UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी नवंबर महीने में बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिलेगा. राज्य की 10 उच्च सदन सीटों पर कार्यकाल समाप्त होने के कारण चुनाव आयोजित कराए जाएंगे. विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले यह मुकाबला सभी प्रमुख दलों के लिए शक्ति प्रदर्शन का मंच बन चुका है. वर्तमान में विधानसभा के बदले समीकरणों से प्रत्येक पार्टी अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटी है. इस प्रक्रिया के माध्यम से राजनीतिक ताकत का आकलन भी आसानी से किया जा सकेगा.
राज्यसभा चुनाव: नया समीकरण
उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों पर विधायकों के संख्या बल के हिसाब से नया गणित बना है. 2017 के चुनाव आधार पर बीजेपी के पास 9 और सपा के पास 1 सीट थी. बदला हुआ समीकरण इस प्रकार है:
- बीजेपी (8 सीटें): मजबूत संख्या बल से बीजेपी आसानी से 8 सीटें जीत सकती है.
- समाजवादी पार्टी (2 सीटें): बदला गणित सपा के पक्ष में है, जिससे उसे 2 सीटों का लाभ तय है.
- बसपा (0 सीट): कम विधायकों के कारण बसपा का खाता खाली रहेगा.
सपा का पीडीए दांव और दलित राजनीति
समाजवादी पार्टी दो सीटों पर जीत दर्ज करने की स्थिति में है। पहली सीट पर अनुभवी नेता रामगोपाल यादव का दोबारा चुना जाना तय माना जा रहा है. दूसरी रिक्ति के लिए अखिलेश यादव सामाजिक संतुलन साधने की तैयारी में हैं. पार्टी इस बार किसी गैर-यादव पिछड़ा या दलित उम्मीदवार को सदन में भेज सकती है. इसके जरिए 'पीडीए' फॉर्मूले को जमीन पर मजबूती देने का प्रयास रहेगा. पश्चिम उत्तर प्रदेश के समीकरण संभालने के लिए गुर्जर अथवा जाट उम्मीदवार को भी जिम्मेदारी देने पर विचार जारी है.
बीजेपी की रणनीति और बसपा का घटता जनाधार
भारतीय जनता पार्टी विधानसभा में अपनी मजबूत स्थिति के बल पर 8 सीटें जीतने का अनुमान लगा रही है. पूर्व उप मुख्यमंत्री के रिक्त स्थान पर वरिष्ठ ब्राह्मण चेहरे को अवसर दिया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, लोकसभा चुनावों में पिछड़ने वाले क्षेत्रीय दिग्गजों को भी मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है. दूसरी तरफ, विधायकों की कमी के कारण बहुजन समाज पार्टी की उपस्थिति समाप्त होने के कगार पर है. प्रस्तावक न मिलने से बसपा के लिए उम्मीदवार उतारना अत्यंत कठिन साबित हो रहा है.
क्षेत्रीय संतुलन और आगामी चुनाव की बिसात
राज्यसभा की इन 10 सीटों के नतीजे न केवल संसद में दलों की ताकत तय करेंगे, बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी देंगे. बीजेपी जहां अपने ब्राह्मण, पिछड़े और जाट-गुर्जर समीकरणों के सहारे पूर्वांचल से लेकर पश्चिम यूपी तक अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है, वहीं समाजवादी पार्टी का पूरा जोर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को मजबूत आधार देने पर है. बीएसपी का इस चुनाव से बाहर होना यह साफ संकेत देता है कि राज्य में अब मुख्य मुकाबला सीधे तौर पर बीजेपी और सपा के बीच ही सिमट कर रह गया है.
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