बर्लिन में अंधेरा क्यों छाया? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की राजधानी में सबसे लंबा ब्लैकआउट, जानें क्या है पूरा मामला

Berlin Blackout: जर्मनी की राजधानी बर्लिन में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे लंबे ब्लैकआउट ने देश को हिला दिया. हजारों घर अंधेरे और ठंड में डूब गए. जांच में सामने आया कि यह कोई हादसा नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई तोड़फोड़ थी. वामपंथी उग्रवादी समूह वुल्कानग्रुप्पे ने हमले की जिम्मेदारी ली है. संघीय अभियोजक मामले को आतंकी साजिश मानकर जांच कर रहे हैं.

By Govind Jee | January 8, 2026 7:55 PM

Berlin Blackout: जर्मनी की राजधानी बर्लिन में ऐसा बिजली संकट आया, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया. ठंड के मौसम में अचानक हजारों घर अंधेरे में डूब गए. बिजली गई तो हीटिंग बंद, मोबाइल नेटवर्क ठप और ट्रेनें रुक गईं. हालात इतने गंभीर हो गए कि इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे लंबा ब्लैकआउट बताया जा रहा है. अब इस पूरे मामले की जांच आतंकी हमले के तौर पर हो रही है.

Berlin Blackout in Hindi: क्यों जुड़ा आतंकवाद का एंगल?

जर्मनी के संघीय अभियोजक कार्यालय ने 6 जनवरी 2026 को इस मामले की जांच अपने हाथ में ले ली. अधिकारियों का कहना है कि यह कोई सामान्य तकनीकी खराबी नहीं थी, बल्कि जानबूझकर किया गया हमला था. जांच में आगजनी, तोड़फोड़, सार्वजनिक सेवाओं को ठप करने और आतंकी संगठन से जुड़े होने जैसे गंभीर आरोप देखे जा रहे हैं. यह अब तक की बर्लिन की सबसे गंभीर तोड़फोड़ मानी जा रही है.

हमला कैसे हुआ, क्या तबाह हुआ?

यह पूरा मामला शनिवार, 3 जनवरी 2026 की तड़के शुरू हुआ. दक्षिण-पश्चिम बर्लिन में टेल्टो कैनाल के ऊपर बने एक पुल पर लगी हाई-वोल्टेज बिजली की केबलों में आग लगा दी गई. ये केबल लिख्टरफेल्डे इलाके के गैस पावर प्लांट को बिजली पहुंचाती थीं, जो शहर की ऊर्जा व्यवस्था का अहम हिस्सा है. जर्मन अधिकारियों के मुताबिक, हमलावरों ने खास तरह के आग लगाने वाले उपकरणों का इस्तेमाल किया. केबलों को इतनी बुरी तरह जलाया गया कि बिजली सप्लाई पूरी तरह कट गई. सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि यह हमला पूरी योजना के साथ किया गया था.

Berlin Blackout in Hindi: कितने लोग हुए प्रभावित?

इस एक हमले से हालात बिगड़ गए. करीब 45 हजार घरों और 2,200 से ज्यादा दुकानों व कंपनियों की बिजली चली गई. इससे लगभग 1 लाख लोग प्रभावित हुए. सड़कों पर अंधेरा छा गया, घरों में ठंड बढ़ गई, मोबाइल और इंटरनेट काम नहीं कर रहे थे. लोकल ट्रेन सेवाएं भी प्रभावित हुईं. ठंड पहले से ही कड़ी थी, ऐसे में हालात और मुश्किल हो गए. 5 जनवरी तक दो-तिहाई घरों में बिजली वापस नहीं आई थी. जर्मनी के राज्य के अर्थव्यवस्था मंत्री ने मीडिया से कहा कि यह सब जानबूझकर की गई तोड़फोड़ का नतीजा है.

किसने ली जिम्मेदारी?

फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले की जिम्मेदारी एक वामपंथी उग्रवादी समूह ‘वुल्कानग्रुप्पे’ (Volcano Group) ने ऑनलाइन ली. समूह ने अपने बयान का नाम रखा शासकों की बिजली काटो. बयान में कहा गया कि उन्होंने लिख्टरफेल्डे के गैस पावर प्लांट को निशाना बनाया. उनका कहना था कि यह हमला फॉसिल फ्यूल यानी कोयला और गैस आधारित ऊर्जा के खिलाफ था. उन्होंने लिखा कि धरती को ऊर्जा की लालच में नुकसान पहुंचाया जा रहा है. हालांकि समूह ने माना कि आम लोगों को परेशानी हुई, इसके लिए उन्होंने गरीब लोगों से माफी भी मांगी, लेकिन कहा कि अमीर इलाकों के लोगों के लिए उन्हें ज्यादा दुख नहीं है. जर्मन पुलिस ने एएफपी न्यूज एजेंसी को बताया कि यह बयान भरोसेमंद लगता है. बर्लिन सीनेट ने भी इस दावे को गंभीर माना है. अधिकारियों ने साफ किया कि इसमें किसी विदेशी देश की भूमिका नहीं दिख रही.

