ट्रंप टैरिफ जारी रहा, तो भारत के निर्यात पर पड़ेगा भारी असर; विशेषज्ञों ने बताया स्थिति से निपटने का तरीका

Trump Tariffs : भारत के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 19 प्रतिशत है. ट्रंप टैरिफ की वजह से इस निर्यात पर पड़ी मार पड़ी है, करोड़ों का व्यापार प्रभावित है और हजारों नौकरियां खतरे हैं. सरकार इस स्थिति पर नजर रखे हुए है और अपने लोगों की मदद के लिए स्थिति की समीक्षा भी कर रही है. पीएम मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव के आगे अपने देशहित से समझौता नहीं करेंगे. टैरिफ का असर किन क्षेत्रों पर हो रहा है और उससे निपटने के लिए विकल्प क्या हैं.

Trump Tariffs : आज तीसरा दिन है जब भारत, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली सरकार के 50% टैरिफ को झेल रहा है. अमेरिका द्वारा किसी भी देश पर लगाए गए टैरिफ में यह सबसे ज्यादा है. अमेरिका ने भारत पर यह कहते हुए टैरिफ लगाया है कि वह रूस से जो तेल खरीद रहा है, वह एक तरह से यूक्रेन के खिलाफ युद्ध को फंडिंग है. अमेरिकी टैरिफ की वजह से भारत के निर्यात पर असर पड़ा है और पूरा विश्व इस बात की चर्चा कर रहा है कि आखिर इस टैरिफ का परिणाम क्या होगा और भारत कैसे इस टैरिफ से अपनी अर्थव्यवस्था को बचा पाएगा.

अमेरिकी टैरिफ का भारत पर असर

वस्तु (Items)भारत के निर्यात में अमेरिका का हिस्सा (%)अमेरिका के आयात में भारत का हिस्सा (%)टैरिफ मुक्त (Tariff Exempt)निर्यात पर प्रभाव (Impact on Exports)अनुमानित मूल्य ($ बिलियन)
पूंजीगत वस्तुएं (Capital Goods)18%2%नहीं (No)उच्च (High)12
वस्त्र (Textiles)28%9%नहीं (No)मध्यम (Moderate)5
रत्न और आभूषण (Gems & Jewellery)31%13%नहीं (No)मध्यम (Moderate)5
फार्मास्यूटिकल्स (Pharmaceuticals)36%6%हां (Yes)कम (Low)0
स्मार्टफोन (Smartphones)33%6%हां (Yes)कम (Low)0
रसायन (Chemicals)14%3%नहीं (No)उच्च (High)7
खाद्य और पेय (Food & Beverages)11%2%नहीं (No)उच्च (High)6
तेल और गैस (Oil & Gas)6%1%हां (Yes)कम (Low)0
ऑटो (Auto)12%1%नहीं (No)उच्च (High)3

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय माल जब अमेरिका में महंगा बिकेगा, तो उसकी मांग घटेगी और मांग घटेगी, तो भारत में उन उत्पादों की कंपनियों पर संकट आएगी. यहां गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ लगाने के बाद वे ज्यादा प्रभावित होंगे जो कम मार्जिन पर निर्यात करते हैं. जैसे वस्त्र-परिधान उद्योग, रत्न, आभूषण, झींगा, कालीन और फर्नीचर उद्योग. ये सभी उत्पाद ऐसे हैं, जिनके उत्पादन में श्रम लगता है, यानी ये श्रम-प्रधान वस्तुएं हैं. 50% टैरिफ के बाद ये श्रम प्रधान वस्तुएं अमेरिका में महंगी हो जाएंगी, जिसकी वजह से ये सभी वस्तुएं अव्यवहारिक हो जाएंगी और भारत से इनका निर्यात बंद या काफी कम हो सकता है.

