दिल्ली में फर्जी पुलिस स्टेशन के साथ-साथ विभाष ने कोलकाता में खोला था इंटरपोल का भी कार्यालय

दिल्ली के नोएडा में फर्जी पुलिस स्टेशन खोलने के आरोप में दिल्ली पुलिस ने रविवार को विभाष अधिकारी नामक आरोपी के साथ उसके बेटे को भी गिरफ्तार किया था.

संवाददाता, कोलकाता

दिल्ली के नोएडा में फर्जी पुलिस स्टेशन खोलने के आरोप में दिल्ली पुलिस ने रविवार को विभाष अधिकारी नामक आरोपी के साथ उसके बेटे को भी गिरफ्तार किया था. उससे पूछताछ के बाद जो खुलासे हो रहे हैं, उससे पुलिस और प्रशासन दोनों हैरान हैं. बताया जा रहा है कि विभास ने न केवल एक फर्जी अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी और फर्जी पुलिस स्टेशन खोला था, बल्कि कोलकाता में बेलियाघाटा के सीआइटी रोड पर एक मकान में इंटरपोल के नाम पर भी एक नकली कार्यालय खोला था. यह सब कुछ बेलियाघाटा थाने से महज एक किलोमीटर की दूरी पर हो रहा था और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. बताया जा रहा है कि विभाष अधिकारी ने सीआइटी रोड स्थित एक घर में दो फ्लैट किराये पर लेकर अपना फर्जी ऑफिस वहां खोला था.

इन फ्लैटों के दरवाजों पर ””सामाजिक न्याय की जांच””, ””इंटरपोल”” और ””पुलिस”” जैसे नामों के बोर्ड लगे हुए देखे गये थे. इस बीच सोमवार को जब खबर पाकर बेलियाघाटा थाने की पुलिस मौके पर पहुंची तो कार्यालय को बंद पाया. बाहर लगे बोर्ड को हटाकर दूसरा बोर्ड लगा दिया गया था. किराये के फ्लैट का हर माह 40 हजार रुपये करता था भुगतान : पुलिस को जांच में पता चला कि जिस मकान में वह फर्जी ऑफिस चला रहा था, उसके मालिक अरुण घोष हैं. इसी अरुण घोष ने विभाष को अपना फ्लैट 40 हजार रुपये प्रतिमाह पर किराये पर दिया था. पहले यह ऑफिस मानिकतला इलाके में चलता था, इस खुलासे के बाद अरुण घोष ने संवाददाताओं से कहा कि, ‘उस आदमी ने मुझसे कहा था कि वह एक ऑफिस खोलेगा जो पुलिस से जुड़ा होगा. इस दफ्तर में पुलिस से जुड़े काम होंगे. मेरे साथ 11 महीने का उसने एग्रीमेंट किया था. इसके अलावा मुझे उसके बारे में कुछ पता नहीं है. अक्सर हथियार लेकर लोग आवाजाही करते थे दफ्तर में : पुलिस को प्राथमिक जांच में पता चला कि पिछले एक महीने से वे उसकी गतिविधि पर नजर रखे हुए थे. अक्सर कई लोग इस दफ्तर में हथियार लेकर आवाजाही करते थे, जिससे वे अबतक उन लोगों को पुलिस समझ रहे थे. लेकिन, जैसे ही विभास का मामला मीडिया में आया, उन्होंने उस व्यक्ति को पहचान लिया. रविवार तक उसके ऑफिस के बाहर बोर्ड लगे थे, लेकिन सोमवार को वे बोर्ड हटा दिये गये. इससे यह भी संदेह गहराता है कि विभास की गिरफ्तारी के बाद भी उसका नेटवर्क कोलकाता में सक्रिय है. इलाके के लोगों का कहना है कि, ‘पहले हमारे इस इलाके का माहौल अच्छा था, इन लोगों के इस इलाके में दफ्तर खोलने के बाद पूरा माहौल खराब हो गया. लाल और नीली बत्ती वाली गाड़ियां आती थीं. फिर उसके तीन-चार बाउंसर आते थे. वे हथियार रखते थे.’ एक अन्य व्यक्ति ने कहा, ऐसा लग रहा था जैसे पुलिसकर्मियों का कोई काफिला चल रहा है. सभी सुरक्षा कर्मियों ने नीले रंग के कपड़े पहन रखे होते थे. रविवार रात भी, उन्होंने सुरक्षा कर्मियों को खाना लेकर आते देखा था. फिर रात में, सभी अचानक गायब हो गये. इलाके के निवासियों ने बताया कि स्थानीय लोगों एवं पुलिस की आपत्ति के बाद विभाष ने किराये के मकान की दूसरी मंजिल पर लगा साइनबोर्ड उतार दिया था.

धोखाधड़ी के कई मामलों में जुड़ा है विभाष का नाम

जानकारी के मुताबिक करीब 15 साल पहले विभाष बीरभूम के नलहाटी-2 ब्लॉक का तृणमूल अध्यक्ष था. सिउड़ी में उसका आयुर्वेदिक कॉलेज, कृष्णापुर में बीएड कॉलेज और एक बड़ा मकान है, साथ ही कोलकाता और दिल्ली में भी उसकी संपत्तियां भी हैं. वह कई लोगों को नोटिस भेजता था, फिर गिरफ्तारी का भय दिखाकर मोटी रकम वसूल लेता था.पुलिस सूत्रों के अनुसार विभास अधिकारी अपनी संस्था “राष्ट्रीय सामाजिक अन्वेषण एवं सामाजिक न्याय ब्यूरो ” के नाम पर नोटिस भेजता था. उसका मुख्य ठिकाना कृष्णापुर में उसके आश्रम के अंदर था, जहां से वह फर्जी लेटर हेड और नोटिस के जरिये आम लोगों को बुलाता था. वह भूमि विवाद और अन्य मामलों की ‘जांच’ के नाम पर पैसे वसूलता था. स्थानीय लोगों में उसके नाम का खौफ था, क्योंकि वह गाड़ियों, सुरक्षाकर्मियों और सरकारी ठाट-बाट के साथ चलता था. नियुक्ति घोटाले में भी जुड़ चुका है उसका नाम : पुलिस सूत्र बताते हैं कि शिक्षक भर्ती घोटाले में भी पहली बार विभाष अधिकारी का नाम सामने आया था, जिसके बाद से वह केंद्रीय जांच एजेंसियों की नजर में था. अब एक बार फिर इंटरपोल के नाम पर धोखाधड़ी, फर्जी थाने की स्थापना और झूठे मामलों की जांच के नाम पर पैसे वसूलने के आरोप में वह चर्चा में है. उसकी गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियों ने उसके पूरे नेटवर्क की छानबीन शुरू कर दी है. पुलिस का कहना है कि कोलकाता में उसके कई साथी अब भी सक्रिय हैं. जल्द ही और गिरफ्तारियां हो सकती हैं.

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Published by: Akhilesh kumar singh

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