दोस्त के घर मिला अपमान, उसी रात देखा IAS बनने का सपना, संघर्ष और मेहनत ने दिलाई DM की कुर्सी

IAS Success Story: महज 12 साल की उम्र में मिले अपमान ने गोविंद जायसवाल की जिंदगी की दिशा बदल दी. गरीबी और अभावों से लड़ते हुए, उन्होंने हिंदी माध्यम से UPSC परीक्षा में 48वीं रैंक हासिल कर IAS बनने का सपना पूरा किया.

IAS Success Story: कुछ घटनाएं इंसान की जिंदगी की दिशा बदल देती हैं. वाराणसी के रहने वाले आईएएस गोविंद जायसवाल की कहानी भी ऐसी ही है. महज 12 साल की उम्र में दोस्त के पिता द्वारा कही गई चार बातें उनके दिल में इस तरह उतर गईं कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ही बदलने का संकल्प ले लिया. गरीबी, अभाव और तमाम मुश्किलों से लड़ते हुए उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास की और हिंदी माध्यम से ऑल इंडिया 48वीं रैंक हासिल कर आईएएस अधिकारी बने और कई जिलों में DM के पद पर रहे.

12 साल की उम्र में मिला ऐसा अपमान, जिसने बदल दी जिंदगी

गोविंद जायसवाल वाराणसी के अलईपुर इलाके में रहते थे. उनके पिता रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे. एक दिन वह अपने दोस्त के घर गए. तभी दोस्त के पिता ने उनसे उनके परिवार और पिता के काम के बारे में पूछा. जैसे ही उन्हें पता चला कि गोविंद के पिता रिक्शा चालक हैं, उन्होंने अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें वहां से जाने के लिए कह दिया. यह घटना मासूम गोविंद के मन में कई सवाल छोड़ गई.

टीचर ने कहा- 'अपना बैकग्राउंड बदलो', वहीं से शुरू हुआ सपना

स्कूल पहुंचकर गोविंद ने अपने क्लास टीचर से इस घटना का कारण पूछा. शिक्षक ने समझाया कि समाज अक्सर लोगों को उनके काम और आर्थिक स्थिति से आंकता है. जब गोविंद ने पूछा कि "बैकग्राउंड कैसे बदलता है?" तो शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा, अपना बैकग्राउंड बदलो या तो बड़े बिजनेसमैन बनो या फिर यूपीएससी पास कर आईएएस बन जाओ." यही चार शब्द गोविंद के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गए.

एक कमरे के घर से शुरू हुआ संघर्ष

गोविंद का पूरा परिवार एक छोटे से कमरे में रहता था. उसी कमरे में खाना बनता था और वहीं सभी रहते थे. आर्थिक तंगी इतनी थी कि पढ़ाई के लिए भी संसाधन जुटाना मुश्किल था. इसी बीच उनकी मां का निधन हो गया. बड़ी बहन ममता ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी ताकि परिवार की जिम्मेदारी संभाल सके. परिवार चाहता था कि गोविंद भी आगे चलकर ऑटो या रिक्शा चलाएं, लेकिन उन्होंने पढ़ाई को ही अपनी मंजिल बनाया.

पैसे बचाकर खरीदते थे किताबें, छुट्टियों में करते थे तैयारी

गोविंद को शुरुआत में यूपीएससी परीक्षा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उन्हें सिर्फ इतना पता था कि अच्छी पढ़ाई ही जिंदगी बदल सकती है. वह पूरे साल छोटे-छोटे पैसे बचाते थे और परीक्षा खत्म होने के बाद जनरल स्टडीज की किताबें खरीदते थे. गर्मी की छुट्टियों में उन्हीं किताबों से तैयारी करते और यह सब बिना किसी को बताए करते थे.

दिल्ली पहुंचे तो जमीन बेचकर पिता ने दिए 25 हजार रुपये

ग्रेजुएशन के बाद गोविंद यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली पहुंचे. इसके लिए उनके पिता ने 40 हजार रुपये में अपनी जमीन बेच दी और उसमें से 25 हजार रुपये उन्हें दिए. दिल्ली में उन्होंने 1700 रुपये महीने के किराये पर 3×7 फुट का छोटा कमरा लिया. खर्च चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाया और पूरे दो साल तक नए कपड़े तक नहीं खरीदे.

पिता पानी में रोटी खाते रहे, बेटा पढ़ाई में जुटा रहा

मीडिया रेपोर्ट्स के अनुसार तैयारी के दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई. पिता के पैरों में गंभीर संक्रमण हो गया. घर में सब्जी खरीदने तक के पैसे नहीं थे और कई बार पानी के साथ रोटी खाकर गुजारा करना पड़ता था. इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद गोविंद ने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया.

इंटरव्यू में पहनने के लिए दोस्तों से मांगे थे कपड़े

गोविंद पहले ही प्रयास में यूपीएससी इंटरव्यू तक पहुंच गए. हालांकि इंटरव्यू में पहनने के लिए उनके पास अच्छे कपड़े नहीं थे. बड़ी बहन ने 2000 रुपये देकर मदद की, जबकि टाई उन्होंने अपने दोस्त से उधार ली. इंटरव्यू के दौरान उन्होंने हर सवाल का जवाब पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ दिया. जब बोर्ड के चेयरमैन ने पूछा कि यदि चयन नहीं हुआ तो क्या करेंगे, गोविंद ने जवाब दिया, "आगे क्या करूंगा, यह तो नहीं सोचा, लेकिन जो भी करूंगा, पूरी ईमानदारी और मेहनत से करूंगा."

हिंदी माध्यम से हासिल की ऑल इंडिया 48वीं रैंक

एक महीने बाद जब यूपीएससी का परिणाम आया तो गोविंद जायसवाल ने हिंदी माध्यम से ऑल इंडिया 48वीं रैंक हासिल कर आईएएस बनने का सपना पूरा कर लिया. जिस समाज ने कभी उनके परिवार की आर्थिक स्थिति देखकर उन्हें ठुकराया था, वही समाज उनकी सफलता के बाद सम्मान देने लगा.

मेहनत और आत्मविश्वास से बदली किस्मत

गोविंद जायसवाल की कहानी बताती है कि गरीबी, संसाधनों की कमी या सामाजिक भेदभाव किसी भी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करते. अगर लक्ष्य स्पष्ट हो, मेहनत ईमानदार हो और हौसला मजबूत हो तो हर मुश्किल को पार किया जा सकता है.

Input: Ravi Ranjan Kumar

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लेखक के बारे में

By राधेश्याम कुशवाहा

राधेश्याम कुशवाहा को पत्रकारिता की क्षेत्र में 13 साल का अनुभव है. इस सफर की शुरुआत उन्होंने राज एक्सप्रेस न्यूज पेपर भोपाल से की. यहां से आगे बढ़ते हुए समय जगत, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान न्यूज पेपर के बाद वर्तमान में प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में यूपी डेस्क का नेतृत्व कर रहे हैं. इन्हें धर्म-अध्यात्म, ज्योतिष, राजनीति, अपराध और सकारात्मक खबरों की रिपोर्टिंग व लेखन में विशेष रुचि रखते हैं.

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