जोहार. आज है 2 अगस्त.
अगर किसी देश पर दुनिया के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाएं, तो क्या उसकी युद्ध क्षमता खत्म हो जाती है?
सामान्य जवाब होगा- हां.
लेकिन Russia ने Ukraine War के दौरान यह धारणा काफी हद तक गलत साबित कर दी है.
पश्चिमी देशों ने रूस पर बैंकिंग, ऊर्जा, तकनीक, माइक्रोचिप, मशीन टूल्स और रक्षा उद्योग से जुडे हजारों प्रतिबंध लगाए. मकसद साफ था- रूस की सैन्य उत्पादन क्षमता को कमजोर करना, ताकि वह लंबे समय तक युद्ध न चला सके.
लेकिन तीन साल से अधिक समय बीतने के बाद भी रूस मिसाइलें बना रहा है, टैंक तैयार कर रहा है, ड्रोन उत्पादन बढा रहा है और रक्षा कारखाने चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं.
सवाल है, आखिर कैसे?
इसका जवाब केवल रूस की घरेलू क्षमता में नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार, तीसरे देशों के नेटवर्क और प्रतिबंधों की सीमाओं में छिपा है.
प्रतिबंधों का उद्देश्य क्या था?
आधुनिक हथियार केवल स्टील और बारूद से नहीं बनते.
उन्हें बनाने के लिए चाहिए अत्यधिक सटीक मशीनें, सीएनसी मशीन टूल्स, माइक्रोइलेक्ट्रानिक्स, सेंसर, विशेष धातुएं और सॉफ्टवेयर.
इनमें से अधिकांश तकनीक पश्चिमी देशों, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसी अर्थव्यवस्थाओं में विकसित होती है.
इसी कारण अमेरिका और यूरोप ने कोशिश की कि रूस को इन तकनीकों से पूरी तरह काट दिया जाए.
लेकिन व्यवहार में यह उतना आसान नहीं निकला.
रूस ने खोज लिया दूसरा रास्ता
प्रत्यक्ष खरीद बंद हुई तो रूस ने अप्रत्यक्ष रास्ते अपनाए.
इनमें सबसे महत्वपूर्ण तरीका बना लीजिंग मॉडल.
सामान्य भाषा में समझें तो लीजिंग का मतलब है किसी महंगी मशीन या उपकरण को खरीदने के बजाय लंबे समय के लिए किराये पर लेना, और बाद में उसे खरीदने का विकल्प रखना.
कागजों पर मशीन किसी दूसरे देश की कंपनी के नाम रहती है, लेकिन उसका उपयोग रूस में होता है.
यही व्यवस्था कई मामलों में प्रतिबंधों से बच निकलने का माध्यम बन गई.
तीसरे देशों का नेटवर्क कैसे काम करता है?
मान लीजिए किसी यूरोपीय कंपनी ने एक अत्याधुनिक मशीन बनाई.
सीधे रूस को बेचने पर प्रतिबंध है.
ऐसे में मशीन पहले किसी तीसरे देश की कंपनी खरीदती है.
कागजों में उसका उपयोग किसी सामान्य औद्योगिक काम के लिए दिखाया जाता है.
इसके बाद वही मशीन लीज या अन्य कारोबारी व्यवस्था के जरिये रूस पहुंच जाती है.
एक बार मशीन रूस पहुंच गई तो उसे वापस लाना लगभग असंभव हो जाता है.
कई मामलों में मशीनों के जीपीएस ट्रैकर बंद कर दिए जाते हैं या उन्हें अलग अलग हिस्सों में ले जाकर रूस के भीतर जोडा जाता है.
इससे मूल निर्माता को भी पता नहीं चलता कि उसका उत्पाद आखिर कहां इस्तेमाल हो रहा है.
कौन से देश बने ट्रांजिट मार्ग?
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार रूस ने कई देशों के जरिये ऐसी आपूर्ति श्रृंखला विकसित की.
इनमें मध्य एशिया के कुछ देश, UAE, Türkiye (Turkey), China और अन्य व्यापारिक केंद्र शामिल हैं.
इन देशों का अर्थ यह नहीं कि उनकी सरकारें औपचारिक रूप से प्रतिबंध तोड रही हैं, बल्कि इनके भीतर मौजूद कुछ कारोबारी नेटवर्क, ट्रेडिंग कंपनियां और बिचौलिए प्रतिबंधों की खामियों का फायदा उठाते हैं.
यही वजह है कि पश्चिम लगातार इन नेटवर्कों पर भी नए प्रतिबंध लगाता रहा है.
सबसे ज्यादा जरूरत किस चीज की?
रूस के सामने सबसे बडी चुनौती आधुनिक मशीन टूल्स की है.
मिसाइल, विमान इंजन, टैंक के पुर्जे या अत्यधिक सटीक हथियार बनाने के लिए माइक्रोन स्तर तक सटीक कटाई और ढलाई करने वाली मशीनें चाहिए.
रूस का घरेलू मशीन टूल उद्योग अभी भी इस स्तर की तकनीक पूरी तरह उपलब्ध नहीं करा पाता.
