US Iran War: ईरान के साथ युद्ध ने अमेरिका को लाभ कम और हानि ज्यादा हो रही है. अमेरिका पर भारी आर्थिक और सैन्य दबाव पड़ रहा है. पेंटागन के अनुमान के मुताबिक, सितंबर के अंत तक इस लड़ाई पर करीब 37.5 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं. इसमें युद्ध के दौरान नष्ट हुए सैन्य ठिकानों और दूसरे बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण का खर्च शामिल नहीं है. इसी कारण अब पेंटागन फारस की खाड़ी में अमेरिका की लंबे समय से चली आ रही सैन्य मौजूदगी पर फिर से विचार कर रहा है. अधिकारी यह देख रहे हैं कि युद्ध खत्म होने के बाद खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ठिकानों की तैनाती किस तरह की होनी चाहिए.
खाड़ी क्षेत्रों में अमेरिकी ठिकानों की सुरक्षा पर सवाल
अमेरिका के जॉर्डन से लेकर ओमान तक करीब 20 सैन्य ठिकाने हैं, जहां करीब 40 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं. बहरीन में अमेरिकी पांचवें बेड़े का मुख्यालय भी है, जबकि कुवैत, कतर और दूसरे खाड़ी देशों में भी अमेरिका की बड़ी सैन्य मौजूदगी है. लेकिन ईरान के साथ लड़ाई के दौरान इन सैन्य ठिकानों की कमजोरी सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों से कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा है.
200 से ज्यादा सैन्य ठिकानों को नुकसान
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार ईरान युद्ध में अमेरिका को काफी नुकसान हुआ है.
- युद्ध के दौरान 200 से अधिक अमेरिकी सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा है या वे नष्ट हो गए हैं.
- कुवैत में एक सैन्य ठिकाने पर मार्च में हुए हमले में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हुई थी.
- अमेरिकी सेना ने अपने सैनिकों और ठिकानों की सुरक्षा के लिए 1,000 से अधिक आधुनिक एयर डिफेंस इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया. इससे पैट्रियट और THAAD जैसे एयर डिफेंस सिस्टम के भंडार भी काफी कम हो गये हैं.
क्या खाड़ी से हटेंगे अमेरिकी सैनिक?
इन हमलों के बाद पेंटागन के अंदर इस बात पर चर्चा हो रही है कि सैनिकों और सैन्य उपकरणों को खाड़ी क्षेत्र से कुछ दूर दूसरी जगहों पर भेजा जाए. एक विकल्प के तौर पर जॉर्डन, इजरायल या सऊदी अरब के लाल सागर वाले हिस्से में सैनिक और हथियार तैनात करने पर विचार किया जा रहा है. इसका मकसद ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे को कम करना है.
कुवैत जैसे ठिकानों को बंद करने पर भी विचार
एक प्रस्ताव में कुवैत जैसे उन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करने की बात कही जा रही है, जो ईरानी मिसाइल और ड्रोन की पहुंच में आसानी से आ सकते हैं. इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात, जॉर्डन और बहरीन में मौजूद कुछ अमेरिकी सैनिकों और उपकरणों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने का सुझाव दिया गया है.
इजरायल में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का भी प्रस्ताव
एक अलग सुझाव में अमेरिकी सैन्य क्षमताओं का कुछ हिस्सा इजरायल के ओवदा एयरबेस पर भेजने की बात कही गई है. हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर अमेरिकी प्रशासन के भीतर एक राय नहीं है. कुछ अधिकारी इजरायल में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने के पक्ष में हैं, जबकि कुछ इसे सुरक्षा और खुफिया जानकारी से जुड़े जोखिम के तौर पर देख रहे हैं.
ट्रंप प्रशासन के भीतर भी अलग-अलग राय
मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर ट्रंप प्रशासन के अंदर भी मतभेद सामने आ रहे हैं. एक पक्ष चाहता है कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपनी सैन्य जिम्मेदारी कम करे और ज्यादा ध्यान घरेलू सुरक्षा और चीन से मुकाबले पर लगाए. वहीं दूसरा पक्ष चाहता है कि अमेरिका इस इलाके में, खासकर इजरायल के आसपास, अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत बनाए रखे.
खाड़ी देशों पर भी पड़ेगा असर
अगर अमेरिका फारस की खाड़ी में अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता है तो इसका असर उसके सहयोगी देशों पर भी पड़ सकता है. खाड़ी के कई देश लंबे समय से सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर निर्भर रहे हैं. ऐसे में अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम होने पर इन देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने या दूसरे देशों के साथ नए रक्षा समझौते करने पड़ सकते हैं.
युद्ध का खर्च 37.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान
पेंटागन का अनुमान है कि सितंबर के अंत तक ईरान युद्ध पर करीब 37.5 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं. इसमें तबाह हुए सैन्य ठिकानों और दूसरे ढांचों को दोबारा बनाने की लागत शामिल नहीं है. ऐसे में अमेरिका के सामने सवाल सिर्फ युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई का नहीं है. उसे यह भी तय करना है कि जिन सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचा है, उन्हें दोबारा उसी जगह बनाया जाए या अमेरिका मध्य पूर्व में अपनी पूरी सैन्य रणनीति में बदलाव करे. फिलहाल खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी घटाने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. किसी भी बड़े बदलाव के लिए अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों की मंजूरी जरूरी होगी.
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