्थिति में दर्भ यानी कुश घास से मृतक की प्रतिकृति बनाकर उसका दाह किया जाए.
- इसके बाद उस प्रतीकात्मक दाह से मिली राख को गंगा के जल में विसर्जित करने और उसी दिन से आगे की दशगात्र संबंधी क्रियाएं शुरू करने का विधान बताया गया है. जिस तारीख को मृत्यु का समाचार मिले, उसे वार्षिक श्राद्ध के लिए भी आधार बनाने की बात कही गई है.
यानी अंतिम संस्कार के लिए हर स्थिति में वास्तविक शव का उपलब्ध होना अनिवार्य नहीं है.
कुश घास से ही क्यों बनाया जाता है मृतक का प्रतीकात्मक शव ?
- हिंदू धार्मिक परंपरा में दर्भ या कुश को पवित्र घास माना गया है और कई धार्मिक अनुष्ठानों में इसका इस्तेमाल होता है.
- गरुड़ पुराण के इस प्रसंग में भी इसी घास से मृतक की प्रतीकात्मक आकृति बनाने की बात आती है.
- इसलिए शव उपलब्ध नहीं होने पर किया जाने वाला यह कर्म केवल आधुनिक आपदा के समय निकाला गया उपाय नहीं है, बल्कि इसका एक शास्त्रीय संदर्भ मौजूद है.
नेपाल में क्यों अपनानी पड़ रही है यह परंपरा?
- नेपाल में आई आपदा के बाद बड़ी संख्या में लोग लापता हैं और कई शवों की पहचान अब तक नहीं हो सकी है.
- कुछ इलाकों में शवों की संख्या इतनी अधिक है कि प्रशासन को अस्थायी दफन जैसी आपात व्यवस्था भी करनी पड़ी.
- ऐसे में जिन परिवारों को अपने परिजनों का शव नहीं मिल रहा, उनके लिए धार्मिक रूप से अंतिम विदाई देना भी एक बड़ी चिंता बन गया है.
- ऐसे में कुश से प्रतीकात्मक शव बनाकर अंतिम संस्कार करना उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने का माध्यम भी है.
