कोयला तस्करी मामला. प्रवर्तन निदेशालय को सुप्रीम कोर्ट से मिली अनुमति
संवाददाता, कोलकातासुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कोयला तस्करी मामले में मुख्य आरोपी अनूप माजी उर्फ ‘लाला’ को हिरासत में लेकर पूछताछ करने की अनुमति प्रवर्तन निदेशालय (इडी) को दे दी. अनूप माजी लंबे समय से केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में हैं, लेकिन अब तक उन्हें हिरासत में नहीं लिया जा सका है. इडी ने कोर्ट में दलील दी थी कि अदालत से मिले संरक्षण के कारण वह लाला को हिरासत में लेकर पूछताछ नहीं कर पा रहे हैं. न्यायाधीश विक्रम नाथ, न्यायाधीश संदीप मेहता व न्यायाधीश एनवी अंजरिया की बेंच ने अब यह बाधा हटा दी है. शीर्ष अदालत ने कहा कि इडी अनूप माजी को हिरासत में लेकर पूछताछ कर सकती है. इससे जांच में तेजी आने की उम्मीद है. गौरतलब है कि इससे पहले लाला को कई बार समन भेजा गया, लेकिन वे पेश नहीं हुए. जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी. आरोप है कि कोयला खदानों से अवैध रूप से कोयला निकालकर तस्करी की जाती थी, जिसमें इसीएल, सीआइएसएफ और रेलवे के कुछ कर्मियों की मिलीभगत भी सामने आयी. मामले में सीबीआइ ने उनकी संपत्ति जब्त की थी. 2024 में आसनसोल की निचली अदालत ने लाला को आत्मसमर्पण का नोटिस जारी किया था और संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें अंतरिम राहत मिली, शर्त यह थी कि वे जांच में सहयोग करेंगे, निचली अदालत के निर्देशों का पालन करेंगे और क्षेत्र नहीं छोड़ेंगे.इडी सूत्रों के अनुसार, हाल में जब एजेंसी ने हिरासत में लेने की कोशिश की तो सुप्रीम कोर्ट से मिले संरक्षण के कारण बाधा आयी. इसीलिए शीर्ष अदालत की अनुमति जरूरी थी. अब अनुमति मिलने के बाद इडी पूछताछ की प्रक्रिया आगे बढ़ायेगी. अवैध कोयला खनन, तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (इडी) ने हाल ही में बड़ी कार्रवाई करते हुए करीब 100.44 करोड़ रुपये की संपत्ति अस्थायी रूप से कुर्क कर ली है. यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 के तहत की गयी है. केंद्रीय जांच एजेंसी ने इस बात की जानकारी शुक्रवार को दी. मामला इस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (इसीएल) के लीजहोल्ड क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध खनन और कोयला चोरी से जुड़ा है. जांच एजेंसी के अनुसार ये अवैध गतिविधियां मुख्य आरोपी अनूप माजी उर्फ लाला के नेतृत्व वाले एक सिंडिकेट द्वारा संचालित की जा रही थीं.सरकारी अफसरों से बचाने का जरिया बनी 10 व 20 रुपये की करेंसी
इडी ने बताया कि फर्जी परिवहन चालान के साथ ट्रांसपोर्टर को 10 या 20 रुपये का एक करेंसी नोट दिया जाता था. ट्रांसपोर्टर उस नोट को ट्रक, डंपर या टिपर के नंबर प्लेट के साथ पकड़ कर उसकी तस्वीर खींचता और उसे सिंडिकेट के ऑपरेटर को भेजता था. इसके बाद वह तस्वीर वाट्सएप के माध्यम से संबंधित पुलिस अधिकारियों और मार्ग में पड़ने वाले अन्य सरकारी अधिकारियों को भेजी जाती थी, ताकि वाहन को रोका न जाये या रोके जाने की स्थिति में तुरंत छोड़ दिया जाये.