अस्पताल और कमजोर लोगों पर क्या असर पड़ा?

बिजली जाने से सबसे बड़ा खतरा अस्पतालों और बुजुर्गों को हुआ. कई मरीज ऐसे थे जो मशीनों पर निर्भर थे. हालात संभालने के लिए अस्पतालों में इमरजेंसी जनरेटर लगाए गए. कुछ अस्पतालों में रविवार तक बिजली लौटी, लेकिन कई जगह बैकअप सिस्टम से ही काम चला. जिन लोगों को घर पर देखभाल की जरूरत थी, उन्हें सुरक्षित जगहों पर भेजा गया. कुछ लोगों को ब्लैकआउट वाले इलाकों से बाहर शिफ्ट किया गया. बर्लिन के मेयर काई वेगनर ने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों ने जानबूझकर मरीजों, बुजुर्गों, बच्चों और परिवारों की जान खतरे में डाली.

बर्लिन ने कैसे संभाला हालात?

बर्लिन प्रशासन ने बड़े पैमाने पर राहत काम शुरू किया. जर्मन सेना ने मदद की. लोगों को होटल, स्कूल और स्पोर्ट्स हॉल में ठहराया गया. बसों को गर्म जगह के तौर पर इस्तेमाल किया गया. कई स्विमिंग पूल 24 घंटे खुले रखे गए ताकि लोग नहा सकें और गर्म रह सकें. सरकार ने कहा कि जिन लोगों को घर छोड़ना पड़ा, उनके होटल का खर्च सरकार उठाएगी. तय किया गया कि प्रति रात 70 यूरो तक का खर्च दिया जाएगा. इसके बावजूद हालात सामान्य नहीं हो पाए. करीब 20 स्कूल बंद रहे और कई कारोबार पूरी तरह ठप पड़े.

इसे आतंकी मामला क्यों माना जा रहा है?

हमले का असर बहुत बड़ा था और इसके पीछे साफ वैचारिक सोच दिख रही है. इसी वजह से संघीय अभियोजक ने जांच अपने हाथ में ली. जर्मनी की खुफिया एजेंसियां पहले से ही Volcano Group जैसे संगठनों पर नजर रखे हुए हैं. खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से बर्लिन और आसपास के इलाकों में ये समूह समय-समय पर अहम ढांचे पर हमला करते रहे हैं ताकि आम जिंदगी को ठप किया जा सके. पहले भी कर चुका है हमला. 2021 में टेस्ला फैक्ट्री में आगजनी, 2024 में टेस्ला को बिजली देने वाला टावर उड़ाया और 2020 में बर्लिन के फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट पर हमला किया. हर बार जिम्मेदारी इसी तरह के समूहों ने ली.

बिजली कब लौटी?

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, बिजली लाइन को ठीक करना आसान नहीं था. मंगलवार तक 24,700 घर और 1,120 कारोबार बिना बिजली थे. खासकर जीलेंडोर्फ इलाका ज्यादा प्रभावित रहा.डीपीए न्यूज एजेंसी के मुताबिक, बुधवार सुबह 11 बजे से धीरे-धीरे बिजली बहाल हुई. पूरी सप्लाई 8 जनवरी 2026 तक लौटने की उम्मीद जताई गई. मेयर काई वेगनर ने कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे लंबा ब्लैकआउट था. आज उन लोगों के लिए राहत का दिन है जो कई दिनों से ठंड और अंधेरे में थे.

ये भी पढ़ें:

चांद पर जाने से पहले जमीन के नीचे उतरे चीनी अंतरिक्ष यात्री, गुफाओं में हो रही खतरनाक ट्रेनिंग

यूरोप में चीन बनाने जा रहा है सबसे बड़ा दूतावास, ब्रिटेन में चलाएगा खुफिया तंत्र!

Venezuela Oil And Minerals: तेल तो था बहाना, मादुरो के पास था ये मालदार खजाना, घर से उठा ले गए थे ट्रंप