पेंशन कोई इनाम नहीं, यह कानूनी और संवैधानिक अधिकार : हाइकोर्ट

कलकत्ता हाइकोर्ट ने पेंशन से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ ताैर पर कहा कि पेंशन कोई उपहार या मुफ्त भुगतान नहीं है.

एक मेडिकल ऑफिसर की विधवा से जुड़े मामले में हाइकोर्ट का फैसला

संवाददाता, कोलकाता

कलकत्ता हाइकोर्ट ने पेंशन से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ ताैर पर कहा कि पेंशन कोई उपहार या मुफ्त भुगतान नहीं है. कोर्ट ने एक मेडिकल ऑफिसर की विधवा को पेंशन लाभ देने से इनकार करने वाले राज्य के आदेश को रद्द कर दिया. विधवा ने अपने दिवंगत पति की 22 वर्षों की नौकरी से संबंधित पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों की मांग की थी. मेडिकल ऑफिसर की पत्नी ने इसे लेकर हाइकोर्ट में मामला किया था, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश गौरांग कांत ने यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा कि राज्य और उसके संस्थानों ने याचिकाकर्ता को नियमित कर्मचारी के रूप में प्रस्तुत किया था और उसकी सेवाओं से लाभ प्राप्त किया था और इसलिए रिटायरमेंट के फेस में वे पीछे नहीं हट सकते. याचिकाकर्ता महिला के पति की नियुक्ति मार्च 1994 में दमदम नगर निगम विशेष अस्पताल में आवासीय चिकित्सा अधिकारी (आरएमओ) के पद पर हुई थी. उन्होंने जुलाई 2016 में अपनी मृत्यु तक निरंतर और बेदाग सेवा की. उनके निधन के बाद याचिकाकर्ता ने पेंशन लाभ के लिए आवेदन किया, जिसे स्थानीय निकाय निदेशक ने 2024 में इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि मेडिकल ऑफिसर की नियुक्ति स्वीकृत पद के विरुद्ध नहीं थी और राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति का अभाव था. इस पर न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि याचिकाकर्ता के दिवंगत पति ने नगरपालिका के अधीन दो दशकों से अधिक समय तक निर्बाध सेवा की है. अपने पूरे सेवाकाल में उन्हें नियमित कर्मचारी माना गया, सार्वजनिक निधि से वेतन दिया गया और लागू सरकारी मानदंडों के अनुसार सभी सेवा लाभ प्रदान किये गये. उनके सेवाकाल के दौरान किसी भी समय उनकी नियुक्ति की वैधता या औचित्य पर सवाल नहीं उठाया गया.

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