गनी खान चौधरी का अभेद्य किला मालदा आज टीएमसी का गढ़, तजमुल हुसैन के लिए आसान नहीं हरिश्चंद्रपुर सीट बचाना

Harishchandrapur Assembly: पश्चिम बंगाल की राजनीति में मालदा जिला हमेशा से एक पहेली रहा है, जहां कभी गनी खान चौधरी का एकछत्र राज था. उसी मालदा की धरती से निकलकर अपनी पहचान बनाने वाले तजमुल हुसैन आज तृणमूल कांग्रेस के उन चुनिंदा चेहरों में से हैं, जिन पर पार्टी ने उत्तर बंगाल में अपना दांव लगाया है. 2026 में, पार्टी के भीतर असंतुष्टों को साथ लेकर चलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

मुख्य बातें

Harishchandrapur Assembly: कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में मालदा जिला हमेशा से एक पहेली रहा है. कभी गनी खान चौधरी का अभेद्य किला रहा यह क्षेत्र अब तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. वैसे इस बार भाजपा के साथ वर्चस्व की लड़ाई बराबर की है. जिले के हरिश्चंद्रपुर विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक तजमुल हुसैन के लिए सीट बचाना इसबार मुश्किल लग रहा है. ममता सरकार में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम और वस्त्र विभाग के राज्य मंत्री तजमुल हुसैन के लिए 2026 का चुनाव केवल एक विधायक की सीट बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि मालदा में तृणमूल की जड़ें गहरी करने की परीक्षा है.

भाजपा का बढ़ता जनाधार

कांग्रेस पार्टी हरिश्चंद्रपुर निर्वाचन क्षेत्र में अपनी ताकत दिखाती रही है, लेकिन भाजपा यहां लगातार अपनी ताकत बढ़ा रही है. बीजेपी का यहां सबसे अच्छा प्रदर्शन 2019 में 25.80 प्रतिशत रहा, जो इस निर्वाचन क्षेत्र की मुस्लिम-बहुल सीट होने की प्रकृति को देखते हुए समझा जा सकता है. हालांकि यहां विजेता की भविष्यवाणी करना किसी चुनावी विश्लेषक के लिए एक चुनौती हो सकती है, लेकिन यह तय है कि 2026 के विधानसभा चुनावों में हरिश्चंद्रपुर निर्वाचन क्षेत्र में एक दिलचस्प बहुकोणीय मुकाबला होने वाला है.

आसान नहीं वोटरों का मूड जानना

हरिश्चंद्रपुर के मतदाताओं की वफादारी राजनीतिक पार्टियों के साथ नहीं है, क्योंकि वे व्यक्तिगत नेताओं को वोट देना पसंद करते हैं. हरिश्चंद्रपुर विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1951 में हुई थी और इसने अब तक राज्य में हुए सभी 17 विधानसभा चुनावों में मतदान किया है. कांग्रेस पार्टी ने यहां सबसे ज्यादा छह बार जीत हासिल की है, उसके बाद ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने पांच बार जीत हासिल की है. वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो-दो बार जीत हासिल की है, जबकि जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने एक-एक जीत दर्ज की है.

पांच बार जीता चुनाव

बीरेंद्र कुमार मोइत्रा ने यह सीट पांच बार जीती, जिसमें 1962 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर, 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर, और 1987 से 1996 के बीच लगातार तीन बार फॉरवर्ड ब्लॉक के बैनर तले जीत शामिल है. इसी तरह, मोहम्मद इलियास रजी ने 1957 और 1967 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और बाद में 1969 और 1971 में वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की.

वामपंथ के आंगन से ‘जोड़ा फूल’ तक का सफर

तजमुल हुसैन की राजनीति की शुरुआत अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक के साथ हुई थी. वे एक समय में वामपंथ के मजबूत स्तंभ माने जाते थे, लेकिन समय की नब्ज को पहचानते हुए उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा. ​​ताजमुल हुसैन ने 2006 और 2011 में फॉरवर्ड ब्लॉक के उम्मीदवार के तौर पर लगातार दो बार जीत हासिल की और फिर 2021 में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर जीत हासिल की. 2021 के विधानसभा चुनाव में जब मालदा में भाजपा और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय मुकाबला था, तब तजमुल हुसैन ने हरिश्चंद्रपुर सीट पर शानदार जीत दर्ज कर ममता बनर्जी का भरोसा जीता. उनकी इसी जीत ने उन्हें ‘नवान्न’ में मंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया.

मंत्री के रूप में किये बेहतर काम

मंत्री के रूप में तजमुल हुसैन ने मालदा और आसपास के क्षेत्रों में रेशम और हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सराहनीय कार्य किए हैं. ‘कर्मश्री’ जैसी योजनाओं के माध्यम से स्थानीय युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ना उनकी बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. विशेषकर हरिश्चंद्रपुर क्षेत्र में सड़क निर्माण और बाढ़ नियंत्रण के कार्यों में उनकी सक्रियता ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाए रखा है.

