Iran War Global Economic Recession: पश्चिम एशिया में गहराते संघर्ष और 100 डॉलर के पार पहुंचे कच्चे तेल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है. शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली. सेंसेक्स 1,470.50 अंक (1.93%) गिरकर 74,563.92 पर बंद हुआ, वहीं निफ्टी 488 अंक टूटकर 23,151 पर आ गया. ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद शुरू हुए इस संकट के 14 दिनों में सेंसेक्स कुल 6,723 अंक गिर चुका है, जिससे निवेशकों को अनुमानतः 33.68 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ है.
शुक्रवार को यह गिरावट केवल भारत तक सीमित नहीं रही. अमेरिकी बाजार (डॉव जोंस -1.6%) और एशियाई बाजार (निक्केई, कोस्पी) भी लाल निशान में रहे. यह पिछले पांच वर्षों में सेंसेक्स में 10 से 15 दिनों के बीच हुई सबसे बड़ी गिरावट है.
युद्ध से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के बाजारों का हाल खराब है. यदि यह युद्ध दो से तीन महीने तक लंबा खिंच गया, तो दुनिया भर में आर्थिक मंदी आने की प्रबल आशंका है. यदि कच्चे तेल के दाम ऐसे ही 100–120 डॉलर के बीच बने रहते हैं, तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे भुगतान संतुलन बिगड़ सकता है.
निवेशक घबराएं नहीं, रणनीति बदलें
चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अभिजीत मुखोपाध्याय कहते हैं कि बाजार में आई यह गिरावट भू-राजनीतिक कारणों से है, जो अक्सर अस्थायी होती है. इसलिए घबराहट में आकर अपनी पूंजी को घाटे में न निकालें.
वैश्विक वैल्यू चेन प्रभावित होने के कारण अब अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रों के बजाय उन कंपनियों पर ध्यान दें जो घरेलू मांग या रक्षा उत्पादन से जुड़ी हैं. संकट के समय सोना सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है. इसलिए अपने पोर्टफोलियो का कुछ हिस्सा सुरक्षित संपत्तियों में रखें.
क्यों है परेशानी : बाजार की घबराहट की वजह
मेजर जनरल (रिटायर्ड) मनोज कुमार बताते हैं कि मुख्य चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराता खतरा है. दुनिया का लगभग 20–30% तेल इसी संकरे रास्ते से गुजरता है. ईरान द्वारा इसे बाधित करने की चेतावनी से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार चली गई हैं, जो भारत जैसे आयातक देश के लिए बड़ी चुनौती है.
युद्ध लंबा खिंचा तो क्या हैं विकल्प
लंबा संघर्ष होने पर भारत के पास विकल्प तैयार हैं. अब हम रूस, अमेरिका और अफ्रीका से अधिक तेल खरीद रहे हैं, तो होर्मुज पर निर्भर नहीं हैं. साथ ही, अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा रूस से तेल खरीदने की छूट मिलने से वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ने और कीमतें स्थिर होने की उम्मीद है.
भारत के पास कितना बैकअप
भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ‘रणनीतिक भंडारण’ मजबूत किया है. भूमिगत गुफाओं में हमारे पास 10 दिनों का आपातकालीन स्टॉक है. यदि रिफाइनरी और पाइपलाइन के तेल को जोड़ लें, तो भारत के पास लगभग 87 दिनों (करीब तीन महीने) का पर्याप्त बैकअप है. यानी सप्लाई ठप होने पर भी देश तीन महीने तक सामान्य रूप से चल सकता है.
आम आदमी पर असर
कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास कर रही हैं. यदि दबाव बढ़ा, तो केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर सकती है, ताकि जनता पर महंगाई का सीधा बोझ न पड़े और माल ढुलाई सुचारू बनी रहे.
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फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है यह युद्ध
यह युद्ध फिलहाल थमता नहीं दिख रहा है और कम से कम अगले 15 दिनों तक संघर्ष जारी रहने की पूरी आशंका है. राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार यह कह रहे हैं कि उनके सभी सैन्य लक्ष्य पूरे हो गए हैं, लेकिन उन्होंने कभी यह साफ नहीं किया कि उनके वास्तविक लक्ष्य क्या थे. मेरा मानना है कि ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन’ उनका सबसे बड़ा छिपा हुआ लक्ष्य था, जो अभी तक पूरा नहीं हो सका है.
वहीं, इजरायल का रुख भी बेहद सख्त है. उसने साफ कर दिया है कि जब तक उसके लक्ष्य पूरे नहीं होते, वह हमले नहीं रोकेगा. ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का संदेश भी बिल्कुल स्पष्ट है कि अब ईरान अपनी शर्तों पर ही युद्ध समाप्त करेगा.
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मोजतबा ने होर्मुज स्ट्रेट से तेल की आपूर्ति रोकने और अमेरिका व इजरायल में अपने ‘स्लीपर सेल्स’ को सक्रिय कर टारगेटेड हमले करने की जो चेतावनी दी है, वह स्थिति को और अधिक गंभीर बनाती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान को चीन और रूस का समर्थन हासिल है, इसलिए उसे युद्ध के संसाधनों की कमी फिलहाल होने वाली नहीं है. इन परिस्थितियों में युद्धविराम की उम्मीद अभी बेमानी लगती है.