यही कारण है कि विदेशी मशीनें उसके रक्षा उद्योग की रीढ बनी हुई हैं.
नागरिक मशीन, सैन्य उपयोग
आज की सबसे बडी चुनौती यह है कि कई मशीनें दोहरे उपयोग यानी ड्यूल यूज श्रेणी में आती हैं.
वे सामान्य उद्योगों में भी काम आती हैं और हथियार निर्माण में भी.
उदाहरण के लिए-
एक सीएनसी मशीन कार उद्योग में भी इस्तेमाल हो सकती है और मिसाइल के इंजन के पुर्जे बनाने में भी.
एक वाटर जेट कटिंग मशीन विमान उद्योग में भी उपयोगी है और रक्षा उद्योग में भी.
यही कारण है कि इन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना आसान नहीं होता.
आधुनिक युद्ध केवल हथियारों का नहीं
यूक्रेन युद्ध ने एक नई सच्चाई सामने रखी है.
युद्ध केवल सेना नहीं लडती. उसे पूरी औद्योगिक व्यवस्था लडती है.
कारखाने, मशीनें, चिप, सॉफ्टवेयर, लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग और वैश्विक व्यापार, सब युद्ध का हिस्सा बन जाते हैं.
अगर किसी देश के पास हथियार बनाने वाली मशीनें बनी रहती हैं, तो वह लंबे समय तक युद्ध जारी रख सकता है.
रूस ने इसी औद्योगिक आधार को बचाए रखने की कोशिश की है.
क्या प्रतिबंध विफल हो गए?
ऐसा कहना भी सही नहीं होगा. प्रतिबंधों ने रूस की अर्थव्यवस्था पर असर डाला है.
उसे अधिक कीमत चुकानी पड रही है.
नई तकनीक तक पहुंच कठिन हुई है.
वित्तीय लेनदेन जटिल हुए हैं.
लेकिन यह भी सच है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह एक दूसरे से जुडी हुई है.
जब तक दुनिया के सभी देश एक समान प्रतिबंध लागू नहीं करते, तब तक व्यापार के वैकल्पिक रास्ते निकल आते हैं.
यही रूस के मामले में भी देखने को मिला.
चीन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और चीन के आर्थिक संबंध और मजबूत हुए हैं.
हालांकि चीन यह कहता है कि वह सीधे हथियार नहीं दे रहा, लेकिन मशीनरी, औद्योगिक उपकरण, इलेक्ट्रानिक सामान और अन्य औद्योगिक उत्पादों का व्यापार लगातार बढा है.
विश्लेषकों का मानना है कि इसने रूस के औद्योगिक उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
प्रतिबंधों की नई चुनौती
आज पश्चिम के सामने सबसे बडी चुनौती केवल रूस नहीं है.
असल चुनौती उन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply-chain) की है जो दर्जनों देशों से होकर गुजरती हैं.
अगर किसी मशीन के पुर्जे पांच देशों में बने हों, भुगतान किसी छठे देश से हुआ हो और अंतिम उपयोग सातवें देश में हो, तो पूरी निगरानी बेहद कठिन हो जाती है.
यही कारण है कि अब प्रतिबंध केवल देशों पर नहीं, बल्कि कंपनियों, बिचौलियों, बैंकिंग चैनलों और शिपिंग नेटवर्क तक फैलाए जा रहे हैं.
भारत के लिए क्या सबक?
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण सीख देता है.
किसी भी देश की रक्षा शक्ति केवल सैनिकों की संख्या से तय नहीं होती.
उसकी असली ताकत उसके औद्योगिक आधार, मशीन टूल उद्योग, सेमीकंडक्टर क्षमता, अनुसंधान, आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी आत्मनिर्भरता में होती है.
यही वजह है कि भारत आज मेक इन इंडिया, रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर मिशन और उच्च स्तरीय विनिर्माण पर जोर दे रहा है.
आधुनिक युद्ध में जो देश तकनीक और उत्पादन पर नियंत्रण रखता है, वही लंबे समय तक रणनीतिक बढ़त बनाए रख सकता है.
निष्कर्ष
रूस का अनुभव यह दिखाता है कि...
प्रतिबंध किसी देश की सैन्य क्षमता को कमजोर जरूर कर सकते हैं, लेकिन यदि उसके पास वैकल्पिक व्यापारिक नेटवर्क, मित्र देश, तीसरे देशों के कारोबारी रास्ते और मजबूत औद्योगिक ढांचा हो, तो उसे पूरी तरह रोकना बेहद कठिन होता है.
यूक्रेन युद्ध ने यह भी साबित किया है कि इक्कीसवीं सदी में युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं लडा जाता. उसकी असली लडाई कारखानों, मशीन टूल्स, चिप फैक्ट्रियों, बंदरगाहों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भी लडी जाती है.
इसलिए आज किसी भी देश की रक्षा शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण आधार केवल उसकी सेना नहीं, बल्कि उसकी औद्योगिक क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और आर्थिक लचीलापन है. यही आधुनिक युद्ध की नई परिभाषा भी है.
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