ईरान युद्ध लंबा खिंचा, तो दुनिया में आ सकती है आर्थिक मंदी, भारत की तैयारी कितनी? एक्सपर्ट्स से समझें

Iran War Global Economic Recession: ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर हमला किया. इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए यमन को छोड़कर मिडिल ईस्ट के लगभग सभी देशों को निशाना बनाया. इन देशों पर हमले के बाद पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो गया है.

Iran War Global Economic Recession: पश्चिम एशिया में गहराते संघर्ष और 100 डॉलर के पार पहुंचे कच्चे तेल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है. शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली. सेंसेक्स 1,470.50 अंक (1.93%) गिरकर 74,563.92 पर बंद हुआ, वहीं निफ्टी 488 अंक टूटकर 23,151 पर आ गया. ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद शुरू हुए इस संकट के 14 दिनों में सेंसेक्स कुल 6,723 अंक गिर चुका है, जिससे निवेशकों को अनुमानतः 33.68 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ है.

शुक्रवार को यह गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं रही. अमेरिकी बाजार (डॉव जोंस -1.6%) और एशियाई बाजार (निक्केई, कोस्पी) भी लाल निशान में रहे. यह पिछले पांच वर्षों में सेंसेक्स में 10 से 15 दिनों के बीच हुई सबसे बड़ी गिरावट है.

युद्ध से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के बाजारों का हाल खराब है. यदि यह युद्ध दो से तीन महीने तक लंबा खिंच गया, तो दुनिया भर में आर्थिक मंदी आने की प्रबल आशंका है. यदि कच्चे तेल के दाम ऐसे ही 100–120 डॉलर के बीच बने रहते हैं, तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे भुगतान संतुलन बिगड़ सकता है.

निवेशक घबराएं नहीं, रणनीति बदलें

चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अभिजीत मुखोपाध्याय कहते हैं कि बाजार में आई यह गिरावट भू-राजनीतिक कारणों से है, जो अक्सर अस्थायी होती है. इसलिए घबराहट में आकर अपनी पूंजी को घाटे में न निकालें.

वैश्विक वैल्यू चेन प्रभावित होने के कारण अब अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों के बजाय उन कंपनियों पर ध्यान दें जो घरेलू मांग या रक्षा उत्पादन से जुड़ी हैं. संकट के समय सोना सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है. इसलिए अपने पोर्टफोलियो का कुछ हिस्सा सुरक्षित संपत्तियों में रखें.

क्यों है परेशानी : बाजार की घबराहट की वजह

मेजर जनरल (रिटायर्ड) मनोज कुमार बताते हैं कि मुख्य चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराता खतरा है. दुनिया का लगभग 20–30% तेल इसी संकरे रास्ते से गुजरता है. ईरान द्वारा इसे बाधित करने की चेतावनी से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार चली गई हैं, जो भारत जैसे आयातक देश के लिए बड़ी चुनौती है.

युद्ध लंबा खिंचा तो क्या हैं विकल्प

लंबा संघर्ष होने पर भारत के पास विकल्प तैयार हैं. अब हम रूस, अमेरिका और अफ्रीका से अधिक तेल खरीद रहे हैं, तो होर्मुज पर निर्भर नहीं हैं. साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा रूस से तेल खरीदने की छूट मिलने से वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ने और कीमतें स्थिर होने की उम्मीद है.

भारत के पास कितना बैकअप

भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ‘रणनीतिक भंडारण’ मजबूत किया है. भूमिगत गुफाओं में हमारे पास 10 दिनों का आपातकालीन स्टॉक है. यदि रिफाइनरी और पाइपलाइन के तेल को जोड़ लें, तो भारत के पास लगभग 87 दिनों (करीब तीन महीने) का पर्याप्त बैकअप है. यानी सप्लाई ठप होने पर भी देश तीन महीने तक सामान्य रूप से चल सकता है.

आम आदमी पर असर

कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास कर रही हैं. यदि दबाव बढ़ा, तो केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर सकती है, ताकि जनता पर महंगाई का सीधा बोझ न पड़े और माल ढुलाई सुचारू बनी रहे.

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फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है यह युद्ध

यह युद्ध फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है और कम से कम अगले 15 दिनों तक संघर्ष जारी रहने की पूरी आशंका है. राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार यह कह रहे हैं कि उनके सभी सैन्य लक्ष्य पूरे हो गए हैं, लेकिन उन्होंने कभी यह साफ नहीं किया कि उनके वास्तविक लक्ष्य क्या थे. मेरा मानना है कि ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन’ उनका सबसे बड़ा छिपा हुआ लक्ष्य था, जो अभी तक पूरा नहीं हो सका है.

वहीं, इजरायल का रुख भी बेहद सख्त है. उसने साफ कर दिया है कि जब तक उसके लक्ष्य पूरे नहीं होते, वह हमले नहीं रोकेगा. ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का संदेश भी बिल्कुल स्पष्ट है कि अब ईरान अपनी शर्तों पर ही युद्ध समाप्त करेगा.

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मोजतबा ने होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आपूर्ति रोकने और अमेरिका व इजरायल में अपने ‘स्लीपर सेल्स’ को सक्रिय कर टारगेटेड हमले करने की जो चेतावनी दी है, वह स्थिति को और अधिक गंभीर बनाती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान को चीन और रूस का समर्थन हासिल है, इसलिए उसे युद्ध के संसाधनों की कमी फिलहाल होने वाली नहीं है. इन परिस्थितियों में युद्धविराम की उम्मीद अभी बेमानी लगती है.

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By Anant narayan shukla

अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. अनन्त राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर खबरें करते हैं. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यमात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं.

अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं.

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अनन्त कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं.

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.

तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.

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