पिछला चुनाव का परिणाम

नामवोट
तजमुल हुसैन को मिला वोट1,22,527
मातीबुर रहमान45,054
विजेता पार्टी का वोट %60.3 %
जीत अंतर %38.1 %
स्रोत : चुनाव आयोग

अपने ही खड़े करेंगे बाधा

सियासत की राह कभी सीधी नहीं होती. 2026 के चुनाव में टीएमसी के लिए वे अल्पसंख्यक बहुल मालदा में ‘स्थिरता’ का चेहरा होंगे. तजमुल हुसैन के सामने 2026 में सबसे बड़ी चुनौती मालदा में कांग्रेस-वाम गठबंधन और आईएसएफ के बढ़ते प्रभाव को रोकना है. क्षेत्र में ‘एंटी-इन्कम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) भी उनके लिए एक परेशानी है. इसके अलावा, भाजपा का उत्तर बंगाल में आक्रामक रुख भी उनके चुनावी समीकरण बिगाड़ सकता है. 2026 के चुनावी समर में तजमुल हुसैन के लिए राह आसान नहीं है. मालदा की जनता अब केवल ‘अस्मिता’ पर नहीं, बल्कि ‘हिसाब’ पर वोट देती है. जनवरी 1958 को मालदा के बंगरुआ में जन्मे तजमुल हुसैन की जड़ें पूरी तरह किसानी से जुड़ी हैं.

तजमुल हुसैन किस विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं?

वे मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं.

वर्तमान में उनके पास पश्चिम बंगाल सरकार में कौन सा विभाग है?

वे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) और वस्त्र विभाग के राज्य मंत्री हैं.

तजमुल हुसैन ने राजनीति की शुरुआत किस पार्टी से की थी?

उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी फॉरवर्ड ब्लॉक के साथ शुरू की थी और बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए.

2026 के चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

मालदा में त्रिकोणीय मुकाबला (TMC, BJP और कांग्रेस-वाम गठबंधन) और अल्पसंख्यक वोटों का संभावित बिखराव उनके लिए बड़ी चुनौती होगी.

विकास के मोर्चे पर उनकी सबसे बड़ी पहचान क्या है?

उन्हें मालदा में लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने और स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे के विकास के लिए जाना जाता है.

तजमुल हुसैन वर्तमान में किस मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे हैं?

वे वर्तमान में पश्चिम बंगाल सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम एवं वस्त्र विभाग (MSME and Textiles) में राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत हैं.

तजमुल हुसैन का विधानसभा क्षेत्र कौन सा है?

वे मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर (Harischandrapur) निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं.

उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या है?

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने हरिश्चंद्रपुर हाई स्कूल से उच्च माध्यमिक (Higher Secondary) तक की शिक्षा प्राप्त की है.

क्या तजमुल हुसैन हमेशा तृणमूल कांग्रेस में थे?

नहीं, बाहरी राजनीतिक रिकॉर्ड्स के अनुसार वे पहले फॉरवर्ड ब्लॉक (Forward Bloc) में थे और बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए.

2026 के चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ी बाधा क्या है?

उत्तर बंगाल में बदलता राजनीतिक समीकरण, ग्रामीण क्षेत्रों की स्थानीय समस्याएं और नए विपक्षी गठबंधनों की चुनौती उनके लिए मुख्य बाधा है.

तजमुल हुसैन की खास बातें

  1. राजनीतिक गढ़ : मालदा जिले की हरिश्चंद्रपुर विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व.
  2. प्रमुख पद : पश्चिम बंगाल सरकार में MSME और वस्त्र विभाग के राज्य मंत्री.
  3. दलबदल की पृष्ठभूमि : फॉरवर्ड ब्लॉक के पूर्व नेता, जो अब तृणमूल का बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा हैं.
  4. विकास कार्यों पर जोर : क्षेत्र में सड़कों के जाल और रेशम उद्योग के पुनरुद्धार के लिए सक्रिय.
  5. चुनौती : मालदा में भाजपा की बढ़ती सक्रियता
  6. राजनीतिक अनुभव : 14वीं, 15वीं और 17वीं विधानसभा के सदस्य
  7. जमीनी जुड़ाव : पेशे से किसान और ग्रामीण समाज से गहरा लगाव रखने वाले नेता.

असंतुष्टों को मना लेंगे तो जीत होगी आसान

हरिश्चंद्रपुर हाई स्कूल से उच्च माध्यमिक तक की शिक्षा प्राप्त करने वाले तजमुल ने अपनी राजनीति की शुरुआत तब की थी, जब मालदा में कांग्रेस और वामपंथ का अभेद्य दुर्ग हुआ करता था. विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, वे 14वीं, 15वीं और अब 17वीं विधानसभा के सदस्य हैं. दलबदल और गुटबाजी का साया तजमुल हुसैन के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में मुश्किल पैदा कर सकता है. उनके दलबदल (फॉरवर्ड ब्लॉक से टीएमसी) को लेकर विपक्ष आज भी उन पर निशाना साधता है. इसके अलावा, मालदा जिले में तृणमूल कांग्रेस के भीतर की आंतरिक गुटबाजी अक्सर उनके लिए सिरदर्द बनती रही है. स्थानीय स्तर पर ठेकेदारी और विकास कार्यों में पक्षपात के आरोपों को लेकर भी विपक्ष उन्हें घेरने की कोशिश करता रहा है. 2026 में, पार्टी के भीतर असंतुष्टों को साथ लेकर चलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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By Ashish Jha

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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