Atal Bihari Vajpayee Poems: लिखता हूं, मिटाता हूं गीत नया गाता हूं.अटल जी की जयंती पर पढ़े उनकी खूबसूरत कविताएं

Atal Bihari Bajpayee: अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को है. 1924 को ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे राजनेता थे जिन्होंने तीन बार देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली. अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर पढ़े उनकी 10 खूबसूरत कविताएं जिसमें जीवन का सार गर्भित है.

Atal Bihari Vajpayee Birthday: आज 25 दिसंबर देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती है. ग्वालियर में 1924 को जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे राजनेता थे जिन्होंने तीन बार देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली. अटल बिहारी वाजपेयी भले ही सियासत से जुड़े हो लेकिन उनके अंदर वास्तविक रुप से एक कवि बसता था. उनकी एक से बढ़कर एक रचनाएं कविताएं पढ़ने और सुनने वाले के दिल -दिमाग में उतर जाती हैं. हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता हूं, मिटाता हूं, गीत नया गाता हूं..अटल जी की कविताओं के समुद्र की कुछ सीपें हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व ऐसा था कि ना सिर्फ समान विचारधारा वाले लोग बल्कि विरोधी भी उनके भाषण को सुनना पसंद करते थे, शब्दों से जादुई रचना करने वाले अटल जी ने कई अंतराष्ट्रीय मंचों पर भी दुनिया को संबोंधित किया. सदन हो या फिर सियासत का कोई मैदान अटल जी, हमेशा अटल की तरह डटे रहें . 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण उनकी ही सोच का परिचायक था -भारत दुनिया में किसी भी ताकत के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं है

25 दिसंबर, 1924 को ग्वालियर में जन्में अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे राजनेता थे जिन्होंने तीन बार देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली. वाजपेयी को वर्ष 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. वे एक राजनेता होने के साथ ही बहुत ही संवेदशील कवि भी थे. उनकी कविता संग्रहों में से 10 खूबसूरत कविताएं जो जीवन में आनेवाली कठिनाईयों का सामना करना भी सिखाती हैं आगे पढ़ें.

मौत से ठन गई


1. ठन गई!

मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,

लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

2.मैंने जन्म नहीं मांगा था!

मैंने जन्म नहीं मांगा था,

किन्तु मरण की मांग करुँगा।

जाने कितनी बार जिया हूँ,

जाने कितनी बार मरा हूँ।

जन्म मरण के फेरे से मैं,

इतना पहले नहीं डरा हूँ।

अन्तहीन अंधियार ज्योति की,

कब तक और तलाश करूँगा।

मैंने जन्म नहीं माँगा था,

किन्तु मरण की मांग करूँगा।

बचपन, यौवन और बुढ़ापा,

कुछ दशकों में ख़त्म कहानी।

फिर-फिर जीना, फिर-फिर मरना,

यह मजबूरी या मनमानी?

पूर्व जन्म के पूर्व बसी—

दुनिया का द्वारचार करूँगा।

मैंने जन्म नहीं मांगा था,

किन्तु मरण की मांग करूँगा।


3. मैं न चुप हूँ न गाता हूँ

सवेरा है मगर पूरब दिशा में

घिर रहे बादल

रूई से धुंधलके में

मील के पत्थर पड़े घायल

ठिठके पाँव

ओझल गाँव

जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से

मैं देख पाता हूं

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सदर साँसों ने

चिनारों को झुलस डाला,

मगर हिमपात को देती

चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़,

विहँसे चीड़,

आँसू हैं न मुस्कानें,

हिमानी झील के तट पर

अकेला गुनगुनाता हूँ।

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

4. क़दम मिला कर चलना होगा

क़दम मिला कर चलना होगा

बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,

निज हाथों में हँसते-हँसते,

आग लगाकर जलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

क़दम मिलाकर चलना होगा।


आओ फिर से दिया जलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ

भरी दुपहरी में अँधियारा

सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें-

बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल

लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल

वर्त्तमान के मोहजाल में-

आने वाला कल न भुलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा

अपनों के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज़्र बनाने-

नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

6. कौरव कौन, कौन पांडव

कौरव कौन

कौन पांडव,

टेढ़ा सवाल है|

दोनों ओर शकुनि

का फैला

कूटजाल है|

धर्मराज ने छोड़ी नहीं

जुए की लत है|

हर पंचायत में

पांचाली

अपमानित है|

बिना कृष्ण के

आज

महाभारत होना है,

कोई राजा बने,

रंक को तो रोना है

7 पुनः चमकेगा दिनकर

आज़ादी का दिन मना,

नई ग़ुलामी बीच;

सूखी धरती, सूना अंबर,

मन-आंगन में कीच;

मन-आंगम में कीच,

कमल सारे मुरझाए;

एक-एक कर बुझे दीप,

अंधियारे छाए;

कह क़ैदी कबिराय

न अपना छोटा जी कर;

चीर निशा का वक्ष

पुनः चमकेगा दिनकर।

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8 दूध में दरार पड़ गई

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?

भेद में अभेद खो गया।

बँट गये शहीद, गीत कट गए,

कलेजे में कटार दड़ गई।

दूध में दरार पड़ गई।

खेतों में बारूदी गंध,

टूट गये नानक के छंद

सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।

वसंत से बहार झड़ गई

दूध में दरार पड़ गई।

अपनी ही छाया से बैर,

गले लगने लगे हैं ग़ैर,

ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।

बात बनाएँ, बिगड़ गई।

दूध में दरार पड़ गई।

कर्तव्य के पुनीत पथ को

हमने स्वेद से सींचा है,

कभी-कभी अपने अश्रु और—

प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—

हम कभी रुके नहीं हैं।

किसी चुनौती के सम्मुख

कभी झुके नहीं हैं।

आज,

जब कि राष्ट्र-जीवन की

समस्त निधियाँ,

दाँव पर लगी हैं,

और,

एक घनीभूत अंधेरा—

हमारे जीवन के

सारे आलोक को

निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए

जीने, जूझने और

आवश्यकता पड़ने पर—

मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की

इस घड़ी में—

आइए, अर्जुन की तरह

उद्घोष करें :

‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

10 पहली अनुभूति:

गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,

दाग़ बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

लगी कुछ ऐसी नज़र

बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

पीठ मे छुरी सा चांद

राहू गया रेखा फांद

मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ

गीत नहीं गाता हूँ

दूसरी अनुभूति

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात

कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी

हार नहीं मानूँगा,

रार नई ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ

गीत नया गाता हूँ

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Author: Meenakshi Rai

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