बड़शूल की मंजू दास की अनोखी राखियों की विदेश में मांग, केले के छिलके और बीजों से तैयार राखी पहुंचेगी अमेरिका

पश्चिम बंगाल की एक गृहिणी मंजू दास ने प्राकृतिक सामग्री से बनी राखियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है. घर के काम से शुरू हुआ उनका सफर अब अमेरिका तक पहुंच गया है, जो कई महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है.

बर्धमान/पानागढ़ से मुकेश तिवारी की रिपोर्ट

Success Story : घर की जिम्मेदारियों के बीच अपने हुनर को पहचान दिलाकर उसे कारोबार का रूप देने वाली बड़शूल की गृहिणी मंजू दास आज कई महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं. पूर्व बर्दवान जिले के बर्दवान सदर-2 प्रखंड के बड़शूल स्थित हरिपल्ली की रहने वाली मंजू दास के हाथों से तैयार की गई खूबसूरत और अनोखी राखियां अब सात समुद्र पार अमेरिका पहुंचने जा रही हैं. खास बात यह है कि इन राखियों को तैयार करने में प्राकृतिक और आसानी से उपलब्ध सामग्रियों का रचनात्मक इस्तेमाल किया जा रहा है.

घर के काम से शुरू हुआ सफर, अब विदेश तक पहुंचा हुनर

राखी बनाने का काम मंजू दास के लिए महज एक रोजगार नहीं, बल्कि उनके वर्षों पुराने हुनर और रचनात्मकता को पहचान दिलाने का जरिया है. घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालने के साथ उन्होंने राखी बनाने के अपने हुनर को धीरे-धीरे कारोबार का रूप दिया. उनके पति संजीव दास भी इस काम में उनका पूरा सहयोग करते हैं. आगामी रक्षाबंधन को लेकर इन दिनों दास परिवार में राखियां तैयार करने की व्यस्तता चरम पर है. एक संस्था के माध्यम से उन्हें बड़ी संख्या में राखियां तैयार करने का ऑर्डर मिला है, जिसे अमेरिका भेजा जाना है. विदेशी बाजार के लिए मिला यह ऑर्डर परिवार के लिए खुशी के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आया है.

राखी में अनोखा प्रयोग, प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल

मंजू दास की बनाई राखियों की सबसे बड़ी खासियत उनका अनोखा प्रयोग है. इन राखियों को तैयार करने में केले के पेड़ के छिलके, धान की बालियां, कद्दू के बीज, जलकुंभी, खीरे के बीज और पोस्तो के छिलके जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जा रहा है. आसपास आसानी से उपलब्ध और अक्सर बेकार समझी जाने वाली इन सामग्रियों को रचनात्मक तरीके से इस्तेमाल कर आकर्षक राखियां तैयार की जा रही हैं. यही अनोखी सोच इन राखियों को सामान्य बाजार में मिलने वाली राखियों से अलग पहचान देती है.

पति के साथ मिलकर दिन-रात मेहनत

अमेरिका भेजे जाने वाले ऑर्डर को समय पर पूरा करने के लिए मंजू दास और उनके पति संजीव दास दिन-रात मेहनत कर रहे हैं. राखियों की खूबसूरती के साथ उनकी गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है. हर राखी को तैयार करने में बारीकी से काम किया जा रहा है, ताकि विदेश पहुंचने के बाद भी इनकी खूबसूरती और खासियत बरकरार रहे. मंजू दास का कहना है कि वह अपने इस काम को आने वाले दिनों में और बड़े स्तर तक ले जाना चाहती हैं. उनका सपना है कि उनके हाथों से तैयार राखियां देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी पहचान बनाएं.

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बड़शूल की मंजू बनीं महिलाओं के लिए मिसाल

एक सामान्य परिवार की गृहिणी से लेकर विदेश भेजे जाने वाली राखियां तैयार करने तक का मंजू दास का सफर अपने आप में प्रेरणादायक है. उन्होंने साबित किया है कि घर की जिम्मेदारियों के बीच भी अगर हुनर, मेहनत और लगन का साथ हो, तो आत्मनिर्भरता की राह बनाई जा सकती है. बड़शूल के छोटे से घर में तैयार हो रही ये राखियां अब अमेरिका में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की डोर बांधने जा रही हैं. चूल्हे-चौके से शुरू हुआ मंजू दास का हुनर अब समुद्र पार पहुंचने की तैयारी में है. प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार इन अनोखी राखियों के जरिए बड़शूल की मेहनत, रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता की कहानी भी विदेश तक पहुंच रही है.

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लेखक के बारे में

By आशीष झा

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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