60,80 या 100 कितने साल जिएंगे आप? जापानी रिसर्च में सामने आया चौंकाने वाला जवाब

जापान में हुई एक अनोखी रिसर्च बताती है कि आपकी उम्र को लेकर आपकी अपनी उम्मीदें आपकी वास्तविक उम्र को प्रभावित कर सकती हैं. जानें कैसे आपकी सोच आपकी जिंदगी को बदल सकती है.

क्या आपने कभी सोचा है कि आप कितने साल की उम्र तक जिएंगे? यह सवाल भले ही अजीब लगे, लेकिन इसका जवाब आपकी सेहत और भविष्य को लेकर आपकी सोच के बारे में बहुत कुछ संकेत देता है. जापान में हुई एक नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों को अपनी लंबी उम्र की उम्मीद थी, वे वास्तव में भी ज्यादा समय तक जीवित रहे.

2,000 लोगों पर 28 साल तक जापान में हुआ रिसर्च

यह स्टडी जापान के यूनिवर्सिटी ऑफ त्सुकुबा के शोधकर्ताओं ने किया. इसमें जापान के 60 या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया. इसमें हिस्सा लेने वाले 2,054 प्रतिभागियों ने अपनी जिने की संभावित उम्र बताई.

इसके बाद शोधकर्ताओं ने करीब 28 साल तक उनके जीवन से जुड़े आंकड़ों को देखा. इस दौरान 1,514 प्रतिभागियों की मौत हो गई.

रिसर्च का मुख्य सवाल था कि क्या किसी व्यक्ति का अपनी उम्र को लेकर लगाया गया अनुमान उसकी वास्तविक जीने की उम्र का संकेत दे सकता है?
  • रिसर्च का जवाब पूरी तरह हां या ना में नहीं है. लेकिन वैज्ञानिकों को एक दिलचस्प कनेक्शन जरूर मिला. जिन लोगों को लगता था कि वे लंबी उम्र तक जिएंगे, वे अक्सर सच में भी दूसरों के मुकाबले ज्यादा समय तक जिए.

59 फीसदी लोग अपने अनुमान से ज्यादा दिनों तक जिंदा रहे

  • रिसर्च का सबसे दिलचस्प नतीजा यह रहा कि लगभग 59 फीसदी प्रतिभागी, अपनी बताई हुई उम्र से ज्यादा दिनों तक जीवित रहे.
  • रिसर्च का एक नतीजा ये रहा कि इंसान अपनी मौत की उम्र का सही अनुमान नहीं लगा सकता है,लेकिन कई लोग अक्सर अपनी संभावित उम्र को कम आंक सकते हैं.
  • महिलाओं और ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों में अपनी अनुमानित उम्र से आगे जीने की संभावना ज्यादा देखी गई, वहीं खराब स्वास्थ्य वाले लोगों में यह संभावना कम थी,
  • रिसर्च में लोगों के जिंदा रहने में, उम्र, महिला या पुरुष होने, सेहत और आर्थिक स्थिति जैसी चीजों को अलग रखने के बाद भी यह कनेक्शन दिखाई दिया.
  • यानी आपकी अपनी जिंदगी को लेकर बनी उम्मीद पूरी तरह सटीक भले न हो, लेकिन वह आपकी वास्तविक उम्र के बारे में कुछ संकेत जरूर देती है.

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80 साल तक जिंदा रहने का दवा, इसमें कितनी है सच्चाई?

  • वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत सेहत और परिस्थितियों के आधार पर जवाब देने के बजाय एक आम और परिचित उम्र चुनते हैं.
  • 80 साल ऐसा ही एक आम जवाब है. इसे शोधकर्ताओं ने फोकल पॉइंट यानी आसानी से दिमाग में आने वाली उम्र के तौर पर देखा.
  • इससे यह भी पता चलता है कि अपनी उम्र का अनुमान लगाना हमेशा व्यक्तिगत भविष्यवाणी नहीं होता. कई लोग
  • सामाजिक धारणाएं और अपने आसपास के लोगों की उम्र को लेकर कोई नंबर सोच लेते हैं. यह सोच को उनके उम्र को प्रभावित कर सकती हैं.

जापान में लोगों की लंबी उम्र का रिसर्च पर दिखा कोई असर

  • जापान में लोग लंबी उम्र के लिए जाने जाते हैं, जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, यहां जन्म लेने वाले पुरुष औसतन 81.09 साल और महिलाएं 87.13 साल तक जीती हैं.
  • वहीं, 65 साल की उम्र पार करने के बाद भी जिंदगी के कई साल बाकी रहते हैं. इस उम्र तक पहुंच चुके पुरुष औसतन 19.47 साल और महिलाएं करीब 24.38 साल और जिंदा रह सकते हैं.
  • ऐसे में यह रिसर्च और भी दिलचस्प हो जाती है कि आखिर कोई व्यक्ति खुद को कितने साल तक जीता हुआ देखता है, क्या उसका असल जिंदगी से भी कोई लेना-देना है?
  • इस स्टडी में इसका जवाब काफी हद तक हां में मिला, जो लोग मानते थे कि वे लंबी उम्र तक जिएंगे, वे अक्सर सच में भी ज्यादा साल तक जिए. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कोई अपनी मौत की उम्र पहले से जान सकता है.

किन फैसलों से बदल सकता है लंबी उम्र का अनुमान?

  • शोधकर्ताओं के मुताबिक किसी व्यक्ति को लगता है कि वह कितने साल जिएगा तो इसका असर सिर्फ मानसिक सोच तक सीमित नहीं है. यह रिटायरमेंट, बचत, पेंशन और भविष्य की आर्थिक योजना जैसे फैसलों से भी जुड़ा हो सकता है.
  • अगर कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी छोटी मानकर चलता है, तो वह कम बचत कर सकता है. वहीं लंबी उम्र की उम्मीद रखने वाला व्यक्ति लंबे समय के खर्चों के लिए ज्यादा तैयारी कर सकता है.
  • हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इस रिसर्च को उम्र बताने वाली कोई भविष्यवाणी मशीन नहीं समझना चाहिए. यह अध्ययन बताता है कि अपनी संभावित उम्र को लेकर हमारी सोच में वास्तविक जीवन अनुभव से कुछ संबंध हो सकता है, लेकिन इसमें काफी अनिश्चितता भी रहती है.
  • हालांकि, इस रिसर्च को लेकर एक बात ध्यान रखना जरूरी है. यह स्टडी अभी मेडआरएक्सिव पर प्रीप्रिंट के तौर पर प्रकाशित हुई है. यानी दूसरे वैज्ञानिकों ने अभी इसकी जांच-पड़ताल नहीं की है. इसलिए इसके नतीजों को पक्के निष्कर्ष की बजाय शुरुआती जानकारी के तौर पर देखना चाहिए.

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By गौतम कुमार

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