फ्रांस बढ़ाएगा परमाणु हथियार, मैक्रों ने नई न्यूक्लियर नीति का किया ऐलान, US से मिले झटके बाद लिया फैसला

France Nuclear Policy: यूरीपीय सुरक्षा अब तक नाटो के साझा व्यवस्था के तहत चल रही थी, लेकिन बीते कुछ महीनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह यूरोप पर दबाव डाला वह अभूतपूर्व था. इसलिए अब फ्रांस ने अपनी न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन में बदलाव की घोषणा की है.

France Nuclear Policy: फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने परमाणु हथियारों के संभावित उपयोग से जुड़ी फ्रांस की नीति (डॉक्ट्रिन) में बदलाव की घोषणा की है. उन्होंने इसे देश की प्रतिरोधक (डिटरेंस) रणनीति के नए चरण की शुरुआत बताया. फ्रांस के बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों वाले सैन्य अड्डे से इस मुद्दे पर संबोधित किया. मैक्रों ने कहा कि पेरिस अपनी परमाणु नीति को नाटो के व्यापक मिशन के अनुरूप समायोजित करेगा, लेकिन अपने परमाणु शस्त्रागार पर पूर्ण राष्ट्रीय संप्रभुता बनाए रखेगा. उन्होंने यूरोपीय सहयोगियों को परमाणु प्रतिरोध अभ्यासों में भाग लेने का निमंत्रण भी दिया, ताकि महाद्वीपीय सुरक्षा समन्वय को मजबूत किया जा सके. 

फ्रांस 24 की रिपोर्ट के अनुसार, मैक्रों ने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि यूरोपीय देश अपनी किस्मत पर फिर से खुद नियंत्रण हासिल करें.’ मैक्रों ने जोर देकर कहा कि फ्रांस की परमाणु क्षमता शांति बनाए रखने के लिए समर्पित रहेगी, लेकिन उन्होंने देश के शस्त्रागार की ताकत को भी रेखांकित किया. उन्होंने चेतावनी दी कि फ्रांस की परमाणु शक्ति इतनी प्रभावशाली है कि ‘कोई भी देश, कोई भी ताकत, चाहे वह कितनी भी मजबूत क्यों न हो, उससे उबर नहीं सकेगी.’

फ्रांस: 10 मार्च को शिखर सम्मेलन

रिपोर्ट के अनुसार, दशकों बाद फ्रांस पहली बार अपने परमाणु वारहेड्स (परमाणु हथियारों की संख्या) बढ़ाने की तैयारी में है. यह फैसला रूस-यूक्रेन युद्ध और ट्रांस-अटलांटिक रक्षा गारंटी के भविष्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच लिया गया है. राष्ट्रपति ने यह भी घोषणा की कि फ्रांस 10 मार्च को पेरिस में एक शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जिसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा के विकास और उपयोग को बढ़ावा देना है. उन्होंने कहा कि फ्रांस नागरिक परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए अच्छी स्थिति में है.

फ्रांस की न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन

फ्रांस की परमाणु प्रतिरोध नीति एक रक्षात्मक रणनीति पर आधारित है, जिसका उद्देश्य देश के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है. फ्रांसीसी संविधान के तहत राष्ट्रपति सेना के सर्वोच्च कमांडर होते हैं और परमाणु हथियारों के संभावित उपयोग का अंतिम निर्णय उन्हीं के पास होता है.

फ्रांस की परमाणु त्रयी (न्यूक्लियर ट्रायड) में चार परमाणु-सशस्त्र पनडुब्बियां शामिल हैं. ले त्रिओंफां, ले तेमेरेर, ले विजिलां और ले तेरिब्ल, जो अटलांटिक तट पर स्थित इल लॉन्ग बेस पर तैनात हैं. 1972 से अब तक कम से कम एक पनडुब्बी लगातार गश्त पर रहती है, जिससे निरंतर हमले की क्षमता सुनिश्चित होती है. विमानवाहक पोत Charles de Gaulle भी परमाणु-सशस्त्र राफेल लड़ाकू विमानों को तैनात करने में सक्षम है.

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स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट और फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के अनुमानों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रांस के पास लगभग 290 परमाणु वारहेड हैं. इस तरह वह रूस, अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की चौथी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति है.

यूरोप पर अमेरिकी दबाव और रूस-यूक्रेन युद्ध ने बदला परिदृश्य

मैक्रों का यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद यूरोप की सुरक्षा संरचना में बदलाव आ रहे हैं. साथ ही यूक्रेन, ग्रीनलैंड और नाटो को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ तनाव भी बना हुआ है. यूरोपीय नेताओं के बीच अमेरिका की पारंपरिक ‘न्यूक्लियर अम्ब्रेला’ (परमाणु सुरक्षा छतरी) को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है. ऐतिहासिक रूप से अमेरिका ने नाटो सहयोगियों को परमाणु सुरक्षा का आश्वासन दिया है, जिससे उन्हें स्वतंत्र परमाणु क्षमता विकसित करने की आवश्यकता नहीं पड़ी. यूरोपीय संघ के भीतर फ्रांस ही एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है.

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पिछले महीने म्यूनिख में मैक्रों ने कहा था, ‘हमें परमाणु प्रतिरोध की अवधारणा को फिर से परिभाषित करना होगा.’ उन्होंने बताया कि जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और अन्य यूरोपीय नेताओं के साथ इस विषय पर रणनीतिक संवाद हो चुका है. उन्होंने कहा, ‘यूरोप को एक भू-राजनीतिक शक्ति बनना सीखना होगा.’

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