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किन राज्यों और क्षेत्रों में सबसे ज्यादा पड़ रही है टैरिफ की मार

ट्रंप के टैरिफ की मार से देश के राज्यों पर असर पड़ा है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने एक्स पर पोस्ट लिखा है कि अमेरिका द्वारा टैरिफ में 50% की वृद्धि से तमिलनाडु के निर्यात पर, खासकर तिरुप्पूर के कपड़ा केंद्र पर, भारी असर पड़ा है. इससे लगभग 3,000 करोड़ रुपये का व्यापार प्रभावित हुआ है और हजारों नौकरियां खतरे में पड़ गई हैं. उन्होंने केंद्र सरकार से तत्काल राहत और संरचनात्मक सुधारों की मांग की है. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार विश्व एमएसएमई फोरम के अध्यक्ष बदीश जिंदल ने 50% टैरिफ को भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम बताया है और चेतावनी दी है कि इसके प्रभाव से देश को निर्यात ऑर्डर रद्द होने से 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हो सकता है. जिंदल ने कहा कि अगर इस फैसले को वापस नहीं लिया गया या कूटनीतिक तरीके से इसका समाधान नहीं किया गया, तो यह भारत के प्रमुख क्षेत्रों को असमान रूप से प्रभावित करेगा और चीन और बांग्लादेश जैसे प्रतिद्वंद्वी निर्यातकों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देगा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसका असर पंजाब पर भी गंभीर होगा, जो सालाना 30,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का सामान अमेरिका को निर्यात करता है. गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से हीरे और अन्य आभूषण अमेरिका भेजे जाते थे, अगर वो सभी आॅर्डर कैंसिल हुए तो भारत को बड़ा नुकसान होगा.

भारत के लिए अवसर तलाशने का वक्त

बेशक अमेरिकी टैरिफ का असर भारत के निर्यात पर होगा, लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि यह भारत के लिए सरेंडर करने का वक्त नहीं है, यह वक्त है कि भारत अपने निर्यात में विविधता लाए और साहसिक सुधारों की ओर कदम उठाए. इन सुधारों को अंजाम देने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन वे दीर्घकालिक होंगे. यानी अभी कुछ नुकसान होता हुआ दिखेगा, लेकिन वे स्थायी तौर पर भारत को लाभ देंगे और अमेरिका पर उसकी निर्भरता घटेगी. नीति आयोग के CEO रहे अमिताभ कांत ने एक्स पर पोस्ट लिखा है और कहा- ट्रंप के टैरिफ भारत के लिए एक चेतावनी हैं. विडंबना यह है कि अमेरिका रूस और चीन के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रहा है, जबकि चीन रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, फिर भी वह टैरिफ के जरिए भारत को निशाना बनाना चाहता है. स्पष्ट कर दें कि यह रूसी तेल का मामला नहीं है. यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता का मामला है, जिससे हमें कभी समझौता नहीं करना चाहिए. भारत ने कई मौकों पर वैश्विक दबाव के आगे झुकने से इनकार किया है. इस समय भी हमें कुछ अलग नहीं करना चाहिए. हमें डरने की बजाय, इन वैश्विक चुनौतियों से भारत को पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले साहसिक सुधारों के लिए प्रेरित होना चाहिए, साथ ही दीर्घकालिक विकास और लचीलेपन को सुरक्षित करने के लिए हमारे निर्यात बाजारों में विविधता लानी चाहिए. भारतीय हीरा संस्थान के अध्यक्ष दिनेश नवादिया ने एएनआई के साथ बातचीत में कहा है कि रत्न और आभूषण क्षेत्र में 13.3 बिलियन डॉलर का आयात होता है, जिसमें अमेरिका को 4.8 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष निर्यात होता है. भारत का हीरा उद्योग केवल श्रम-प्रधान है; इसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है. यूके, यूएई और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के एफटीए हमें नए बाजार खोजने में मदद करेंगे. चीन और रूस ने कहा है कि वे भारत के लिए अपने बाजार खोलेंगे, जो हमारे लिए सकारात्मक साबित हो सकता है.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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