8 बार के विधायक के पास नहीं थी गाड़ी, पत्नी के गहने गिरवी रख बनाया मकान, तंगहाल परिवार को है लखन बागदी पर नाज

Lakhan Bagdi Honest Politician of Raniganj: पश्चिम बंगाल के आसनसोल-रानीगंज से 8 बार विधायक रहे माकपा नेता लखन बागदी की सादगी की अनसुनी कहानी. कैसे एक दिग्गज नेता ने परिवार के लिए कभी पैरवी नहीं की. आज भी उनका परिवार तंगहाली में जी रहा है.

Lakhan Bagdi Honest Politician of Raniganj| आसनसोल/रानीगंज, शिवशंकर ठाकुर/जितेंद्र त्रिवेदी : राजनीति आज के दौर में रसूख और संपत्ति का पर्याय मानी जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के कोयलांचल (आसनसोल-दुर्गापुर) की धरती पर एक ऐसे भी नेता हुए, जिन्होंने सादगी की मिसाल कायम की. हम बात कर रहे हैं माकपा (CPIM) के दिग्गज नेता लखन बागदी की. 1962 से 1996 के बीच 10 बार चुनाव लड़कर 8 बार विधायक बने.

जिंदगी भर पार्टी और जनता को समर्पित रहे बागदी

यह रिकॉर्ड बनाने वाले बागदी ने अपनी पूरी जिंदगी जनता और पार्टी को समर्पित कर दी. उनके इस दुनिया से जाने के 15 साल बाद भी रानीगंज के कुमारबाजार स्थित उनके घर की दरारें और पुराना डिब्बेवाला टीवी उनकी ईमानदारी की गवाही दे रही हैं. 17 जुलाई 2011 को 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. वे अपने पीछे कोई गाड़ी, बंगला या बैंक बैलेंस नहीं छोड़ गये, छोड़ गये तो बस एक बेदाग राजनीतिक विरासत.

सादगी की पराकाष्ठा : 4 बार विधायक रहने तक कच्चे मकान में रहे

लखन बागदी की ईमानदारी का आलम यह था कि 4 बार विधायक चुने जाने के बाद भी उनके पास एक पक्का मकान नहीं था. 1977 तक पुरखों के कच्चे मकान (बांग्ला में इसे खड़ेर घर कहते हैं) में बड़े भाई रामपद बागदी के साथ रहे. आज भी दोनों भाईयों के परिजन संयुक्त परिवार के रूप में एक साथ रहते हैं. 1978 में जब उन्होंने पक्का मकान बनाने की सोची, तो उनके पास पैसे नहीं थे. तब अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखकर कर्ज लिया और ‘शैल भवन’ नाम से मकान बनवाया.

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साइकिल और रिक्शा था सहारा

वे सुबह 7 बजे साइकिल लेकर निकलते और रात को लौटते थे. बाद के वर्षों में उन्होंने रिक्शा का सहारा लिया. ट्रेड यूनियन के बड़े नेता और इतने लंबे समय तक विधायक रहने वाले बागदी का ‘रुतबा’ ऐसा कि एक बार पुलिस ने जाम में उनके रिक्शा को रोक दिया. पुलिस वाले को पता ही नहीं था कि रिक्शा पर सवार साधारण-सा व्यक्ति 8 बार विधायक रह चुका है.

लखन बागदी से जुड़ी कुछ खास बातें

  • 1962 में पहली बार भाकपा के टिकट से चुनाव लड़े और जीते
  • 1967 से 1996 तक कुल 9 बार माकपा के टिकट पर उखड़ा (वर्तमान में पांडवेश्वर) सीट से चुनाव लड़े, 7 बार जीते.
  • 1967 और 1972 का चुनाव लखन बागदी हार गये थे
  • बर्न स्टैंडर्ड कंपनी लिमिटेड (बीएससीएल) में लखन बागदी श्रमिक के तौर पर काम करते थे. वर्ष 1962 में इस्तीफा दे दिया और चुनाव लड़कर विधायक बने.
  • पार्टी ऑफिस में एक जीप होती थी, हर नेता जरूरत के आधार पर उसका उपयोग करते थे, जिसमें लखन बागदी भी एक थे.
बागदी परिवार के सदस्य.

