आसनसोल : भागवत कथा के दोरान आचार्य मृदुल महाराज ने कहा कि मानव योनि मे जन्म लेने मात्र से जीव को मानवता प्राप्त नहीं होती है. यदि मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद भी उसमें स्वार्थ की भावना भारी हुयी है तो यह मानव होते हुये भी राक्षसी वृत्ति की पायदान पर खड़ा है. यदि व्यक्ति स्वार्थ की भावना को त्यागकर कर हमेशा परमार्थ भाव से जीवन यापन करे तो निस्चित रुप से यह एक अच्छा इन्सान है। क्योंकि परमार्थ की भावना ही व्यक्ति को महान बनाती है. वे कन्यापुर हाई स्कूल के निकट ज्योति जीम के समक्ष आयोजित दस दिवसीय श्रीमदभागवत सप्ताह ज्ञान भक्ति महायज्ञ के छठे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे.
उन्होंने श्रीकृष्ण लीला में पूतना चरित्र पर व्याख्यान देते हुये कहा कि कंस स्वयं को सब से श्रेष्ठ समझ बैठा. उसका विरोध करने वालों को वह मार दिया करता था. उसने अपनी मृत्यु टालने के लिए ब्रज में जितने बालक पैदा हुये उनका पूतना राक्षसी से वध कर दिया. परन्तु पूतना श्रीकृष्ण के हाथों मर कर मोक्ष को प्राप्त हुयी. इधर कंस प्रतापी राजा उग्रसेन का पुत्र होते हुये भी अपने अहंकार और कर्मों से राक्षसों की श्रेणी में आ गया और अंत में श्रीकृष्ण के हाथों उसका संहार हुआ. माखन चोरी लीला पर विस्तार पूर्वक बताते हुये आचार्य श्री ने कहा कि दुध दही माखन खा खाकर कंस के अनुचर बलवान होकर अधर्म को बढावा दे रहे थे. इसलिये श्रीकृष्ण ने दूध दही माखन को कंस के अनुचरों के पास जाने से रोक दिया और ग्वाल बालों को खिलाया और उन्हे बलवान बना कर आधर्मी कंस के अनुचर का भी संहार किया.