पुत्र का दर्द और गर्व

लखन बागदी के इकलौते बेटे विश्वनाथ बागदी (विशु दा) बताते हैं कि उनके पिता ने कभी अपने परिवार के लिए पैरवी नहीं की.

बेटे को मिली अदालती लड़ाई से नौकरी

पश्चिम बंगाल के 8 बार विधायक रहे लखन बागदी का बेटा 8 साल तक कांट्रैक्चुअल लेबर (दिहाड़ी मजदूर) के रूप में काम करता रहा. लंबी अदालती लड़ाई के बाद उन्हें ‘ग्रुप डी’ की नौकरी मिली.

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सिद्धांतवादी नेता

जब घर के सदस्यों की नौकरी की बात आती, तो बागदी कहते थे- घोरेर लोक के चाकरी कोरे दिले, बाईरेरे लोगेरा की कोरबे (अगर घर वालों को ही नौकरी दे दी, तो बाहर के लोगों का क्या होगा). आज भी उनके परिवार के सदस्य मछली कारोबार में मजदूरी या निजी संस्थाओं में दिहाड़ी श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं.

रेलवे स्टेशन को भी लखन बागदी के नाम से पाट दिया जाता था.

जानलेवा हमला भी नहीं डिगा पाया हौसला

1972 के चुनाव प्रचार के दौरान लखन बागदी पर जानलेवा हमला हुआ था. उनकी जीप के पास आकर एक भाला धंसा था, लेकिन उन्होंने कभी बॉडीगार्ड नहीं लिया. उनका मानना था कि अंगरक्षक लेने से वे अपनी जनता से दूर हो जायेंगे.

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Lakhan Bagdi Honest Politician: आधुनिक चकाचौंध से कोसों दूर है परिवार

रानीगंज स्थित उनके घर ‘शैल भवन’ की स्थिति आज भी उनके त्याग की गवाही दे रहा है.

  • जर्जर दीवारें : मकान की दीवारों से सीमेंट की पपड़ियां उखड़ रही हैं और छज्जे टूट रहे हैं.
  • पुराना टीवी : घर के एक कोने में रखा पुराना ‘डिब्बेवाला’ कलर टीवी परिवार की आर्थिक तंगहाली को साफ बयां करता है.
  • गर्व का अहसास : विशु दा कहते हैं कि आज के दौर में एक बार पार्षद बनने पर नेताओं का रुतबा बदल जाता है, लेकिन हमें इस बात का गर्व है कि हम लखन बागदी की संतान हैं, जिन्होंने कभी भ्रष्टाचार नहीं किया.

बेटे को ऐसे मिली थी नौकरी

बिशु दा ने बताया कि घर में बड़े पापा के 2 बेटे, चाचा का एक लड़का और खुद मैं बेकार था. पिताजी ने किसी को भी कहीं नौकरी पर लगाने के लिए कोई पैरवी नहीं की. ट्रेड यूनियन से जुड़े बड़े नेता थे, किसी को भी बोल देते, तो सभी की नौकरी लग जाती. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. वर्ष 2000 में अखबार में विज्ञापन देखकर बजबज में सेंट्रल फुटवेयर ट्रेनिंग सेंटर में विशु दा को कांट्रैक्चुअल लेबर का काम मिला. लखन बागदी के बड़े भाई के दोनों लड़कों में एक नवद्वीप में प्राइवेट संस्थान में डेली लेबर और एक मछली के थोक कारोबार में दिहाड़ी श्रमिक है.

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By Mithilesh Jha

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